जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में अमीर देशों की गरीबों के खिलाफ चाल: बांटो और राज करो

Hridayesh JoshiHridayesh Joshi   10 Dec 2018 9:56 AM GMT

कटोविस। पोलैंड में चल रहे कटोविस जलवायु सम्मलेन में जहां एक ओर तमाम देशों से आये लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं वहीं अमीर देशों का पैंतरा है - बांटो और राज करो।

अमीर देशों के इस गुट में वैसे तो यूरोपीय देशों के साथ जापान, आस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश शामिल हैं लेकिन इसके पीछे अदृश्य हाथ अमेरिका कहा है। विडम्बना यह है कि अमेरिका खुद जलवायु परिवर्तन को एक खोखला हौव्वा कहता है और पेरिस संधि से किनारा कर चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प खुलेआम कह चुके हैं कि क्लाइमेट चेंज चीन और भारत जैसे देशों का खड़ा किया डर है जिसके दम पर वह अमीर देशों से सहायता के नाम पर पैसा लूटना चाहता हैं।

आपको याद होगा कि 2015 में पेरिस डील से पहले भी अमीर देश विकासशील देशों को बांटने की कोशिश कर चुके हैं और अब वही खेल फिर खेला जा रहा है लेकिन इस बार खेल को थोड़ा बदल दिया है। इस पूरे खेल में अमीर देश छोटे छोटे द्वीप देशों (आइलेंड नेशन) और बहुत गरीब देशों को कुछ सहायता का लालच देकर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि सौर और पवन ऊर्जा जैसे संयंत्रों को लगाने के बहुत ज़रूरतमंद देशों को ही वह आर्थिक मदद करेंगे, यानी भारत और बड़े विकासशील देशों को बाहर रखा जायेगा।


इसके साथ ही अमीर देश कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की वार्ता में विकासशील और विकसित जैसे शब्दों का प्रयोग न किया जाये। इससे विकासशील देशों को खासा नुकसान होगा क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग की सारी समस्या में विकसित देशों में औद्योगिक क्रांति और उनके विलासितापूर्ण रहन सहन का बड़ा हाथ है।


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जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 196 देश हिस्सा ले रहे हैं। इस सम्मेलन की वार्ता काफी जटिल होती है और इसमें देशों ने अपने हितों और क्लाइमेट चेंज के खतरों की समानता के हिसाब से कई गुट बनाये हैं। मिसाल के तौर पर बहुत गरीब देशों का ग्रुप लीस्ट डेवलप्ड कंट्रीज यानी LDC कहा जाता है तो एक जैसी सोच वाले विकासशील देशों का समूह लाइक माइंडेड डेवलपिंग कंट्रीज LMDC कहा जाता है। लेकिन सबसे बड़ा समूह G-77+China है जिसमें भारत और चीन समेत करीब 135 देश हैं।

अमीर देशों की नज़र इस ग्रुप में सेंध लगाने की है। सोमवार से वार्ता में तेज़ी आयेगी तो पता चलेगा कि अपनी बांटो और राज करो की नीति में यूरोपीय और विकसित देश कितना कामयाब होंगे।

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