प्रसूति गृहों में महिलाओं की स्थिति पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का आइना

अस्पताल में डॉक्टरों के बजाय सफाई कर्मचारी महिलाओं का प्रसव करवा रहे हैं। सबसे अफसोसजनक यह है कि दर्द में तड़प रही महिलाओं के साथ कई बार गाली गलौज भी हो रही है।

Hridayesh JoshiHridayesh Joshi   12 Feb 2019 6:10 AM GMT

प्रसूति गृहों में महिलाओं की स्थिति पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का आइना

लखनऊ। राजस्थान के तमाम सरकारी अस्पतालों के प्रसूति गृहों में महिलाओं के साथ जो हो रहा है, वह हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी के साथ साथ हमारे समाज का भी एक घिनौना चेहरा पेश करता है। समाचार पत्र दैनिक भास्कर ने राज्य के 13 जिलों के 92 अस्पतालों का दौरा कर एक रिपोर्ट छापी है जो प्रसव के लिये सरकारी अस्पताल में दाखिल हुई महिलाओं की दुर्दशा बताती है।

भास्कर ने जो पड़ताल की है उसमें न केवल अस्पताल में डॉक्टरों के बजाय सफाई कर्मचारी महिलाओं का प्रसव करवा रहे हैं बल्कि यह काम वह बिना किसी सावधानी और बेहद गंदगी भरे माहौल में कर रहे हैं। सबसे अफसोसजनक यह है कि दर्द में तड़प रही महिलाओं के साथ कई बार गाली गलौज भी हो रही है।

समाचार पत्र के स्टिंग ऑपरेशन में जो बातें निकल कर आईं, उसके बाद अस्पतालों और बड़े अधिकारियों पर इन हालात के लिये राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की गई बल्कि मीडिया में खबर आने के बाद लीपापोती के नाम पर कुछ सफाई कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया। सच यह है कि अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सों की गैर-मौजूदगी की वजह से ही सफाई कर्मचारी यह काम कर रहे हैं या फिर डॉक्टर-नर्सों ने जानबूझ कर गरीब महिलाओं को इन सफाई कर्मचारियों के हवाले कर दिया है।




जिन गंदगी भरे हालात में बच्चों का जन्म हो रहा है वह माता और शिशु दोनों के लिए बेहद खतरनाक है लेकिन सरकारों को इससे फर्क नहीं पड़ता। राज्य में अभी कांग्रेस पार्टी की सरकार है लेकिन यह हालात दो चार दिन पहले नहीं बने, बल्कि बरसों से चले आ रहे हैं। यह किसी एक राज्य की कहानी भी नहीं है। यह लचर पब्लिक हेल्थ सिस्टम तो सरकारी महकमे में भ्रष्टाचार और पूरे देश में गरीबों के प्रति बेहद उदासीन रवैये का अक्स है।

सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का जो हाल है वह आज किसी भी सरकारी अस्पताल के बाहर (कुछ अपवादों के छोड़कर) और भीतर एक चक्कर लगाकर जाना जा सकता है। गांव देहात के इलाकों में तो स्वास्थ्य सेवाएं और डॉक्टर-नर्स नदारद हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों से सस्ती शिक्षा पाकर डॉक्टर बनने वाले छात्र दूर-दराज के इलाकों में जाकर काम नहीं करना चाहते। कुछ अपनी महत्वाकांक्षा की वजह से तो कुछ इन इलाकों में मूलभूत ढांचा न होना अपने अनमनेपन की वजह बताते हैं।

सच यह है कि जिस ग्रामीण भारत में आज भी भारत की 75 प्रतिशत आबादी रहती है वहां सरकारी बिस्तरों का केवल 16 प्रतिशत ही मयस्सर हैं। आज स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत दुनिया के सबसे कमज़ोर समझे जाने वाले देशों में है। हेल्थ पर केंद्र सरकार जीडीपी के एक प्रतिशत से बस जरा से अधिक खर्च करती है जबकि कम आय वाले देशों का औसत खर्च भी 1.4 प्रतिशत है। श्रीलंका 1.6 प्रतिशत, भूटान 2.5 प्रतिशत और थाइलैंड करीब 3 प्रतिशत खर्च करता है।

भारत स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति 1100 रुपये खर्च कर रहा है जबकि श्रीलंका का प्रति व्यक्ति खर्च भारत के प्रति व्यक्ति खर्च से 4 गुना अधिक है। प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि 2025 तक भारत स्वास्थ्य पर अपने जीडीपी का 2.5 प्रतिशत खर्च करेगा लेकिन बड़ा सच यह है कि शिक्षा के साथ स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र बन गया है जहां सरकार लगातार अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट रही है और निजीकरण की ओर ही बढ़ रही है।




अगर सरकारी अस्पताल खस्ताहाल हैं तो निजी अस्पतालों में दूसरी दिक्कत है। वह किसी पांच सितारा होटल की तरह चलाए जा रहे हैं। वहां गरीब आदमी की जान की न तो हिम्मत है और न ही हैसियत। गरीब आदमी तो क्या अच्छी खासी तनख्वाह पाने वाले लोग भी निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। वह भी बीमा कंपनियों के भरोसे हैं।

बीमा! जी हां बीमा। सरकार ने भी लुटे पिटे पब्लिक हेल्थ सिस्टम से बच निकलने का जो रास्ता अपनाया है वह बीमा ही है। केंद्र सरकार ने दो साल पहले आयुष्मान भारत योजना के तहत देश के 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपये तक का सालाना बीमा देने का जो वादा कर रही है, उसकी हकीकत क्या होगी वह इन सरकारी अस्पतालों के हाल देखकर समझा जा सकता है। यहां सफाई कर्मचारी एक्सपर्ट डॉक्टर की जगह ले चुके हैं और मरीज की जान भगवान भरोसे ही है।

आज स्वास्थ्य के मामले में मिजोरम, अरुणाचल और सिक्किम जैसे राज्य टॉप पर हैं जबकि बिहार और यूपी जैसी सबसे निचले पायदानों पर। राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य भी लड़खड़ा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर गांवों और शहरों में अच्छे अस्पतालों और डॉक्टरों के साथ इलाज का साजो-सामान नहीं होगा तो बीमा लेकर गरीब करेगा क्या? यह सवाल हम गांव कनेक्शन में पहले भी उठाते रहे हैं। पहली जरूरत स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी खर्च बढ़ाने की है।

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