जलवायु परिवर्तन: पैदावार घटी तो लाखों लोगों के सामने होगा खाने का संकट

पिछले दिनों जारी भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते आने वाले दो वर्षों में गेहूं, धान, सरसों समेत कई फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है

जलवायु परिवर्तन: पैदावार घटी तो लाखों लोगों के सामने होगा खाने का संकट

अरविंद शुक्ला/मिथिलेश धर दुबे

लखनऊ। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने पंजाब के मलेरकोटला में 21-22 जनवरी को पिछले 108 साल का रिकार्ड तोड़ दिया। ओलावृष्टि इतनी अधिक थी कि दो पीढ़ियों ने ऐसा मंजर इससे पहले नहीं देखा था। "मैंने ही नहीं, मेरे पिता ने भी ऐसा मंजर नहीं देखा था। गेहूं की फसल चौपट हो गई है,"मालेरकोटला में रहने वाले कुलविंदर ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया।

यह जलवायु परिवर्तन का छोटा सा असर है, जिसका सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। बदले मौसम के रुख से फसल की पैदावार के साथ-साथ उत्पादन पर भी असर पड़ रहा है।

पिछले दिनों जारी भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते आने वाले दो वर्षों में गेहूं, धान, सरसों समेत कई फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है। सबसे ज्यादा असर रबी सीजन की फसलों पर दिख सकता है, इससे गेहूं का उत्पादन 2050 तक 23 फीसदी तक कम हो सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में सर्दियों में होने वाली बारिश लगातार कम हुई है, जबकि असमय मौसम का रुख बदलने की घटनाएं बढ़ी हैं।

भारत के कृषि मंत्रालय ने पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली समिति को सौंपी में रिपोर्ट में कहा कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2050 तक गेहूं का उत्पादन 23 फीसदी तक कम हो सकता है। जबकि धान (चावल) के उत्पादन में वर्ष 2020 तक ही 4 से 6 फीसदी तक कमी आ सकती है।

रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि प्रभावी कदम उठाए गए तो उत्पादन 17-20 फीसदी तक बढ़ भी सकता है। वर्ष 2018 में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में खुद सरकार ने भी माना था कि जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर पड़ रहा है।

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अन्य फसलों की बात करें तो मक्का 18 फीसदी और धान की पैदावार में 4-6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। हालांकि अगर समय रहते इस दिशा में उचित प्रयास हो तो उत्पादन बढ़ भी सकता है। सब्जियों का राजा आलू भी बढ़ते तापमान से बच नहीं पायेगा। रिपोर्ट की मानें तो वर्ष 2020 तक आलू का उत्पादन में 2.5% तक की गिरावट आ सकती है, जबकि वर्ष 2050 में यही गिरावट बढ़कर 6 फीसदी तक हो सकती है।

"भारत में जलवायु परिवर्तन का असर इसलिए ज्यादा दिख रहा है क्योंकि हमारे यहां 52 फीसदी कृषि योग्य जमीन बारिश पर निर्भर है। जब बारिश कम होगी तो उत्पादन प्रभावित होगा ही। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2016 में सूखे के दौरान 30-35 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे,"हरजीत सिंह, जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ और ग्लोबल लीड, एक्शन एड कहते हैं।

हरजीत सिंह की संस्था 45 देशों में न सिर्फ जलवायु परिवर्तन को लेकर काम कर रही है, बल्कि वो भारत जैसे विकासशील देशों के लिए विकसित देशों पर दबाव बना रहे हैं। दिसंबर 2018 में पौलेंड में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भी शामिल हुए थे। जहां इस बात पर चर्चा हो रही थी कि दुनिया के बढ़ते तापमान को कैसे रोका जाए।

