सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण भी दे रहे बड़ी कुर्बानी

सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण भी दे रहे बड़ी कुर्बानीसाफिया बेगम।

"हम यह नहीं चाहते कि भारतीय सेना को यह लगे कि संकट की घड़ी में हमने उन्हें अकेला छोड़ दिया है, हम उनके साथ हैं और हमें इसका फक्र है, लेकिन देश को हमारे हालात को भी देखना चाहिए"। ये कहना है 37 वर्षीय साफिया बेगम का। साफिया भारत-पाकिस्तान सीमा के पास रहती हैं। पाकिस्तान की ओर से हुए संघर्ष में अपना एक हाथ गंवा चुकी हैं, उनका छह साला का बेटा भी इससे बच नहीं सका, उसे भी एक आंख और हाथ खोना पड़ा।

जम्मू से 170 किलोमीटर दूर नॉशेरा सेक्टर का आखिरी गांव है पुखरानी। ये गाँव हमेशा भारत-पाकिस्तान के राजनीति और सैन्य कार्रवाइयों के बीच पिसता है। लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) से बमुश्किल 150 मीटर दूर स्थित यह गाँव पाकिस्तानी सेना के लिए एक आसान निशाना रहा है। बीते 16 वर्षो में इस गाँव के कई लोग अपनी जान गांव चुके हैं तो कई लोग शारीरिक रुप से अपंग।

साफिया बेगम भी उन्हीं बदकिस्मत लोगों में से एक हैं। साफिया पाकिस्तान की तरफ से युद्धविराम उल्लंघन में अपनी एक बाजू गवा चुकी हैं। सन 2002 में 37 वर्षीय साफिया बेगम की उम्र उस वक़्त 22 साल थी, जब वह इस घटना का शिकार हुईं। उस घटना को याद करते हुए साफिया बताती हैं "तब गर्मियों के दिन थे। सब लोग अपने अपने काम पर थे। मैं घर से कुछ दूर कुंए से पानी लेने गयी थी। तभी एकाएक दूसरी तरफ से फायरिंग होने लगी।

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मैं घर की ओर भागी, लेकिन मेरे घर पहुंचने से पहले एक मोर्टार मेरी बाजू पर गिर चुका था। जब मझे होश आया तब मैं राजौरी के हस्पताल में थी"। उस दिन को याद करते हुए आज भी साफिया की आंखें भर आती हैं। उस दिन दो देशों की आपसी खींचतान में साफिया का एक बाजू खत्म हो गया। लेकिन साफिया का दर्द वहीं नहीं थमा, अभी तो उसके जीवन में और जख्म आने थे।

इससे भी दुखद घटना तक हुई जब साफिया का 6 वर्षीय बेटा (जो अब 13 वर्ष का है) भी युद्धविराम उल्लंघन की चपेट में आ गया। उनके 6 साल के बेटे को मार्टार हमले में एक आंख और हाथ गंवाना पड़ा। बेटे के साथ हुई इस घटना ने साफिया बेगम को तोड़ दिया, लेकिन उनके हौंसले को डिगा नहीं पाया। देशप्रेम को कम नहीं कर पाया।

साफिया बेगम और उनका परिवार पाकितान की क्रूरता का ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की नजरअंदाजी का भी शिकार है। बीते 16 वर्षों में कोई सरकारी अफसर या नेता यहां नहीं आया जो साफिया बेगम जैसे परिवारों का गम बांट सके। मुआवजे के नाम पर कई बार सरकारी कागजों पर मुहर लग चुकी है, लेकिन हाथ जस के तस खाली हैं। 2014 से लगातार युद्धविराम उल्लंघन जारी है। इसी के चलते साफिया बेगम अपने बेटे को राजौरी भेज चुकी हैं ताकि वह सुरक्षित रहे।

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हमारे यह सवाल करने पर कि वह यह गांव छोड़ क्यों नहीं देतीं, वह कहती हैं "हम यह नहीं चाहते कि भारतीय सेना को यह लगे कि संकट की घड़ी में हमने उन्हें अकेला छोड़ दिया है, हम उनके साथ हैं और हमें इसका फक्र है, लेकिन देश को हमारी हालात भी देखनी चाहिए"।

एक तरफ जहां साफिया बेगम को पाकिस्तान से शांति की उम्मीद है तो वहीं भारत से अपनेपन की, लेकिन पिछले 16 वर्षों से उनकी उम्मीद मानो उस ईद के चाँद की तरह हो गई है जो कभी दिखा है नहीं और न ही आने की कोई उम्मीद।

जम्मू से गुरसिमरन सिंह

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