नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5: शरीर में खून की कमी से जूझ रहे बच्चे, 22 में से 17 राज्यों के बच्चों में बढ़े एनीमिया के मामले

सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में आधी आबादी आज भी शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया की बीमारी की शिकार है। पांच साल तक की उम्र के बच्चों में यह समस्या और भी गंभीर बनी हुई है। 22 राज्यों पर आई नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की पांचवीं रिपोर्ट में 17 राज्यों के बच्चों में एनीमिया के मामले बढ़े हुए सामने आये हैं।

Kushal MishraKushal Mishra   15 Dec 2020 7:52 AM GMT

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5: शरीर में खून की कमी से जूझ रहे बच्चे, 22 में से 17 राज्यों के बच्चों में बढ़े एनीमिया के मामलेदेश में पांच साल की उम्र के बच्चों में बढ़े एनीमिया के मामले। फोटो : गाँव कनेक्शन

देश में पांच साल से कम उम्र के ज्यादातर बच्चे एनीमिया यानी शरीर में खून की कमी होने की बीमारी से जूझ रहे हैं। यह तस्वीर केंद्र सरकार की हाल में आई नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की पांचवीं रिपोर्ट में सामने आई है।

एनएफएचएस की इस रिपोर्ट में सामने आया कि देश के 22 राज्यों में से 17 राज्यों के बच्चों में एनीमिया के मामले तेजी से बढ़े हैं। इनमें सबसे ख़राब स्थिति असम की है जहाँ पिछले सिर्फ तीन सालों के दौरान बच्चों में एनीमिया के 32 फीसदी मामले बढ़े हैं।

ऐसे में सरकार की पोषण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण योजनाओं के बावजूद देश के बच्चों में बढ़े एनीमिया के मामले खुद सरकार के उठाए गए क़दमों पर सवाल खड़ा करते हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हषवर्धन ने 12 दिसंबर को नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की इस पांचवीं रिपोर्ट का पहला हिस्सा जारी किया। रिपोर्ट के इस हिस्से में देश के 17 राज्यों समेत पांच केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया है। इसमें ज्यादातर राज्यों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बढ़ते एनीमिया के मामले चिंताजनक स्थिति बयां करते हैं।

असम के बाद सबसे ख़राब हालात मिजोरम और मणिपुर में

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की 2015-16 की रिपोर्ट से तुलना करें तो असम में उस दौरान कुल 35.7 फीसदी पांच साल तक के बच्चे एनीमिया के शिकार थे, अब यह आंकड़ा 68.4 फीसदी तक पहुँच गया है यानी करीब 32 फीसदी एनीमिया के मामले बढ़े हैं। असम के बाद सबसे ख़राब स्थिति मिजोरम, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर की रही है जहाँ बीते तीन सालों में क्रमशः 27 और 19-19 फीसदी के साथ बच्चों में एनीमिया के मामले बढ़े हैं। इसके बाद गुजरात, नागालैंड, त्रिपुरा, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल राज्य हैं जहाँ 10 फीसदी से ज्यादा बच्चों में खून की कमी के मामले बढ़े हैं।


इस बारे में असम की राजधानी गुवाहाटी में चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. सुरेश जैन 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "एनीमिया आज देश के लिए चिंताजनक स्थिति है क्योंकि लगभग देश का हर दूसरा व्यक्ति एनीमिया का शिकार है, मगर बच्चों में ऐसे मामलों का बढ़ते जाना और भी गंभीर स्थिति है।"

"आमतौर पर माना जाता है कि शरीर में आयरन की कमी से एनीमिया की शिकायत होती है, मगर यह सिर्फ एक कारण नहीं है, जैसे असम में हीमोग्लोबिन-ई भी एक तरह की बीमारी का रूप होता है और यह यहाँ के लोगों में ज्यादा पाया जाता है। यह भी एनीमिया का कारण बनता है। इसलिए यहाँ बच्चों को सिर्फ आयरन की गोलियां देना ही पर्याप्त नहीं है, यह भी वजह हो सकती है कि असम के बच्चों में एनीमिया के मामले बढ़े हों," डॉ. सुरेश जैन बताते हैं।

असल में एनीमिया यानी शरीर में खून की कमी मुख्य रूप से आयरन की कमी की वजह से सामने आती है। तब खून में मौजूद रेड ब्लड सेल्स की कमी होती जाती है। यह रेड ब्लड सेल्स शरीर के सभी टिश्यू तक ऑक्सीजन पहुँचाने का काम करते हैं। ऐसे में शरीर में पीलापन, थकान, सांस लेने में तकलीफ जैसी कई समस्याएँ सामने आती हैं। एनीमिया गंभीर होने की स्थिति में विकलांगता का कारण भी बनता है।

एनीमिया के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार ने साल 2018 में देश में पोषण अभियान के तहत एनीमिया मुक्त भारत अभियान की भी शुरुआत की थी ताकि वर्ष 2022 तक हर साल तीन फीसदी तक एनीमिया के प्रसार को कम किया जा सके। इसके तहत बच्चों को भी आयरन की गोलियां देना, पेट में कीड़े मारने की दवा देना, एनीमिया पीड़ित पुरुषों और महिलाओं को पोषण संबंधी आहार की जानकारी देना जैसे कई कदम शामिल हैं।

फिलहाल एनीमिया मुक्त भारत अभियान के तहत हर साल तीन फीसदी तक एनीमिया के प्रसार को रोकने का लक्ष्य तय किया है, मगर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की हालिया रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर राज्यों में पांच साल के बच्चों में ही एनीमिया के मामले काफी बढ़े हैं।