जलवायु परिर्वतन से दुनिया में ऐसे बदलाव आ रहे हैं जो भविष्य में तबाही ला सकते हैं। जैसे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर का पिघलना, समुद्र के जलस्तर का बढ़ना और उसके पानी का तापमान बढ़ना। इन बदलावों से आबोहवा में भयानक बदलाव के लक्षण दिख रहे हैं। बहुत वक्त में ज्यादा बारिश होना, बाढ़ का आना, लंबे वक्त तक सूखा, चक्रवाती तूफान इसके दिखने वाले लक्षण हैं।

समय रहते अगर जलवायु परिवर्तन की ओर सार्थक कदम नहीं उठाये गये तो खेती और बदहाल हो जायेगा।

भारत में इसके पड़ने वाले असर के बारे में बात करते हुए हरजीत कहते हैं, "देश में आज भी 50 फीसदी लोग कृषि पर निर्भर हैं और ग्रामीण इलाकों में ये आंकड़ा 70 फीसदी तक पहुंचता है। देश में 80 फीसदी से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान हैं। जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। और समस्या ये है कि भारत ऐसे संकट से निपटने को तैयार नहीं है।"

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संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 19 करोड़ 40 लाख लोग भूखे सोते हैं। भारत पिछले पांच सालों से वैश्विक भूख रैंकिंग में निरंतर पिछड़ता जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूख एक गंभीर समस्या है और 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 103वें पायदान पर आ पहुंचा है। ऐसे में जब उत्पादन घटेगा और मांग की पूर्ति नहीं होगी तो ये स्थिति और विकराल रूप ले लेगी।

मौसम का असर समाचारों की सुर्खियां भले नहीं बनता, लेकिन उसके असर काफी प्रतिकूल हैं। पिछले वर्ष दिल्ली पहुंचे तमिलनाडु और महाराष्ट्र के कई किसानों ने मौसम (सूखे की मार) का जिक्र किया था। हरजीत के मुताबिक किसानों की आमदनी घटने के पीछे भी जलवायु परिवर्तन का बड़ा रोल है। किसान खुद भी मानते हैं अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा।

हरजीत कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन की बात पर भारत में वैकल्पिक ऊर्जा की बात होती है। लेकिन मौसम के बदलाव से खेती कैसे बचेगी इस पर बात नहीं होती। हमारे यहां 2014-17 तक कृषि उत्पादकता 2 फीसदी से कम है। एक तो हमारी बढ़त अच्छी नहीं, दूसरे छोटे किसान की अनुकूलन क्षमता नहीं। इसलिए भारत ज्यादा प्रभावित हो रहा है।"

पंजाब में जहां भीषण ओलावृष्टि हुई तो हुई तो वहां से करीब 750 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर, ब्लॉक हरगांव, गाँव टेढौहा के ज्ञानेंद्र मिश्रा बताते हैं, "10-12 साल पहले सर्दियों में इतनी बारिश होती थी कि एक खेत से दूसरे खेत में पानी जाने लगता था, अब न जाने मौसम को क्या हो गया। पिछले 4-5 सालों से तो बारिश बहुत कम हो रही है।"

हरियाणा के करनाल स्थित गेहूं अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. बीएस त्यागी कहते हैं, "इस समय (जनवरी) की बात करें तो मौसम में कोई बदलाव नहीं दिखता। फरवरी में भी तापमान ठीक संतुलित रहता है, लेकिन मार्च में कई बार गर्मी पड़ने लगती है। ऐसे में अगर मार्च में एक हफ्ते तक भी एक डिग्री तापमान बढ़ा रह जाए तो गेहूं में प्रति हेक्टेयर एक कुंतल तक उत्पादन कम हो सकता है।"

उत्पादन पर असर कैसे पड़ेगा इसे समझाते हुए डॉ. त्यागी कहते हैं, "मार्च में गेहूं में मिल्किंग (बालियों में दाना बनने का समय) का समय होता है। इस दौरान तापमान बढ़ा तो बाली का विकास रुक जाएगा, गेहूं के दाने कम हो सकते हैं।"किसान इसे आमबोल चाल की भाषा में होरा लगना कहते हैं, जब गर्म हवाएं चलने से गेहूं का दाना मर जाता है।

