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चारधाम यात्रा परियोजना बनी उत्तराखंड के गांवों के लिए जान की आफत

Hridayesh JoshiHridayesh Joshi   25 Sep 2018 1:19 PM GMT

चारधाम यात्रा परियोजना बनी उत्तराखंड के गांवों के लिए जान की आफत

सूरज सिंह रमोला अपने बर्बाद खेतों को एकटक देख रहे हैं, खेतों के दूसरी चार धामयात्रा की सड़क है। ये बर्बाद फसलें उस तबाही की कहानी कह रही हैं जिसकी गूंज उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके में सुनाई दे रही है। टिहरी जिले के जंगलियथ गांव के रहने वाले रमोला को भरोसा नहीं हो रहा है कि हिमालय की पहाड़ियों को सपाट करने के बाद निकले मलबे में उनका खेत पलक झपकते ही डूब गया। ये पहाड़ 900 किलोमीटर की महत्वाकांक्षी चार धाम प्रोजेक्ट को बनाने के लिए सपाट किए जा रहे हैं, इस योजना का मकसद एक ऐसी सड़क बनाना है जो हर मौसम में चारों तीर्थों को जोड़े रखे। दिसंबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्घाटन करने के 18 महीने बाद इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय मानदंड़ों के उल्लंघन और स्थानीय विरोध के अलावा कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

चारधाम यात्रा परियोजना का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 में किया था। फोटो: ह्रदयेश जोशी

रमोला कहते हैं, "हमारे पास केले, अमरूद, सेब और आडू के बाग थे। हम सब्जियां उगाते थे। पर अब सब बर्बाद हो गया क्योंकि प्रोजेक्ट में काम करने वालों ने हमारे खेतों में कीचड़ फेंक दिया है।"

पास के गांव तिबली के फूलदास (35) ने बताया, "हमारे गांव में आपदा जैसी स्थिति है। सारी लिंक रोड बह गई हैं।"

12 हजार करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन केंद्रीय परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय कर रहा है। मोदी ने दावा किया था कि इससे उत्तराखंड में रोजगार और समृद्धि आएगी, लेकिन सड़क बनाने वाले ठेकेदारों की लापरवाही की वजह से कृषि योग्य भूमि के बड़े-बड़े इलाके बर्बाद हो गए हैं।

इस परियोजना की राह में पहली बाधा तब आई जब फरवरी 2018 में देहरादून के एक एनजीओ 'सिटिजंस फॉर ग्रीन दून' ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एक याचिका दायर की थी। इसमें नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) और केंद्रीय परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय पर पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था।

एनजीटी ने लगभग चार महीने सुनवाई की और इस साल 31 मई को अपना फैसला सुरक्षित कर दिया। मामले में दिलचस्प मोड़ तब आया जब 4 सितंबर को एनजीटी ने यह केस एक बड़ी बेंच के सुपुर्द कर दिया।

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चारधाम परियोजना का नक्शा।

स्थानीय समुदाय को हुआ सबसे ज्यादा नुकसान

योजना के उद्घाटन के समय मोदी ने पहाडों की एक मशहूर कहावत को उलट देने का वादा किया था: पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ों में नहीं रुकती। मोदी ने कहा था, "हम इस प्रदेश को ऐसा बना देंगे जहां पहाड़ों का पानी और यहां के युवा दोनों ही पहाड़ों के विकास में अपना योगदान देंगे। चारधाम हाइवे प्रोजेक्ट उत्तराखंड के उन हजारों युवाओं के पसीने से बनेगा जिन्हें इसमें रोजगार मिलने वाला है।"

लेकिन गांव वालों का कहना है कि प्रधानमंत्री स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया कराने वाला अपना वादा पूरा करने में नाकाम रहे। श्रीनगर (गढ़वाल) के रहने वाले हरीश (30) कहते हैं, "वर्ष 2017 की शुरूआत में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान हर नेता ने हमें कहा था कि चारधाम प्रोजेक्ट से तुम्हें रोजगार मिलेगा।" लेकिन हुआ इसका उलटा, इस प्रोजेक्ट से लोगों की रोजीरोटी पर ही संकट खड़ा हो गया।

