'आदिवासियों के जमीन को निजी हाथों में बेचने की साजिश'

आदिवासियों के जमीन को निजी हाथों में बेचने की साजिश

मंगल कुंजाम

कम्युनिटी जर्नलिस्ट

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)। भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची में प्राप्त अधिकारों को बचाने के लिए हजारों की संख्या में आदिवासियों ने दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में विशाल रैली निकाली। अपने पारंपरिक व सांस्कृतिक वेषभूषा में सजे हुए 25000 ग्रामीणों ने किरन्दुल के फुटबाल मैदान में एकत्रित होकर एक पद यात्रा की, जिसमें उन्होंने बैलाडिला क्षेत्र में होने वाले निजीकरण का विरोध किया।

इस रैली में जिले के विभिन्न ग्राम पंचायतों के द्वारा विशाल ग्राम-सभा सम्मेलन कर 4 सूत्रीय मांगो को लेकर ज्ञापन दिया गया। ज्ञापन में बताया गया कि नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एन.एम.डी.सी.) द्वारा फर्जी ग्राम सभा आयोजित कर लोहे के खदानों को विभिन्न कंपनियों को लीज पर दिया गया।

फर्जी ग्राम सभा कर लीज आबंटित किये गए पंचायतों के लोगों को जब पता चला कि उनके जल, जंगल, ज़मीन को सरकार ने किसी कंपनी को दे रखा है तब उन्होंने 23 जनवरी 2019 को फिर से विशेष ग्राम सभा का आयोजन कर राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। हालांकि उसके बाद भी सरकार ने अभी तक कोई कार्रवाई नही की है।

पदयात्रा में भाग ले रहे आदिवासियों का आरोप है कि जिंदल स्टील ने फर्जी आधार पर एक पूरे ग्राम सभा को अधिग्रहित करने की 'साजिश' रची है। रैली में हिस्सा ले रहे 'सर्व आदिवासी समाज' के अध्यक्ष सुरेश कर्मा ने बताया कि, "इस रैली में लोग अपने मर्जी से पहुंचे हैं। रैली को प्रांत से लेकर संभाग के सर्व आदिवासी समाज का सहयोग मिला है। आज लोग अपने अधिकार समझ रहे है। सरकार के द्वारा फर्जी ग्राम सभा लगा कर आदिवासियों की ज़मीन लीज में दी जा रही है। उसका हम पुरजोर विरोध इस रैली में कर रहे है।"

आपको बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के ग्राम सभाओं को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। 1874 में अंग्रेजी शासनकाल दौरान ही 'शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्स एक्ट, 1874' के तहत अनुसूचित जिलों की स्थापना हो चुकी थी, जिसका आजादी के बाद संविधान की पांचवी अनूसूची में उल्लेख है।

इस संबंध में सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी में पता चला कि एन.एम.डी.सी. द्वारा गिने चुने लोगों का ही हस्ताक्षर लिया गया। जबकि अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभा छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम संशोधन 1993, में उल्लेखित धारा 129 (ख) के अनुसार, कुल व्यस्क मतदाताओं के एक तिहाई हस्ताक्षर के बाद ही किसी मसले पर ग्राम सभा की मंजूरी मानी जाती है।

जबकि इस मामले में 700 वयस्कों की जनसंख्या वाले ग्रामसभा की पंजी पर सिर्फ 106 लोगों के ही हस्ताक्षर हैं, जो कि कोरम को पूरा नहीं करते। इसके अलावा हस्ताक्षर पत्र में फर्जी अँगूठे लगाए गए, ऐसा भी प्रतीत होता है।






आदिवासियों ने पारंपरिक तरीके से दर्ज कराया विरोध

इस पदयात्रा में आदिवासी अपने पारंपरिक तीर धनुष और ढोल बाजे के साथ हजारों की भीड़ में पूरे 15 किमी तक आवाज़ बुलंद करते रहे। हज़ारों की तादाद में उपस्थित जनसभा को प्रदेश स्तर से पधारे वक्ताओ ने संबोधित किया जिसमें मनीष कुंजाम, सोहन पोटाई, छत्तीसगढ़ क्रांति सेना, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और प्रांतीय सर्व आदिवासी समाज के पदाधिकारी शामिल थे।

संविधान की पांचवीं अनुसूची व वनाधिकार कानून के जानकार वक्ताओं ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब ग्राम सभा के द्वारा नियमगिरी के पहाड़ पर खदान के विरोध में प्रस्ताव पारित किया गया तो सर्वोच्च न्यायलय ने वेदान्ता की खदान चालू करने की अर्जी को खारिज कर दिया था और निजी कंपनियों की मंशा पर विराम लगा दिया था। वैसे ही बैलाडिला के पहाड़ों पर चल रही एन.एम.डी.सी. की इस परियोजना को बंद कर देना चाहिए क्योंकि इससे आदिवासियों की आस्था और परम्पराओं पर आघात पहुंचता है।

इस बीच एन.एम.डी.सी. के सीईओ ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि उनको 2014 में ग्राम सभा का मंजूरी प्रस्ताव मिला। जबकि वहां की सरपंच बुधारी कुंजाम और ग्रामीणों ने इस ग्राम सभा को फर्जी बताते हुए विरोध प्रस्ताव पास किया। ग्रामीणों के अनुसार शासन के द्वारा जिस ग्राम सभा का प्रस्ताव दिखाया जा रहा है, उसमें कोरम भी पूरा नही है। गाँव की संख्या 700 से अधिक है जबकि इस ग्राम सभा के बारे में पंचायत के किसी भी ग्रामीण और जन प्रतिनिधियों तक को मालूम नही है।

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