मौसम के बदले रुख (जलवायु परिवर्तन) से निपटने की वैज्ञानिकों की तैयारी पर डॉ. त्यागी कहते हैं, "क्लाइमेट चेंज को लोग सिर्फ तापमान कम या ज्यादा से जोड़कर देखते हैं, लेकिन ये सही नहीं। जलवायु परिवर्तन का मतलब है ठंड के बीच में गर्मी का आ जाना। मतलब कि मौसम का इनरेगुलर होना। हम लोग इसके लिए तैयार है। गेहूं की ऐसी कई वैरायटी हैं जो कम सिंचाई (2-3 में) अच्छी उपज देती हैं। ये क्लाइमेट रिजलिएट हैं।"

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भारत में पहले सी-306 जैसे गेहूं ज्यादा उगाए जाते थे जो अक्टूबर में बोकर अप्रैल मई में कटता था। जानकारों के मुताबिक लंबी अवधि की फसलों पर ज्यादा असर पड़ता है और उन फसलों पर जो देर से बोई जाती है। इस मौसम की बात करें तो कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश तक गेहूं काफी बड़ा हो गया है जबकि यूपी के कई इलाकों में बहुत छोटा है। ये छोटा गेहूं जब तक तैयार होगा, तापमान गर्म हो जाएगा (मार्च के आखिर तक) जिसका असर उत्पादन पर पड़ेगा।

बढ़ते तापमान का असर सिर्फ उत्पादन तक ही सीमित नहीं है। ये किसान के लिए कई और मुसीबतें लेकर आ रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) से जुड़े इक्रीसेट (हैदराबाद) में रिर्सच फैलो ओम प्रकाश बताते हैं, " ये कई रिपोर्ट में साबित हो चुका है कि जलवायु परिवर्तन के चलते गेहूं मक्का समेत कई फसलों की पैदावार पर असर पड़ रहा है। लेकिन अब ये भी पता चला है कि जो अनाज पैदा हो रहा है उसमें पोषक तत्वों का भी अभाव होता जा रहा है। न्यूट्रिशन वैल्यू कम होना भी घातक है। आईसीएआर इस पर शोध कर रहा है।"

बात सिर्फ यहीं तक खत्म नहीं होती है। ओमप्रकाश बताते हैं, "एक फीसदी तापमान बढ़ने पर 30 फीसदी तक रोग लगने की आशंका ज्यादा बढ़ जाएगी। कीट-पतंगों से बचाने के लिए किसान ज्यादा कीटनाशक डालेगा, जिससे उसका खर्च बढ़ेगा।"

अगर देश के पिछले पांच साल के अनाज उत्पादन पर ध्यान दें तो इसमें निरंतरता नहीं है। खासकर गेहूं और तिलहन के उत्पादन में लगातार गिरावट देखी जा रही है। वर्ष 2016-17 में देश में 275.11 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ था जबकि 2017-18 में मामूली बढ़ोतरी के साथ ये आंकड़ा 277.49 मीट्रिक टन पहुंचा। इस दौरान औसत उत्पादन 260.18 मीट्रिक टन रहा। इन पांच वर्षों में गेहूं के उत्पादन में 1.4 फीसदी जबकि तिलहन की पैदावार 4.5 घटी।

आखिर में हरजीत सिंह कहते हैं, "खेती और किसान को बचाने के लिए हमें खेती को नजर में रखकर योजनाएं बनानी होंगी। पुराने परंपरागत बीजों को बढ़ावा देना होगा। रेनवाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ाना होगा। पंजाब में चावल और महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाकों में गन्ने की खेती को कम करना होगा। खेती को जल्द नए आयाम से देखने की जरुरत है क्योंकि भारत की बहुत बड़ी आबादी सीधे खेती पर निर्भर है।"


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