'लड़कियां अगर ठान लें तो उन्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता'

दक्षिण के एक गाँव से निकली लड़की ने मन न लगने पर आईएएस की ट्रेनिंग छोड़ दी और यूएन विमेन में कर रही देश का प्रतिनिधित्व

गाँव कनेक्शनगाँव कनेक्शन   16 March 2019 11:45 AM GMT

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लखनऊ। "अगर कोई भी महिला, कोई भी लड़की एक बार मन में ठान ले, एक बार अपने मन में सोच ले तो उसे कोई रोक नहीं सकता," यह कहना है भारत में यूएन विमन की उप प्रमुख निष्ठा सत्यम का।

महिला दिवस (आठ मार्च) के मौके पर लखनऊ से 35 किमी दूर भारतीय ग्रामीण विद्यालय में गाँव की लड़कियों के सामने अपने अनुभव बताने शुरू किए तो हर लड़की के चेहरे में एक गर्व का अहसास था कि वह कोई भी मुकाम छू सकती है।

दक्षिण भारत के एक छोटे से गाँव तन्मोपुरी से निकल कर अमेरिका में संयुक्त राष्ट् के ऑफिस में नौकरी करने के अपने अनुभवों को साझा करते हुए निष्ठा सत्यम ने कहा, "जब मैं छोटी थी तो मुझे लगता था कि जो टीवी पर लोग दिखते हैं, या जो डायस पर बोलते हैं वो ये सिर्फ शहरों में होता है। ये सिर्फ उनके लिए होता है जो बड़े-बड़े स्कूलों में जाते हैं, अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं।''


उन्होंने आगे बताया, ''गाँव में 6-7 साल रहने के बाद मेरे वालिद साहब अमेरिका चले गए पढ़ने तो बिल्कुल ही गाँव से निकाल कर वो हमें अमेरिका ले गए। मुझे बिल्कुल अंग्रेज़ी नहीं आती थी। हम घर में तमिल बोलते थे। मुझे लगता था कि अंग्रेजी एक विषय है उसे बोलने की क्या ज़रूरत है? जैसे हम गणित बोलते थोड़ी ही हैं तो मुझे वहां जाकर बहुत तकलीफ हुई।''

अपने ग्रामीण जीवन के अनुभवों और करियर के उतार-चढ़ाव बताते हुए निष्ठा ने एक किस्सा सुनाया, ''जब मैं छोटी थी और अपने वालिद साहब से मिलने न्यूयार्क गई, तो उन्होंने मुझे सयुक्त राष्ट्र की बिल्डिंग के सामने उतारकर जल्दी में कहा यह यूएन की बिल्डिंग है, क्या आप यहां काम करेंगी? तो मैंने जल्दबाजी में बोला हां-हां मैं यहां काम करूंगी और उसके बाद मुझे तकरीबन 20 से 22 साल लगे लेकिन मैंने यूएन में काम किया।''

''मुझे खुशी है कि 190 से ऊपर के देश यूएन को मिलकर बनाते हैं, उनमें से मैं सबसे कम उम्र में देश का प्रतिनिधित्व कर रही हूं। अगर मैं कर सकती हूं तो मुझे लगता है कोई भी कर सकता है,'' निष्ठा आत्मविश्वास से कहती हैं।


अपने करियर के बारे में बताते हुए निष्ठा ने कहा, "मेरे वालिद साहब ने कहा कि आप आईएएस बनेंगी, तो आईएएस के पेपर दे दिए और पास भी हो गए। दो साल की मसूरी में ट्रेनिंग थी मेरा मन बिल्कुल नहीं था। मुझे पत्रकार बनना था, जर्नलिज्म के पेपर दिए, लेकिन वालिद साहब ने पत्रकार भी नहीं बनने दिया। हुआ यह पत्रकार भी नहीं बन पाए और आईएएस भी छूट गया," आगे बताती हैं, "

फिर हमने अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और बहुत ही मन से की, और सात साल हमने प्राईवेट सेक्टर के साथ काम किया।" निष्ठा आज इतनी कम उम्र में संयुक्त राष्ट्र में बहुत बड़ी अधिकारी हैं,

लड़कियों को एक महत्वपूर्ण बात बताते हुए कहा, ''महिलाओं के ज़िदगी में शिक्षा की जो जगह है वो किसी और चीज़ की नहीं हो सकती क्योंकि शिक्षा के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है।"

 

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