पराली जैसे कृषि अपशिष्ट के बिजली बनाने में इस्तेमाल से धुंध में आएगी कमी

दिल्ली और एनसीआर के लोगों के साथ ही ये किसानों के लिए भी अच्छी ख़बर है। शहर के लोगों को धुंध से राहत मिलेगी तो किसानों की आमदनी बढ़ेगी

पराली जैसे कृषि अपशिष्ट के बिजली बनाने में इस्तेमाल से धुंध में आएगी कमी

नई दिल्ली। पिछले कुछ वर्षों से सर्दियों में गहरी धुंध और प्रदूषण का सामना करने वाली दिल्ली को आने वाले कुछ वर्षों से इससे आजादी मिल सकती है। एक शोध में सामने आया है अगर कृषि अपशिष्टों का विद्युत संयंत्रों में इस्तेमाल होने लगे तो 2025 तक एनसीआर के प्रदूषण में 8 फीसदी तक कमी आ सकती है।

पिछले साल सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर के सांस लेना मुश्किल हो गया था। शहर में छाई धुंध के लिए पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने को बड़ी समस्या माना गया था। जिसके लेकर सरकार समाधान खोज रही थी, किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए कानून के साथ ही उन्हें खाद बनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है तो दूसरी तरफ पराली का आर्थिक पक्ष भी देखा गया था। बिजली बनाने के लिए एनटीपीसी में पराली का इस्तेमाल शुरु हुआ था।

एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन द्वारा संयुक्त रुप से किये गये एक अध्ययन में यह सुझाव गया है कि अगर फसल अवशेषों का विद्युत बनाने में उपयोग शुरु किया जाए तो 2025 तक प्रदूषण में कमी आ सकती है। इस अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में गर्मियों में 26 फीसद तक प्रदूषण वाहन उत्सर्जन जैसे अंदरुनी कारकों की वजह से फैलता है और यह सर्दियों में 36 फीसद तक बढ़ जाता है। उसमें सुझाया गया है कि विद्युत संयंत्रों में कृषि अपशष्टिों के इस्तेमाल से प्रदूषण में 2025 तक आठ फीसद कमी आ सकती है।

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धान की कटाई के बाद पराली जलाता किसान। फोटो-साभार

पिछले साल केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने खेतों में पराली जलाने के रिवाज में कमी लाने के लिए सरकारी विद्यत उत्पादक एनटीपीसी को अपने संयंत्रों में कोयला के साथ कृषि अपशष्टि मिलाने का निर्देश दिया था।

पराली जलाने से दिल्ली में हर साल घनी धुंध छा जाता है। इस अध्ययन के मुताबिक 2025 तक एलपीजी का उपयोग 75 फीसद तक और 2030 तक शत प्रतिशत तक पहुंच जाने से प्रदूषण छह फीसद घट सकता है। उसका कहना है कि ठोस ईंधन से गैस ईंधन की ओर कदम रखने से 2025 तक पीएम 2.5 और पीएम 10 स्तर में 2025 तक 12 फीसद की कमी आ सकती है।

अध्ययन में दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण स्तर के आकलन में दो तरीके अपनाए गए। पहला रिसेप्टर मॉडलिंग जिसके तहत शहर में 20 स्थानों पर पीएम 2.5 और पीएम 10 स्तर की निगरानी की गयी। दूसरा उन्नत रासायनिक परिवहन पहल था। (भाषा इनपुट के साथ)

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