Doctors' Day : एक डॉक्टर की ड्यूटी होती है 24 घंटे 

आज हम उन लोगों की बात कर रहे हैं, जो हमारी सेहत के रखवाले हैं। लोग उनमें कमियां तो निकालते हैं, लेकिन उनके काम कहीं न कहीं नज़रअंदाज भी कर देते हैं, आज ऐसे ही एक डॉक्टरों के बारे में बता रहे हैं, कहने के लिए तो उनकी ड्यूटी सात-आठ घंटे की होती है, लेकिन वो हमारे लिए 24 घंटे काम करते हैं।

कई साल मेडिकल की पढ़ाई के बाद ग्रामीण क्षेत्र में नियुक्ति के बाद डॉक्टरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक डॉक्टर के भरोसे सैकड़ों मरीजों की जिम्मेदारी होती है, विश्व स्वास्थ्य दिवस पर ऐसे ही एक डॉक्टर की ज़िंदगी के एक दिन से रू-ब-रू करा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में लखनऊ के मलिहाबाद सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के अधीक्षक डॉ. सैय्यद शाहिद रज़ा पिछले एक साल से यहां पर नियुक्त हैं, इससे पहले दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल, एम्स जैसे बड़े अस्पतालों में भी नियुक्त रहे हैं। एक डॉक्टर के पास मरीज देखने के अलावा कई प्रसाशनिक कार्यों की भी जिम्मेदारी होती है।

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सुबह 8 बजे से दोपहर दो बजे तक ओपीडी में मरीजों को देखते हैं। इसके बाद (ओपीडी के बाद) इमरजेंसी में सुबह तक मरीजों को देखते हैं, आप कह लीजिए एक डॉक्टर की ड्यूटी 24 घंटी रहती ही है।
डॉ. सैय्यद शाहिद रज़ा, अधीक्षक, सीएचसी

यूपी की तरह देश के तमाम ग्रामीण अस्पताल डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों की कमी के बारे में डॉ. रज़ा बताते हैं, "सीएचसी में आठ डॉक्टर होने चाहिए, लेकिन हमारे पास तीन डॉक्टर ही हैं, तीन डॉक्टरों के साथ इतना बड़ा अस्पताल संभालना करना मुश्किल होता है।" तीन डॉक्टर पर मरीजों की जो संख्या रज़ा बताते हैं, वो भी गौर करने वाली है। वो बताते हैं, "सर्दियों की अपेक्षा गर्मियों में वर्क लोड (मरीजों की संख्या) बढ़ जाती है। सर्दियों में चार-पांच सौ आते हैं, लेकिन गर्मियों में छह से सात सौ मरीज आते हैं, मार्च अप्रैल में ये संख्या एक हजार तक पहुंच जाती है।'

स्वास्थ्य विभाग के नियमानुसार एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर आठ डॉक्टरों की नियुक्ति होनी चाहिए। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के आंकड़ों के अनुसार 1.3 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए भारत में बस 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर हैं। इसमें से भी केवल 1.1 लाख डॉक्टर सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्रों में इलाज कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 90 करोड़ लोगों के इलाज का बोझ इन्हीं कुछ डॉक्टरों पर हैं।

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एम्स, सफदरजंग दिल्ली, राम मनोहर लोहिया अस्पताल समेत कई बड़े अस्पतालों में तैनात रह चुके रजा बाल रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि मेडिकल स्टॉफ पर इलाज के अलावा प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी होती है। "डॉक्टर पर बहुत जिम्मेदारियां होती है, अस्पताल में सब ठीक चले ही, ब्लॉक और गांव में कोई सरकारी कार्यक्रम लगने पर भी जाना पड़ता है, घरों में जाकर जांचना पड़ता है कि टीकाकरण हो रहा है कि नहीं, एएनएन आशा बहु या दूसरे कर्मचारी क्या कर रहे हैं, आजकल जैसे विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवारा चल रहा है, अब हमें फील्ड में जाकर देखना होता है कि एएनएम टीका लगा रहीं हैं कि नहीं।"

आम लोगों की तरह डॉक्टरों की अस्पताल से बाहर जिंदगी होती है। डॉ. रजा बताते हैं, "छह साल की बेटी है अब सुबह आठ बजे ओपीडी है, उसे स्कूल भी भेजना होता है, सुबह सात बजे ही घर से निकल जाते हैं, जिससे समय पर ओपीडी में पहुंच पाएं।"

दिन में कई बार देखने होते हैं मरीज

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ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब

एक हजार की आबादी के लिए एक डॉक्टर के अंतर्राष्ट्रीय मानक की तुलना में हमारे देश में 1,700 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर 83.4 प्रतिशत सर्जन, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों की 76.3 प्रतिशत, बाल रोग विशेषज्ञों की 82.1 प्रतिशत और सामान्य चिकिस्तकों की 83 प्रतिशत कमी है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2015 के अनुसार, देश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में 83 फीसदी चिकित्सा पेशेवरों और विशेषज्ञों की कमी है। इंडियास्पेंड के विश्लेषण वर्ष 2015 रिपोर्ट के अनुसार, सीएचसी में उत्तर प्रदेश में चिकित्सकों की 86.7 प्रतिशत कमी है। इसके अलावा बाल रोग विशेषज्ञों की 80.1 प्रतिशत और रेडियोग्राफर की 89.4 प्रतिशत कमी है।

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