प्रस्तावित हाईवे के किनारे रहने वाले गांववालों का कहना है कि निर्माणकार्य करने वाली कंपनी ने बाहरी लोगों को काम पर रखा है। रमोला का कहना है, "हमारे सभी रोजगार ठप हो गए हैं क्योंकि हमारे खेत पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं। शुरू में, सड़क बनाने के लिए ठेकेदारों ने इस क्षेत्र से 35 से ज्यादा लोगों को किराए पर लिया था, लेकिन कंपनी अब स्थानीय लोगों की भर्ती नहीं करती है। वे लोग अब बेरोजगार घर पर बैठे हैं।"

मलबे की चपेट में आकर गांवों की लिंक रोड़ बह गई हैं। फोटो: वायरल बग फिल्म्स

उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा, "यह एक बहुत बड़ी परियोजना है। हम उत्तराखंड से अधिकतम श्रमिकों को समायोजित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यदि किसी जगह काम करने के लिए लोग नहीं हैं तो स्वाभाविक तौर पर उन्हें बाहर से लाना होगा।"

चंबा में ग्रामीणों का कहना है कि जिन लोगों को काम पर रखा गया था ठेकेदारों ने उनमें से कई लोगों के बकाए का भुगतान नहीं किया है। चंबा की ही पार्वती देवी (35) कहती हैं कि गाय जिन घास के मैदानों में चरा करती थीं वे भी कीचड़ के नीचे दफन हो गए हैं। पार्वती पूछती हैं, "अब हम अपनी गाएं कहां चराएं? हमारे पास एक पैसा तक नहीं है, जो कुछ भी था वह तो इन लोगों ने हमसे छीन लिया।"

पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हरीश रावत ने इस योजना को दोषपूर्ण बताते हुए कहा, "चार धाम यात्रा मार्ग के लिए हमने अपने कार्यकाल में डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) तैयार की थी। उसमें यह एकदम स्पष्ट था कि सड़कों की अधिकतम चौड़ाई सुनिश्चित की जाएगी पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जाएगा कि पहाड़ों को कम से कम काटा जाए। हमारी योजना पुलों को चौड़ा करने और ऐसी जगहों पर वैकल्पिक रास्ते तैयार करने की थी जहां अक्सर भूस्खलन होता रहता है। लेकिन इनका ध्यान सिर्फ पहाड़ काटने पर है। वे वहां भी पहाड़ काट रहे हैं जहां इसकी जरूरत भी नहीं है। यह प्रोजेक्ट ठेकेदारों का स्वर्ग बनकर रह गया है। वे लोग पूरा मलबा नदियों में फेंक रहे हैं।"

बहुत से गांवों में घरों को भी मलबे से नुकसान हुआ है। फोटो: वायरल बग फिल्म्स

एक उदाहरण देते हुए रावत कहते हैं, "नरेंद्र नगर और ऋषिकेश के बीच जिस सड़क पर उन्होंने पहाड़ों की कटाई की है, वहां पर कुछ जगह पर सड़क इतनी चौड़ी है जिसे देखकर ऐसा लगता है जैसे यह हवाई जहाजों की पार्किंग के लिए हो।"

कौशिक इसका विरोध करते हुए कहते हैं, "क्या यह मुमकिन है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मनमर्जी से पहाड़ काट ले? जब भी कोई प्रोजेक्ट शुरू होता है तो बहुत सारी अनुमतियां लेनी पड़ती हैं। आप कितने इंच पहाड़ काटेंगे, कैसे काटेंगे, यह तक तय करने के लिए ऐसे प्रोजेक्ट में काफी प्लानिंग करनी पड़ती है।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और गढ़वाल विश्वविद्यालय समेत कई सरकारी एजेंसियों ने भूस्खलन की आशंका वाले इलाकों की पहचान की थी इसके बावजूद सड़क बनाते समय जरूरी सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज किया गया है। नतीजतन, ऐसे इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गई हैं जहां पिछले 100 बरसों में एक बार भी भूखस्खलन नहीं हुआ था। उत्तरकाशी-गंगोत्री राजमार्ग पर हाल ही में 13 लोगों की भूस्खलन के कारण हुई एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। चंबा के ग्रामीणों ने देखा कि हजारों टन कीचड़ और मलबा लापरवाही से सड़क के किनारे लगा दिया गया है जिसने उन्हें और भी दलदली और खतरनाक बना दिया है।