एनएफएचएस की वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट से तुलना करें तो बिहार में पांच साल तक की उम्र के बच्चों में एनीमिया के कुल मामले 63.5 फीसदी थे, तो अब यह छह फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 69.4 फीसदी है। इसी तरह गोवा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में क्रमशः पांच और चार-चार फीसदी की बढ़त दर्ज की गयी। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश, केरल, सिक्किम में भी बच्चों में एनीमिया के बढ़े मामले रिकॉर्ड किये गए हैं।


केंद्र सरकार के एनीमिया मुक्त भारत अभियान के बारे में उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े और चिकित्साधिकारी डॉ. वरुण कटियार 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "एनीमिया को लेकर सरकार का यह अभियान अच्छा है, मगर जरूरी यह भी है कि ऐसे अभियानों का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार भी किया जाए और जमीनी स्तर पर लोगों के घरों तक बच्चों को आयरन की गोलियां पहुंचाई जाएँ, आमतौर पर ऐसे अभियानों में जमीनी स्तर पर निगरानी की आवश्यकता होती है ताकि यह भी पता चले कि सिर्फ कागजों में ही नहीं, अभियान के जरिये लोगों और उनके परिवार के बच्चों को फायदा मिल रहा है।"

ग्रामीण इलाकों के बच्चे एनीमिया से ज्यादा प्रभावित

एनएफएचएस की रिपोर्ट के अनुसार शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में पांच साल तक की उम्र के बच्चे एनीमिया के ज्यादा शिकार पाए गए हैं। असम में जहाँ शहरों में यह आंकड़ा 66.4 फीसदी था, वहीं ग्रामीण इलाकों में 68.6 फीसदी बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। गुजरात के शहरों में जहाँ 77.6 फीसदी तो ग्रामीण इलाकों में यही आंकड़ा 81.2 फीसदी था। इसी तरह जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, मेघालय, तेलंगाना, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में भी ग्रामीण बच्चे एनीमिया से ग्रस्त रिकॉर्ड किये गए।

एनीमिया से लड़ती आ रही आधी आबादी


भारत में एनीमिया से एक लंबी लड़ाई चली आ रही है। सरकार ने एनीमिया से निपटने के लिए सबसे पहले वर्ष 1970 में राष्ट्रीय एनीमिया प्रोफिलैक्सिस कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसके बाद कई कार्यक्रमों और अभियानों के जरिये एनीमिया मुक्त भारत बनाने का सिलसिला शुरू किया गया। इसके बावजूद पोषण युक्त आहार के अभाव में आज भी आधी आबादी एनीमिया से मुक्त नहीं हो सकी है।

इससे पहले एनीमिया को सिर्फ महिलाओं और बच्चों से जोड़ा जाता रहा, मगर एनीमिया से सभी उम्र के लोग प्रभावित रहे हैं। एनीमिया के बारे में जानकारी के अभाव में आज भी ग्रामीण भारत में एनीमिया से ज्यादा लोग ग्रसित पाए गए हैं। ऐसा इसलिए भी सामने आया है क्योंकि पोषण युक्त आहार के बारे में लोगों को कम जानकारी रही है।

एनीमिया से ग्रसित पांच साल से कम उम्र के बच्चों की बात करें तो एनएचएफएस की 2005-06 की रिपोर्ट के अनुसार तब भारत में 69.4 फीसदी बच्चे एनीमिया के शिकार थे, जो 2015-16 में दस सालों बाद 58.6 फीसदी दर्ज किया गया। इसके बावजूद आज भी ज्यादातर राज्यों में पांच साल तक के उम्र के बाचों में एनीमिया के मामले बढ़े हुए हैं।

दूसरी ओर 2005-06 में 15 से 49 वर्ष की 55.3 फीसदी महिलाएं एनीमिया से ग्रसित थीं, वहीं दस सालों बाद यह आंकड़ा सिर्फ दो फीसदी घटकर 53.1 फीसदी तक पहुंच सका। यानी महिलाओं और बच्चों की आधी से ज्यादा एनीमिया से पीड़ित रही। इसके अलावा 2005-06 में 15 से 49 वर्ष के पुरुषों में 24.2 फीसदी एनीमिया के शिकार थे, जो 2015-16 में सिर्फ दो फीसदी घटकर 22.7 फीसदी रिकॉर्ड किया गया।

केंद्र सरकार के एनीमिया मुक्त भारत अभियान की शुरुआत में जुड़ीं रहीं और उत्तर प्रदेश में परिवार कल्याण की पूर्व महानिदेशक डॉ. नीना गुप्ता 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "एनीमिया की समस्या को न सिर्फ गंभीरता से लेने की जरूरत है, बल्कि हर एक राज्य में प्रभावी रूप से लागू करने की भी जरूरत है। एनीमिया से मुक्ति पाना कोई लंबा रास्ता नहीं है, अगर अभियान में सभी लोग मिलकर काम करें।"

"जैसे उत्तर प्रदेश में ही देखें तो पूर्वांचल में बच्चों में इंसेफिलिटिस को लेकर जैसा अभियान चलाया गया, उससे हमें आज कम समय में बड़ी सफलता मिली है और यह सभी ने देखा भी। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि हर एक स्तर पर सभी सम्बंधित विभागों ने मिलकर काम किया, घर-घर बच्चों की मोनिटरिंग की गयी और उन्हें जागरूक करने के साथ जरूरी दवाइयां उपलब्ध कराई गईं, एनीमिया मुक्त भारत अभियान में भी हमें ऐसे ही काम करने की जरूरत है।"

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