कोविड-19: चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र की संभावनाएं

कोविड 19 महामारी के चलते हो रहे नुकसान से किसानों को कैसे बचाया जाए? वे क्या कदम उठाए जाने चाहिए जिससे कृषि संकट से किसानों को उबारा जा सके, गांव कनेक्शन आर्थिक पैकेज की उठ रही मांगों के बीच देश के कृषि जानकारों, अर्थशास्त्रियों और किसान नेताओं से उनकी राय जान रहा है। सीरीज कोरोना और किसान के पांचवें पार्ट में पढ़िए चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र की संभावनाएं, बता रहे हैं युवा लेखक विक्रांत सिंह।

कोविड-19: चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र की संभावनाएं

भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद कृषि थी, कृषि है और आगे भी रहेगी। इसका प्रमाण जारी कोविड-19 के वैश्विक संकट में भी देखने को मिला है। यह एक अनूठा संकट है। इसके वायरस से बचाव के तौर पर इस बार कोई वैक्सीन नहीं बल्कि लॉकडाउन नाम के एक हथियार का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में अधिकतर उत्पादन वाली गतिविधियां बिल्कुल थम सी गई है, लेकिन ऐसे संकट में भी किसानों ने अपने खेतों में फसलों की कटाई की है और वर्तमान में अगले फसल की तैयारी भी कर रहे हैं।

डॉक्टरों के साथ-साथ किसान भी इस संकट में एक सिपाही के रूप में लड़ाई लड़ रहे हैं। यह किसानों की ही देन है कि जब पूरे भारत को बंद किया जा चुका है, उस दौरान भी लोगों के घरों तक भोजन की आवश्यक वस्तएं पहुंच पा रही हैं। पिछले तीन दशकों में भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में जो सफलता हासिल की है यह उसी का परिणाम है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि खाद्यान्न उत्पादन में हुई वृद्धि के अनुपात में किसानों के आय और जीवन स्तर में प्रभावी बदलाव नहीं दिखें है।

कोविड-19 का प्रभाव किसी एक क्षेत्र मात्र का प्रभाव नहीं है। यह भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था भी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्र और उन में काम करने वाले लोग बुरे तरीके से प्रभावित हैं। कृषि क्षेत्र, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर तीनों ही एक गहरी मंदी की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। अभी तक के आंकड़ों के अनुसार यह तो स्पष्ट है कि कोविड-19 का प्रभाव ग्रामीण भारत पर नहीं पड़ा है, लेकिन अगर यह संकट गावों की तरफ फैला तो स्थिति भयावह हो सकती हैं। आज भी ग्रामीण भारत स्वच्छ जल, पौष्टिक आहार, सुव्यवस्थित स्वास्थ्य केंद्र आदि जैसी समस्याओं से घिरा हुआ है।

वर्तमान में प्राथमिक क्षेत्र अन्य दो क्षेत्रों (मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विस सेक्टर) के मुकाबले थोड़ी बेहतर स्थिति में है। लेकिन यहां भी समस्याएं कम नहीं है। लॉकडॉउन की वज़ह से शहरों में बंद हो रही कंपनियों की वजह से कृषि क्षेत्र पर दो गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ने वाले हैं।

1- एक बड़ी आबादी गांव की तरफ वापिस आ रही है जिसकी वजह से कृषि क्षेत्र पर आजीविका के लिए अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।

2- कृषि आधारित उत्पादों के लिए आपूर्ति-श्रृंखला (सप्लाई चेन) का प्रभावित होना। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जो एग्रो-प्रोडक्ट तैयार करती हैं। लेकिन जारी लॉकडाउन की वजह से गांवों से निकलने वाला कच्चा माल इस्तेमाल में ना आ पाने के कारण बर्बाद हो रहा है। यह किसानों के आय पर एक बड़ी आफत का रूप धारण कर रहा है। उदाहरण के लिए होटल, रेस्टोरेंट आदि के बंद होने से सब्जियों की मांग में कमी आई है। आयोजनों और धार्मिक स्थलों पर पाबंदी की वजह से फूल की खेती करने वाले किसान भी प्रभावित हो रहे हैं। अफवाहों के बीच पोल्ट्री किसान भी एक बड़े नुकसान को झेल रहे हैं।

भाग 1- किसानों को संकट से उबारने के लिए किसान शक्ति संघ के 20 सुझाव

कोविड-19 के संकट के बीच तमाम मुद्दों के बीच ग्रामीण भारत केंद्रीय विमर्श का मुद्दा नहीं बन पा रहा है। बल्कि इस संकट की घड़ी में होना यह चाहिए कि सबसे अधिक चर्चा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की की जानी चाहिए। वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र एक ऐसी कड़ी है जो भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनः सुचारु ढंग से चला सकती है। पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की है। कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की वार्षिक विकास दर क्रमशः 2012-13, 2013-14, 2014-15, 2015-16, 2106-17, 2017-18 और 2018-19 में 1.5%, 5.6%, -0.2%, 0.6%, 6.3%, 5.0% और 2.9% रही है। जनवरी, 2020 में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भी वर्ष 2019-20 में कृषि विकास दर का अनुमान 2.8% ही जताया गया था। अगर यह संकट ऐसे ही जारी रहा तो कृषि विकास पर एक बार पुनः नकारात्मक हो सकती है।