चंबा की फाल्गुनी देवी कहती हैं, "हमारे रास्ते और लिंक रोड बह गए हैं। ऐसा मॉनसून में पहले कभी नहीं हुआ है। हमसे मिलने एक रिश्तेदार आईं थीं जो वापस जाते समय मलबे के नीचे दबकर मारी गईं।"

गांववालों का कहना है कि परियोजना से रोजगार तो नहीं मिले उनके रोजगार जरूर संकट में पड़ गए। फोटो: वायरल बग फिल्म्स

सभी नियमों का हुआ उल्लंघन

एनजीटी में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने नियमों के उल्लंघन और नदियों में कीचड़ फेंकने को लेकर एक विडियो सबूत पेश किया था। भूगर्भ वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि ये उल्लंघन विनाशकारी साबित हो सकते हैं, इनसे हिमालय को ऐसा नुकसान हो सकता है जिनकी भरपाई नहीं की जा सकती।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि एनएचएआई और केंद्रीय परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने पर्यावरणीय मंजूरी लेने की आवश्यक शर्त की काट खोज ली है। सिटिजन फॉर ग्रीन दून के हिमांशु अरोरा का कहना था, "चूंकि 100 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़क परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी और वातावरणीय असर का आंकलन करना जरूरी है, इसलिए इन्होंने 900 किलोमीटर लंबे प्रोजेक्ट को 53 से ज्यादा हिस्सों में बांट दिया है। इसका नतीजा यह निकला कि इस प्रोजेक्ट के लिए हजारों पेड़ काटे गए जिससे दूसरे पेड़ भी गिरने लगे। इस नुकसान की गिनती ही नहीं हुई।"

महत्वपूर्ण बात यह है कि जब एनएचएआई और परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने कीचड़ रोकने के लिए सड़क के किनारे दीवारें बनाई हैं तो एनजीटी ने उनकी इस दलील को नहीं माना। ट्रिब्यूनल ने विडियो देखने पर पाया कि कीचड़ रोकने वाली दीवार पर्याप्त नहीं है। एनजीटी ने अपनी टिप्पणी में कहा, "जब भी बारिश होती है कीचड़ और मलबा नदी में बह जाता है। यह दीवार कारगर नहीं है।"

इस पूरे प्रोजेक्ट में पचास हजार पेड़ कटेंगे। फोटो: ह्रदयेश जोशी

जब मंत्री कौशिक से पूछा गया कि एनजीटी के सामने यह कहा गया था कि कोई पर्यावरण मंजूरी नहीं ली गई है, और कई नियमों का उल्लंघन किया गया है, तो उन्होंने जवाब दिया, "एनजीटी में दो मामले हैं। एक काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या के बारे में और दूसरा कीचड़ डंप करने के बारे में। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हम थोड़ी दूर जाकर मलबा डंप करें, यह मामला अदालत में है और जल्द ही तय हो जाएगा।"

यह स्पष्ट है कि ट्रिब्यूनल की प्रतिकूल टिप्पणियों से कोई जमीनी बदलाव नहीं हुआ।

परियोजना के लिए लगभग 50,000 पेड़ गिराने होंगे, जिसमें ऊंचाई पर उगने वाले देवदार, भोजपत्र और बलूत के पेड़ शामिल हैं। भागीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी घाटी के समृद्ध जंगल हिमालयी ग्लेशियरों की रक्षा करते हैं और सभी प्रमुख नदियों के लिए कैचमेंट एरिया के रूप में काम करते हैं।

चूंकि एनडीए सरकार 2019 के संसदीय चुनावों से पहले राजमार्ग परियोजना को एक मॉडल के रूप में प्रदर्शित करना चाहती है, इसलिए काम बहुत तेज गति से हो रहा है।

