सरकारी तनख्वाह पाने वालों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें : संदीप पाण्डेय

सरकारी तनख्वाह पाने वालों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें : संदीप पाण्डेयसभा को संबोधित करते संदीप पाण्डेय।

लखनऊ। सबसे कम उम्र में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय पिछले कई दिनों से राजधानी के जीपीओ पर सभी बच्चों को समान्य अधिकार के लिए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले को लागू कराने के लिए आन्दोलन पर बैठे हुए थे। संदीप पाण्डेय का प्रदर्शन बिना किसी नतीजे का खत्म हो गया। गाँव कनेक्शन की संदीप पाण्डेय से बातचीत...

सवाल- आप किस उद्देश्य के साथ आन्दोलन कर रहे हैं?

जवाब- 18 अगस्त 2015 को उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने फैसला दिया था कि सरकारी वेतन पाने वालों के बच्चों का सरकारी विद्यालयों में पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। उनका मानना था कि जो लोग सरकारी विद्यालयों के संचालन के लिए जिम्मेदार हैं वे इनमें ऐसे शिक्षक नियुक्त कर रहे हैं, जिन्हें शायद वे उन विद्यालयों में वे शिक्षक के रूप में नहीं देखना पसंद नहीं करेंगे जहां उनके अपने बच्चे पढ़ते हो।

यूपी सरकार को न्यायालय के फैसले को छह महीने में लागू कर कियान्वयन की आख्या न्यायालय में जमा करानी थी, किन्तु प्रदेश सरकार ने आज तक कुछ किया ही नहीं है। हकीकत यह है कि आज ज्यादातर सरकारी वेतन पाने वालों के बच्चे निजी विद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं, जिसके कारण उनका ध्यान सरकारी विधालयों की तरफ नहीं होता है। हमलोग चार दिन से न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले को लागू कराने के लिए प्रदर्शन पर है। इसके सिवाय कोई सरकारी शिक्षा में बदलाव लाने का कोई और रास्ता नहीं है।

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आरटीई को नहीं मानते कई प्राथमिक स्कूल

सवाल- क्या निजी विद्यालय शिक्षा के अधिकार अधिनियम की अवहेलना करते हैं?

जवाब- राजधानी लखनऊ में ही सिटी मोंटेसरी स्कूल, न्यू रेडियंस, सिटी इंटरनेशनल सहित कई स्कूल हैं जो सरकारी आदेशों का पालन नहीं कर रहे हैं। जिलाधिकारी शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत गरीब बच्चों के एडमिशन के लिए आदेश देते हैं तो निजी विद्यालय उसे नहीं मानते हैं। पिछले साल सरकारी आदेश के बावजूद 105 बच्चों को एडमिशन नहीं दिया गया। पूरा सत्र बीत गया लेकिन अभी तक एडमिशन नहीं हुआ। सवाल यह है कि ये बच्चे अमीर परिवार से होते तो इनके साथ क्या ऐसे ही होता? 105 बच्चों में से 14 बच्चे न्यायालय गए लेकिन उन्हें न्यायालय से भी कोई आदेश नहीं आया। 2015 में न्यायालय के आदेश के बाद 13 बच्चों का एडमिशन हुआ था। निजी विद्यालयों को लगता है कि गरीब परिवार के बच्चे आएंगे तो उनके स्कूल का स्तर गिरेगा।

निजी विद्यालयों की तो मनमानी चल रही है। गुजरात में तो फीस वृद्धि को लेकर कानून लाना पड़ा है। 15 हज़ार सालाना प्राथमिक विद्यालयों के लिए, 25 हज़ार माध्यमिक विद्यालयों के लिए सीमा तय कर दी गई है। हम लोगों ने यूपी सरकार से मांग किया है कि यूपी गरीब राज्य है तो यहाँ पर प्राथमिक के लिए छह हज़ार और माध्यमिक के लिए दस हज़ार रुपए की सीमा तय की जाए। निजी विद्यालयों की मनमानी को दूर करने के लिए भी ज़रूरी है कि सुधीर अग्रवाल के फैसले को लागू करके सरकारी विधालयों को बेहतर किया जाए। सरकारी विधालय को केंद्रीय और नावोदय विधालयों के स्तर का बनाया जाए।

प्रदर्शन में कई लोग शामिल हुए थे.....

सवाल- हाल ही टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में दो कोर्स बंद कर दिया गया। जेएनयू में सीटें कम कर दी गई। क्या वर्तमान सरकार शिक्षा को लेकर जागरूक नहीं है?

