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मराठवाड़ा: 'कपास में 25 हजार की लगाई थी लागत, बारिश के चलते 5 हजार भी मिलना मुश्किल'

Arvind ShuklaArvind Shukla   20 Nov 2019 5:53 AM GMT

लोहा (नांदेड़) महाराष्ट्र। सितंबर से लेकर नवंबर तक हुई बारिश ने महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्यों में फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। महाराष्ट्र का मराठवाड़ा में पिछले तीन वर्षों से सूखे से जूझ रह था, साल 2019 में जून-जुलाई में पहले कम बारिश हुई, लेकिन सितंबर-अक्टूबर इतनी ज्यादा बारिश हो गई कि कटने को तैयार फसलें बर्बाद हो गईं। यहां तक की पोस्ट मानसून से नवंबर के पहले हफ्ते में भी बारिश हुई, जिसके चलते खरीफ की तैयार फसलों सोयाबीन, बाजरा, ज्वार और कपास को भारी नुकसान हुआ। ज्वार बाजरा और सोयाबीन की फसल खेत में ही सड़ गईं जो जिन किसानों ने खेत से काटकर थ्रेसिंग के लिए रखा था उसमें दोबारा अंकुरण हो गया। फसल बर्बाद होने के कई जिलों से किसानों की आत्महत्या की लगातार ख़बरें आ रही हैं।

गांव कनेक्शन की टीम ने नवंबर महीने में कई दिन मराठवाड़ा के ओस्मानाबाद, लातूर और नांदेड़ में बिताए, जहां किसानों ने बताया और दिखाया की कैसे कैसे उनका फसलों को नुकसान हुआ है। ये वीडियो नांदेड़ जिले की तालुका लोहा का है.. जहां एक महिला किसान की कपास की फसल लगातार बारिश से खराब गई। वीडियो यहां देखिए

महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले की लोहा तालुका में अपनी कपास की फसल को दिखाता किसान। जिसमें ९० फीसदी से ज्यादा फसल खराब हो गई है। फोटो- दिवेंद्र सिंह

किसान शेख समदानी बताते हैं, "कपास की फसल में कई बार फूल आते हैं और किसान उनको पकने पर चुनते रहते हैं। लेकिन इस बार पहली बार ही फूल आया था और इतनी बारिश हो गई कि पौधे ही सूख गए। ऐसे में जिस पौधे से 500-700 ग्राम रुई मिलनी थी वो 50 ग्राम भी नहीं निकल रही। किसान का मुनाफा दूर जमा पूंजी भी डूब गई है।"

समदानी के पड़ोसी हुसैन शेख बताते हैं, कि एक एकड़ में 8 से 10 कुंतल तक कपास निकलती है। 4500-5000 का रेट मिला तो करीब 45000 रुपए का माल निकलता है। जिसमें 20000-25000 का खर्च निकाल दिया जाए तो भी 20 हजार से ज्यादा की प्रति एकड़ बचत हो जाती थी, लेकिन इस बार हजारों किसानों के खेतों में प्रति एकड़ एक कुंतल भी कपास होना मुश्किल है।"

वो आगे कहते हैं, "बीमा कराया था, तहसील जाकर बताया भी था, लेकिन 8-10 दिन बाद भी कोई पंचानामा करने नहीं आया है। जबकि बीमा कंपनी वाले कहते हैं, नुकसान के 24 घंटे के अंदर शिकायत कर पंचानामा होना चाहिए। लेकिन किसानों के बार-बार होने के शिकायतों के बावजूद अधिकारी नहीं आ रहे।"

महिला किसान सावित्रा के पास 4 एकड़ खेती है, जिसमे से उन्होंने 3 एकड़ कपास बोई थी। लेकिन 90 फीसदी से ज्यादा फसल बर्बाद हो गई। सावित्रा कहती है, अब पूरा साल हमारे खेत ऐसे ही पड़े रहेंगे, क्योंकि हमारे पास कुआं और पानी नहीं है। हमारे यहां (नांदेड) में पानी कि दिक्कत ज्यादा है। अगर पानी होता तो दूसरी फसल बो देते, लेकिन अब जून ही दूसरी फसल बोएंगे।" सावित्रा और उनका परिवार अब घर चलाने के लिए महाराष्ट्र के दूसरे इलाकों में जहां गन्ने की कटिंग शुरु होने वाली है, वहां मजदूरी करने जाएगा।

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फसल बर्बादी के बाद मराठवाडा के आठ जिलों में किसानों की आत्महत्याओं की ख़बरें लगातार आत रही है। 14 अक्टूबर से 11 नवंबर के बीच मराठवाडा में 68 किसानों ने जान दी है। लोकमत में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक सबसे ज्यादा 16 किसानों ने बीड़ जिले में जान दी है, जिसके बाद नांदेड में 12, औरंगाबाद में 9 परणभी में 11, हिंगोली में 4, लातूर में 7 और ओस्मानाबाद में 3 किसानों ने आत्महत्या की है। जबकि साल 2019 दस महीनों की बात करें तो 746 किसानों की आत्महत्या के केस दर्ज किए गए हैं। किसान आत्महत्याओं को लेकर शिवसेना ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है। पार्टी के मुख पत्र सामना में लिखा गया है कि केंद्र सरकार को किसानों की हाय नहीं लेनी चाहिए और जल्द उनकी मदद करनी चाहिए। मराठवाड़ा पहले सूखे और अति वृष्टि ने किसानों का जीना मुश्किल कर दिया है। मराठवाड़ा के हर जिले से आत्महत्या की ख़बरें आ रही हैं।


गांव कनेक्शन की टीम लातूर और नांदेड में आत्महत्या करने वाले किसानों के घर भी गई थी। फसल बर्बाद होने के चलते इन किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। महाराष्ट्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर में हुई भीषण बारिश से मराठवाड़ा में खरीफ की 41 लाख हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई। जिसमें सोयाबीन, कपास, ज्वार बाजरा, उड़द, मक्का और कुछ जगहों पर तूर (अरहर) भी शामिल है।

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