वरिष्ठ भू वैज्ञानिक डॉ प्रदीप श्रीवास्तव, जो देहरादून स्थित वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयी जियोलॉजी के साथ काम करते हैं, इस परियोजना को "अस्थिर" कहते हैं। वह कहते हैं, "ऐसी परियोजनाएं इन पहाड़ों में काम नहीं करेंगी क्योंकि सड़कों को "नाजुक चट्टानों" और पहले हुए भूस्खलन के बाद नीचे गिरी चट्टानों पर बनाया गया है। हर मौसम में काम आने वाली सड़क की संकल्पना एक गलतफहमी है। यह कहीं भी नहीं लिखा है कि यह भूस्खलन का सामना कर सकेगी। हमें पहाड़ों पर चौड़े हाईवे नहीं चाहिए।" हिमालय के भूविज्ञान पर कई रिपोर्टें लिखने वाले श्रीवास्तव कहते हैं, "हमें ऐसी अच्छी सड़कें चाहिए जो स्थानीय जरूरतों को पूरा कर सकें।"

पहाड़ों को सीधे काटा जा रहा है, पर्यावरणविदों का कहना है इससे पहाड़ ढह जाएंगे। फोटो: वायरल बग फिल्म्स

विशेषज्ञों का मानना है कि इस हाईवे के योजनाकारों ने नाजुक ढलानों की संवेदनशीलता को ध्यान में नहीं रखा।

"आप 90 डिग्री पर किसी पहाड़ी को लंबवत नहीं काट सकते हैं, जैसा कि अब किया जा रहा है। अगर आधार हटा दिया जाएगा तो पहाड़ गिर जाएंगे, अपने-आप भूस्खलन होने लगेगा जैसा कि हम देख रहे हैं। पहाड़ों में ऐसी जगहें हैं जहां हमने कभी भूस्खलन नहीं देखा था, लेकिन जब से सड़क बननी शुरू हुई है भूस्खलन की ढेरों घटनाएं हुई हैं।" आर.सी. शर्मा कहते हैं, वह श्रीनगर, गढ़वाल में एचएन बहुगुणा विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख हैं।

वहीं कौशिक दावा करते हैं कि "इस परियोजना के कारण भूस्खलन नहीं हो रहे हैं, असल में भूस्खलन बंद हो गए हैं।"

सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) के मुख्य वैज्ञानिक डॉ किशोर कुमार कहते हैं, "भारतीय सड़क कांग्रेस के मैनुअल में सड़कों की चौड़ाई के बारे में दिशानिर्देश हैं और राजमार्ग को चौड़ा करते समय उनका पालन किया जाना चाहिए था।"

डॉ कुमार एक मजबूत ढलान प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता की वकालत करते हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "हमारे पास सड़कों का निर्माण और रखरखाव करने के लिए उचित ढलान प्रबंधन प्रणाली नहीं है। केवल हाईवे बनाने से काम नहीं चलेगा, वहां एक राजमार्ग ढलान प्रबंधन प्रणाली भी होनी चाहिए। यदि आपको ढलान की परवाह नहीं है तो ये हाईवे भी नहीं टिक पाएंगे।"

सड़क बनाने वाले ठेकेदारों ने मलबा सड़क किनारे रखा है जो बहकर नदियों में मिल रहा है। फोटो: ह्रदयेश जोशी

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा का कहना है कि इधर-उधर मलबे का ढेर लगाने से स्थानीय वनस्पति और नदी की पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ सकता है। "चूंकि मलबा नदी की तलहटी में जमा होता रहता है, इसलिए नदी अपनी धारा बदल सकती है जो कि बहुत विनाशकारी साबित हो सकता है, जैसा 2013 केदारनाथ बाढ़ के दौरान हमने देखा था। कीचड़ और मलबे से पानी मैला हो जाता है। पानी में अधिक गंदगी होने से सूरज की रोशनी नदियों के तल तक नहीं पहुंच पाती है इसके अलावा पानी में ऑक्सीजन का स्तर भी प्रभावित होता है। यह जलीय प्रजातियों को खतरे में डाल सकता है," चोपड़ा कहते हैं। चोपड़ा सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त उस समिति के सदस्य थे जिसे केदारनाथ में आई बाढ़ में बड़े बांधों की भूमिका का आंकलन करने के लिए बनाया गया था। केदारनाथ में आई बाढ़ में 5000 लोगों की जानें चली गईं थीं।

