अपनी मृत्यु का वक्त जानकर भी नहीं रोक पाए थे विवेकानन्द

अपनी मृत्यु का वक्त जानकर भी नहीं रोक पाए थे विवेकानन्दस्वामी विवेकानन्द।

बचपन का नरेन्द्र, जो बड़ा होकर स्वामी विवेकानन्द बना। दुनिया को अपने ज्ञान से प्रभावित करने वाले स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी को 1863 को हुआ था, जबकि 4 जुलाई 1902 को वो ये दुनिया छोड़ गए थे।

भारत की युवा शक्ति पर स्वामी विवेकानन्द को सबसे ज़्यादा उम्मीदें थीं। उन्होंने कहा था कि भारत इक्कीसवीं सदी में विश्व के मानचित्र पर अपना नाम रौशन करेगा, जो आज हो रहा है। स्वामी ने अपने जीवन और दुनिया को लेकर जो भी भविष्यवाणियाँ कीं, सब सच हुईं।

बहुत पढ़ाकू नहीं थे बाल नरेन्द्र

स्वामी विवेकानन्द बचपन में बहुत पढ़ाकू नहीं थे। उन पर लिखी किताब 'द मॉन्क एज़ मैन' के लेखक मणि शंकर मुखर्जी लिखते हैं कि स्वामी विवेकानन्द विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में महज़ 47 फीसदी अंक लेकर पास हुए थे। एफए, जिसे अब इण्टरमीडिएट आर्ट्स भी कहते हैं; में उनके 46 फीसदी अंक आए थे। बीए की परीक्षा उन्होंने 56 फीसदी अंकों से पास की थी।

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पिता की मृत्यु के बाद बड़े कष्ट से गुज़रे स्वामी

पिता की मृत्यु के बाद एक समय ऐसा आया, जब स्वामी विवेकानन्द के पास पैसे नहीं हुआ करते थे। 'आज दोपहर का खाना मैं अपने दोस्त के घर पर करूंगा', ये झूठ स्वामी विवेकानन्द ने कितनी ही बार अपनी मां से कहा जब उनके घर पर खाने की भी कमी थी।

स्वामी विवेकानन्द अपनी जवानी में बढ़िया कद-काठी के आदमी थे। उस समय की युवतियाँ उनको बहुत पसन्द करती थीं। कई बार बड़े घराने की लड़कियों ने उनको प्रेम प्रस्ताव भी भेजे लेकिन भगवान की खोज में पड़े स्वामी ने कहा, "अपनी इन तुच्छ इच्छाओं को दूर रखो और भगवान को पाने का प्रयास करो।"

अपनी मृत्यु का पता था स्वामी विवेकानन्द को

स्वामी विवेकानन्द को अपनी मृत्यु का पता था। जॉन पी फॉक्स को एक पत्र लिखते वक्त स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि, "मुझे साहस और उत्साह पसन्द है। मेरे समाज को इसकी बहुत ज़रूरत है। मेरा स्वास्थ्य कमज़ोर हो रहा है और बहुत समय तक मुझे ज़िन्दा बचने की उम्मीद नहीं है।"

स्वामी विवेकानन्द को पता था कि उनकी मृत्यु कब होगी। उनकी चेतना समय के साथ बढ़ती जा रही थी। इस बढ़ती चेतना को शरीर का संभाल पाना संभव नहीं था। विवेकानन्द कहते थे कि एक वक्त ऐसा आएगा जब मेरी चेतना अनन्त तक फैल जाएगी। उस वक्त मेरा शरीर इसे संभाल नहीं पाएगा और मेरी मृत्यु हो जाएगी।

स्वामी विवेकानन्द को थे इतने रोग

स्वामी विवेकानन्द अपनी 39 वर्षीय उम्र में इतने पीड़ित थे, जिसका कोई हिसाब नहीं था। स्वामी विवेकानन्द को उस वक्त गले में दर्द, किडनी में समस्या, दिल में समस्या, दाँईं आँख लाल होना, डायबिटीज़, माइग्रेन, टॉन्सिलटिस, अस्थमा, मलेरिया, बुखार, लिवर में समस्या, अपच, गैस्ट्रोएन्टेरिटिस, ब्लोटिंग, डायरिया, डिस्पेप्सिया, गॉल्सटोन जैसी 30 बड़ी गम्भीर बीमारियां हुईं। इसके बाद भी इस वक्त में स्वामी विवेकानन्द दैनिक काम किया करते थे।

जब खिचड़ी के लिये दरवाज़े को चढ़कर पार किया विवेकानन्द ने

अपनी मृत्यु से दो साल पहले 1900 में स्वामी विवेकानन्द विदेश से भारत आ गए। स्वामी विवेकानन्द अपने शिष्यों के साथ सीधा बेलूर मठ गए। वहाँ पता चला कि मठ में रात के खाने में उनकी मनपसन्द खिचड़ी बनी है। उनके रास्ते में एक बन्द दरवाज़ा मिला। विवेकानन्द सीधा दरवाज़े पर चढ़े और छलांग लगाकर पार कर गए।

स्वतन्त्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने बनाई विवेकानन्द के लिये चाय

स्वामी विवेकानन्द से मिलने बाल गंगाधर तिलक उनके पास बेलूर मठ आए। स्वामी विवेकानन्द ने उनसे चाय बनाने का आग्रह किया। बाल गंगाधर तिलक ने दूध, चाय पत्ती और शक्कर लेकर सभी के लिये मुगलई चाय बनाई।

जब स्वामी विवेकानन्द ने अंग्रेज़ों की गधों से तुलना कर चुटकी ली

स्वामी विवेकानन्द से किसी ने भारतीयों की एकता पर सवाल किया, "भारत में हर रंग के लोग पाए जाते हैं। काले, गोरे, भूरे, लाल, फिर भी आप सबमें एकता है।" स्वामी ने जवाब दिया, "घोड़े कितने रंग के होते हैं, काले, सफेद, भूरे हर रंग के फिर भी सब साथ रहते हैं। इसके विपरीत गधे केवल एक रंग के होते हैं, फिर भी सब अलग अलग रहते हैं।" स्वामी विवेकानन्द ने अंग्रेज़ों को गधा नहीं कहा, लेकिन बात सब तक पहुंच गई।

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