जवाब- वर्तमान सरकार एक खास विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रही है। प्राचीन विचारधारा को थोपना चाहती है। सरकार चाहती है कि लोग हिन्दू धर्म शास्त्रों की पढ़ाई करें और इसी के तहत काम करें। लेकिन सवाल यह है कि पूरा विकास आधुनिक विज्ञान पर आधारित है। आप आधुनिक विज्ञान को नहीं पढ़ेंगे तो सवाल नहीं पूछ सकते हैं। यह सरकार तो सवाल उठाने पर ही दबाव बना रही है। सवाल नहीं पूछने देना हमें पीछे ले जा रहा है। जिन विषयों को पढ़कर आप समाज की समझ बना सकते थे उसे रोका जा रहा है। गोरक्षा के नाम पर हत्या हो रही है। एक इंसान के जीवन का मूल्य एक गाय के जीवन मूल्य से ज्यादा हो गयी है। ज़रूरी मुद्दों पर बात नहीं हो रही है।

क्या है न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का फैसला

न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले को प्रदेश सरकार को छह महीने में लागू करना था, लेकिन अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर कार्यवाही करने से इंकार कर दिया था। सरकार ने न्यायलय के फैसले के प्रति ऐसा व्यवहार किया जैसे कोई फैसला ही नहीं आया होगा।
संदीप पाण्डेय

ऐतिहासिक फैसलों के लिए जाने जाने वाले उच्च न्यायालय इलाहाबाद के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने 18 अगस्त2015 सरकारी वेतन पाने वालों के बच्चों का सरकारी विद्यालय में पढ़ना अनिवार्य होना का फैसला दिया था। सुधीर अग्रवाल का मानना था कि जिन लोगों पर सरकारी विद्यालयों को चलाने की जिम्मेदारी है वो सरकारी विद्यालयों में ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करते है जैसा वे उन विद्यालयों में शिक्षक के रूप में कभी भी देखना पसंद नहीं करेंगे जहां उनके बच्चे पढ़ते हैं।

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समान शिक्षा अधिकार को लेकर आन्दोलन कर रहे संदीप पाण्डेय बताते हैं, "न्यायालय के फैसले को प्रदेश सरकार को छह महीने में लागू करना था, लेकिन अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर कार्यवाही करने से इंकार कर दिया था। सरकार ने न्यायलय के फैसले के प्रति ऐसा व्यवहार किया जैसे कोई फैसला ही नहीं आया होगा।

महिलाएं अपने बच्चों के एडमिशन की मांग के साथ बैठी थी महिलाएं...

संदीप पाण्डेय आगे बताते हैं, "रायबरेली के एक अभिभावक ने सरकार के खिलाफ अवमानना का मुकदमा किया तो न्यायालय ने तत्कालीन सचिव आलोक रंजन के नाम नोटिस भेजा था। आलोक रंजन के बाद दीपक सिंघल जब मुख्य सचिव बने तो उन्हें भी नोटिस भेजा गया। अभी तक मुख्य सचिव की तरफ से न्यायालय को कोई जवाब नहीं गया है। न्यायालय ने इसको लेकर कोई कार्यवाही नहीं की।"

केरल में सरकारी स्कूल में पढ़ रहे विधायको और सांसद के बच्चे

संदीप पाण्डेय बताते हैं, "यूपी में न्यायालय के फैसले के बाद भी सरकारी तनख्वाह पाने वालों के बच्चे और नेताओं के बच्चे निजी विद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं केरल राज्य में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्सवादी) के विधायक टी.वी. राजेश व सांसद एम.बी. राजेश और कांग्रेस के विधायक वी.टी. बलराम के बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई कर रहे है।

संदीप पाण्डेय के साथ राजधानी में प्रदर्शन पर रहे मनीष पाण्डेय बताते हैं, "समान शिक्षा अधिकार के लिए हम कई बार पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिले थे। उन्होंने हमें बार-बार सांत्वना दी लेकिन कार्यवाही नहीं की। अब हम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले को लागू कराने की मांग करेंगे। सुधीर अग्रवाल के फैसले के अलावा सरकारी विधालयों की स्थिति सुधारने का कोई और रास्ता नहीं है। समान शिक्षा लागू होने के बाद ही सभी बच्चों को बेहतर शिक्षा का लाभ मिल पायेगा।"

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