सरकार के तमाम घोषणाओं के बावजूद भी कोविड-19 के जारी संकट की वजह से कृषि उत्पादों के बाजार तेजी से खत्म हो रहे हैं। कृषि क्षेत्र मांग के साथ-साथ आपूर्ति का संकट भी देख रहा है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वर्तमान समय में अर्थव्यवस्था को ग्रामीण और शहर के बीच में बांट कर नहीं देखा जा सकता है। ऐसी बहुत सी गतिविधियां है जो शहर की होने के बावजूद गांवों पर निर्भर करती हैं और इसी क्रम में बहुत सी गतिविधियां है जो गांवों में होने के बावजूद भी शहरों में होने वाली मांग पर निर्भर करते है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 69 फ़ीसदी आबादी गांवों में रहती है। यानी कि कुल अर्थव्यवस्था में खपत आधारित मांग का 69 फ़ीसदी हिस्सा गांव में रहता है।

भाग 2- किसानों के लिए भारतीय किसान यूनियन की सरकार से 1.5 लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज की मांग

किसानों के सामने हमेशा से ही तीन महत्वपूर्ण समस्याएं रहीं है। पहला उनके ऊपर कर्ज का भारी दबाव है, दूसरा उनकी फसल लागत में कमी नहीं आ रही और तीसरा उनकी फसल का उन्हें वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। आज यह जरूरत है कि सरकार इन तीनों ही समस्याओं पर काम करते हुए अर्थव्यवस्था को कृषि क्षेत्र से बचाने का प्रयास करें। सरकार कृषि क्षेत्र को जारी संकट से उबारने के कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है-

1- प्रधानमंत्री कृषि सम्मान योजना के अंतर्गत कुल 12 करोड़ किसानों को ₹6000 के नगद भुगतान की बात की गई थी। सरकार को चाहिए कि प्रधानमंत्री कृषि सम्मान योजना को ₹6000 से ₹12000 किया जाए। इसके लिए अतिरिक्त 72 हजार करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी।

2- ₹6000 की एक किस्त खरीफ सीजन की बुवाई से पहले ही किसानों के खातों में पहुंचाया जाए। इस तरीके से किसान खेतों में बुवाई के लिए खाद-बीज सही समय पर खरीद पाएंगे।

3- लॉकडाउन की वजह से जो आपूर्ति श्रृंखला गांव और शहरों के बीच में टूटी है उसको फिर से सही करने के लिए एक विशेष राहत पैकेज का ऐलान किया जाए। हर हाल में कृषि उत्पादों को संभावित उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए सरकारी प्रयत्न ही करने होंगे। इसमें एक बड़ी भूमिका ई-कॉमर्स कंपनियां निभा सकती हैं।

भाग 3- 'लॉकडाउन में कृषि क्षेत्र को संगठित करने के मौके भी हैं'

4- तहसील स्तर पर केंद्र और राज्य सरकार साथ मिलकर किसानों को खरीफ फसल की बुवाई के लिए बीज-खाद जैसी जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता के लिए तकनीकी सहायता लेते हुए एक टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए। किसी भी गांव या फिर किसी व्यक्तिगत किसान की ही जरूरतों को यह टास्क फोर्स एक निश्चित समय में पूरा करने का काम करेगी।

5- सरकार को हर गांव स्तर पर फसलों की खरीदारी के लिए सुचारू व्यवस्था बनाने की जरूरत है। ताकि किसानों के उत्पादों पर यातायात का खर्च बचाया जा सके. इससे किसानों की आय भी बढ़ाने में मदद मिल सकेगी।

6- आने वाले 2 वर्ष के लिए किसानों के कर्ज की भुगतान तिथि और कर्ज पर लगने वाले ब्याज को रोका जाए।

7- पलायन कर गांव में वापस आए मजदूरों को मनरेगा के अंतर्गत पंजीकृत करते हुए रोजगार गारंटी का लाभ दिया जाए। इससे कृषि पर अतिरिक्त दबाव कम होगा।

कोविड-19 के जारी संकट को कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़े अवसर में भी बदला जा सकता है। देश में मौजूद 6,00,000 गाँवों में गाँव आधारित कृषि-उद्योग का एक बड़ा मॉडल बनाया जा सकता है। अगर हम यह करने में कामयाब रहे तो ग्रामीण इलाकों से पलायन पर अंकुश लगेगा।

भाग 4- कोविड-19 वैश्विक महामारी के चलते किसान के सामने आपूर्ति नहीं मांग का संकट

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