पटाखे आपकी सेहत के लिए हानिकारक, इन बड़ी बीमारियों का बन सकते हैं कारण

पटाखे आपकी सेहत के लिए हानिकारक, इन बड़ी बीमारियों का बन सकते हैं कारणपटाखों से प्रदूषण ।

लखनऊ। पटाखा जहां पर्यावरण के लिए हानिकारक है वहीं सेहत पर भी बुरा असर डालता है। पिछले साल दिवाली के बाद दिल्ली में प्रदूषण को देखकर इस बार सुप्रीम कोर्ट ने वहां पटाखे फोड़ना बैन भी कर दिया है। उत्तर प्रदेश में भले ऐसा कोई आदेश नहीं है लेकिन फिर भी पटाखे फोड़ते समय लोगों को प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के नियमों का पालन करना होगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, तेज आवाज वाले पटाखों में बारूद, चारकोल, नाइट्रोजन और सल्फर जैसे रसायनों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है, जिससे चिंगारी, धुआं और तेज आवाज निकलती है। ऐसे पटाखों के कारण कैमिकल्स गैस के रूप में हवा में फैल जाते हैं, ये सेहत के लिए बेहद हानिकारक हो सकते हैं।

पटाखों का हमारी सेहत पर क्या असर पड़ सकता है इस बारे में लखनऊ के सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ आशुतोष दूबे बता रहे हैं, “पटाखों की वजह से चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, आंखों में लालिमा व खुजलाहट, कान के पर्दे पर असर या बहरापन हो सकता है।” डॉ दूबे आगे बताते हैं, “सांस की नली में खुजलाहट, सांस लेने में दिक्कत, अस्थमा, ब्लड प्रेशर बढ़ना, यहां तक की हार्ट अटैक व पक्षघात का भी खतरा रहता है।”

पर्यावरण सरंक्षण विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य दिनों में 24 घंटे में सल्फर गैस लगभग 10.6 और नाइट्रोजन 9.31 माइक्रो मिली ग्राम प्रति घन मीटर हवा में मौजूद रहती है, जिसका शरीर पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन दीवाली में जलाएं गए पटाखों के कारण 24 घंटे में इन गैसों की मात्रा हवा में दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है। इसके कारण इसका सीधा प्रभाव शरीर पर पड़ता है, खासकर बच्चों,बुजुर्गों और दमा के मरीजों पर।

ध्वनि प्रदूषण भी खतरा

लखनऊ के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ अमित खरे बताते हैं, “कान के लिए 41 से 55 डेसीबल तक ध्वनि को संतुलित माना जाता है तथा इसके बाद की ध्वनि तीव्रता खतरनाक हो सकती है। इससे लोगों में बहरेपन की शिकायत भी हो सकती है। दिवाली में इससे ज्यादा शोर होता है जिससे खासकर छोटे बच्चों के कान पर असर ज्यादा पड़ता है।”

उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी कुलदीप मिश्रा बताते हैं, दिल्ली में पटाखों पर बैन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लगे हैं, उत्तर प्रदेश में अभी ऐसा कोई आदेश नहीं है। हालांकि 140 डेसीबल से ज्यादा ध्वनि वाले पटाखे फोड़ना सख्त मना है। ऐसा करने पर कार्रवाई की जाती है। इसके साथ ही ध्वनि को लेकर बने नियमों के अनुसार, रात 10 बजे के बाद बहुत तेज ध्वनि के पटाखे फोड़ने जैसी गतिविधियां करना भी मना है।

ध्वनि प्रदूषण का खतरा।

दिल्ली में पटाखों पर बैन

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को पटाखों की बिक्री पर पाबंदी का आदेश दिया था। पिछले फैसले में लगी रोक को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री 1 नवंबर, 2017 से दोबारा शुरू हो सकेगी। ये फैसला पिछली बार दिवाली के बाद फैले प्रदूषण को देखकर लिया गया है।

दिवाली की रात बढ़ जाता है प्रदूषण का रेट

भारतीय विष अनुसंधान के अनुसार दीवाली में वायु प्रदूषण काफी तेज हो जाता है। शाम से लेकर रात तक प्रदूषण का रेट काफी बढ़ जाता है। इसे हम लोग पार्टिकूलर मेटल में लेते हैं, इसमें छोटे कणों का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या कम होता है। यह कण ठोस या तरल रूप में वातावरण में होते हैं। इसमें धूल, गर्द और धातु के सूक्ष्म कण शामिल हैं, जो कि वायु प्रदुषण ही है इसकी मात्रा काफी बढ़ जाती है। पटाखे में कई तरह के रंग भी निकलते हैं, जिसे बनाने में कई तरीके के कैमिकल का प्रयोग किया जाता है। ये चीजें काफी खतरनाक होता है।

ये पटाखें सबसे ज्यादा फैलाते हैं प्रदूषण

भारत ने पीएम 2.5 के लिए 60 μg / m³ (प्रति घन मीटर प्रति माइक्रोग्राम) के 24 घंटे का मानक निर्धारित किया है, जबकि डब्ल्यूएचओ में 25 μg / m³ का कम मानक है। सांप टैबलेट पीएम 2.5 के उच्चतम स्तर का उत्सर्जन करता है।

इसके बाद लड़ी, पुलपुल, फुलझड़ी, चकरी और अनार उत्सर्जन करता है। हालांकि सांप टैबलेट केवल नौ सेकेंड तक जलती है लेकिन यह 64.500 ग्राम / एम 3 के सर्वोच्च स्तर पीए 2.5 स्तर का उत्सर्जन करता है जो कि डब्लूएचओ मानकों से -2,560 गुना अधिक है। वहीं लड़ी का उत्पादन पीएम 2.5 के स्तर का 38,540 ग्राम / एम 3 है जो कि डब्ल्यूएचओ मानकों से 1,541 गुना अधिक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (डब्लूएचओ) द्वारा सिफारिश की गई पार्टीकुलेट मैटर 2.5 ( पीएम ) की तय सुरक्षा सीमा की तुलना में लोकप्रिय पटाखे जैसे कि फूलझड़ी, सांप टेबलेट, अनार, पुलपुल, लड़ी या लाड़ और चकरी, 200 से 2,000 गुना ज्यादा उत्सर्जन करता है

कई बीमारियों का कारण ये पटाखे।

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