सामरिक महत्व का तर्क

चार धाम परियोजना के निर्माण के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि इसका रणनीतिक महत्व है। उत्तराखंड के साथ लगने वाली सीमा पर चीन ने अपनी सेना तैनात कर रखी है इसलिए हमें भी इस इलाके में अच्छी सड़कों की जरूरत है। चीन ने सीमा पार अपने इलाके में अच्छी सड़कें बनाई हैं, भारत की सड़कें अभी उस स्तर की नहीं हैं।

सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने भी जुलाई में एनजीटी को बताया था कि सड़कें "रणनीतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण हैं" और इन्हें उन्नत बनाने की जरूरत है। हालांकि, स्थानीय लोग पूछते हैं, "क्या उन्नयन का मतलब तेजी से सड़कों का चौड़ीकरण है या उनकी स्थिरता पर भी ध्यान केंद्रित करना है?" पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि भूगर्भशास्त्रियों की सलाह माने बिना पहाड़ों को तोड़ना खतरनाक साबित हो सकता है, भले ही ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा हो।

सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि "राष्ट्रीय सुरक्षा" की दृष्टि से इस क्षेत्र में अच्छी सड़कों की आवश्यकता है फिर भी वे स्थानीय पारिस्थितिकी पर जोर देते हैं। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. एम. सी. भंडारी कहते हैं, "यह सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए कि पर्यावरणीय संतुलन बना रहे साथ ही जैव विविधता भी कायम रहे।"

उत्तराखंड में पलायन एक प्रमुख मुद्दा है। प्रदेश सरकार ने 1000 से ज्यादा गांवों को घोस्ट विलेज या भुतहा गांवों का दर्जा दिया है, इन गांवों में केवल कुछ ही परिवार रह गए हैं। रोजगार की कमी, खराब स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं से पलायन को बढ़ावा मिलता है। सड़क परियोजना को रोजगार की गारंटी के रूप में दिखाने के सरकारी प्रयासों पर शायद ही किसी को भरोसा हो।

चारधाम हाईवे का मकसद है कि यह तीर्थयात्रा आसानी से और जल्दी पूरी हो। पर क्या यह स्थानीय अर्थव्यवस्था में कोई योगदान दे पाएगी? मानवविज्ञानी और सांस्कृतिक कार्यकर्ता डॉ लोकेश ओहरी का कहना है कि सरकार पर्यटन और तीर्थयात्रा के बीच भ्रमित लगती है।

"यदि तीर्थयात्रा कम समय में पूरी होगी तो लोग रास्ते में कम रुकेंगे। वे चट्टियों में नहीं रुकेंगे, ढाबों में खाना नहीं खाएंगे। आम आदमी खुद को छला हुआ महसूस करेगा। इससे केवल रिसॉर्ट और टूर ऑपरेटरों जैसे बड़े प्रोजेक्ट को मदद मिलेगी, पर मुझे नहीं लगता है कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था में कोई योगदान दे पाएगी, हां स्थानीय संसाधनों पर इन तीर्थयात्रियों का दबाव जरूर पड़ेगा।" डॉ. ओहरी कहते हैं।

जैसे-जैसे इस हाईवे के किनारे मटमैली पगडंडी पर अंधेरा घिरने लगता है, यह साफ हो गया है कि तीर्थ यात्रा अब पहले की तरह नहीं रह जाएगी। अभी तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, पर यह कल्पना करना मुश्किल है कि एक दशक बाद बंजर और सपाट पहाड़ियों वाला गढ़वाल क्षेत्र कैसा लगेगा।

(ये रिपोर्ट पहले इंडिया क्लाइमेट डायलॉग में अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी है।)

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