क्या गंगा में नहाकर सच में होती है रोगमुक्ति और धुल जाते हैं पाप !

हकीकत बताती है कि गंगा बेशक स्वर्ग की तरह पावन हिमालय की गोद से निकलती है, मगर अब गंगा पाप नहीं धो सकती। अब गंगा रोग मुक्ति नहीं कर सकती। तो क्या गंगा स्नान सिर्फ एक अंधविश्वास है या इसके पीछे सच में कोई तथ्य और विज्ञान भी है?

क्या गंगा में नहाकर सच में होती है रोगमुक्ति और धुल जाते हैं पाप !

हिमानी दीवान

हिमानी दीवान

गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है। गंगा मां है। गंगा स्वर्ग से आती है। गंगा में नहाने से रोग मुक्ति हो जाती है। पाप धुल जाते हैं। सिर्फ यही नहीं, गंगा नदी से ऐसी कई कहानियां जुड़ी हैं, जिन्हें सुनते-पढ़ते हुए कई सदियां गुजर चुकी हैं। मगर इन कहानियों के पीछे पिछले कुछ सालों से एक हकीकत लगातार दौड़ लगा रही है।

हकीकत बताती है कि गंगा बेशक स्वर्ग की तरह पावन हिमालय की गोद से निकलती है, मगर अब गंगा पाप नहीं धो सकती। अब गंगा रोग मुक्ति नहीं कर सकती। तो क्या गंगा स्नान सिर्फ एक अंधविश्वास है या इसके पीछे सच में कोई तथ्य और विज्ञान भी है?

प्रयागराज में कुंभ चल रहा है। तमाम श्रद्धालुओं और साधु-संन्यासियों के साथ-साथ वैज्ञानिक भी कुंभ मेले में पहुंचे हुए हैं। श्रद्धालु और साधु-संन्यासी गंगाजल में स्नान करने पहुंचे हैं और वैज्ञानिक गंगाजल की सैंपलिंग के लिए। इन वैज्ञानिकों में नीरी से जुड़े डॉ. कृष्णा खैरनर भी शामिल हैं। नीरी यानी नेशनल एन्वॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI), जिसने सीएसआईआर के सहयोग से गंगा जल पर रिसर्च की थी।

इस रिसर्च के नतीजे क्या निकले और असल में गंगा जल की शुद्धता से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य क्या हैं, जब इस पर डॉ. कृष्णा से बात हुई तो कई जरूरी जानकारियां सामने आईं। डॉ. कृष्णा कहते हैं, "गंगा के बारे में लोग ठीक तरीके से जानते नहीं हैं। जो गंगा को कानपुर में देखते हैं, उसे बस वही समझ लेते हैं। जो इलाहाबाद के संगम में देखते हैं, उनके लिए वहीं गंगा हो जाती है। जबकि ऐसा है नहीं।"

'हमने गंगाजल पर शोध किया है'

तो फिर है क्या? डॉ. कृष्णा तफ्सील से बताते हैं , "हमने गंगाजल पर शोध किया है। इस शोध में गोमुख से गंगा सागर तक पूरा पैच शामिल है। हमने गंगा के पूरे सफर को कवर करते हुए 128 जगहों पर सैंपलिंग की और ये जानने की कोशिश की कि गंगाजल में क्या खास है? यहां भी हम सैंपलिंग के लिए ही आए हुए हैं।"

वैज्ञानिक बेशक गंगा की खासियत पर अपने तरीके से शोध कर रहे हैं, मगर इतिहास बताता है कि राजा अकबर ने बिना शोध के ही गंगाजल को अमृत समान बताया था। वह सिर्फ गंगा से लाया गया जल ही पीते थे और यात्राओं के दौरान भी उनके लिए खास तौर पर गंगाजल पैक करके साथ भेजा जाता था।

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ब्रिटिश भी भारत से इंग्लैंड के सफर पर गंगा जल को सील बंद करके साथ ले गए थे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि गंगा जल में खास क्या है? इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए डॉ. कृष्णा ने जो शोध किया उसे तीन हिस्सों में बांटा। पहले हिस्से में गोमुख से हरिद्वार तक की गंगा शामिल थी, दूसरे में हरिद्वार से फरक्का तक की और तीसरे में फरक्का से गंगा सागर तक।

'गंगा जल में अनोखी विशेषताएं हैं'

नतीजों के बारे में डॉ. कृष्णा बताते हैं, "पहले हिस्से में टिहरी को छोड़कर गंगा के जल की गुणवत्ता वैसी ही अद्भुत पाई गई, जैसा जिक्र पुराणों में मिलता है। दूसरे हिस्से के सैंपल्स की जांच के बाद सामने आया कि गंगा का पानी पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं है यहां तक उसे खेती में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, इसी तरह तीसरे हिस्से का नतीजा भी काफी निराशाजनक रहा। पहले हिस्से में शामिल गंगाजल का अध्ययन बताता है कि उस पानी में अनोखी विशेषताएं हैं। वहां इंडस्ट्री और म्यूनिसिपल वेस्ट नहीं जाता है। अगर वह पानी कहीं गंदा भी हो रहा है, तो 2.7 किमी में वापस गंगा उसे खुद ही शुद्ध कर लेती है। यही गंगा की विशेषता है।"

जल पुरुष के नाम से दुनिया भर में मशहूर राजेंद्र सिंह भी मानते हैं कि गंगा जल विशेष है, मगर वह साथ ही कहते हैं कि ये विशेषताएं अब नहीं रहीं, जो किसी जमाने में हुआ करती थीं। राजेंद्र सिंह भी सालों से जल संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। गंगा जल संरक्षण से लेकर सफाई अभियान तक आने वाली सारी रिपोर्ट्स का उन्होंने अध्ययन किया है।

अब गंगा में नहाएंगे तो पाप मुक्त नहीं होंगे, उल्टा पाप लगेगा। जब गंगा में अविरलता थी, तब निर्मलता थी। अब न अविरलता है, न निर्मलता है। एक जमाना था जब गंगा जल में 17 तरह के रोगाणुओं को नष्ट करने की शक्ति थी, अब गंगा जल में वो शक्ति नहीं बची है। - राजेंद्र सिंह, जल पुरुष

वहीं नीरी से जुड़े डॉ. कृष्णा बताते हैं कि उन्होंने गंगा जल की एंटीबैक्टीरियल प्रोपर्टीज पर भी शोध किया है। शोध में सामने आया कि गंगा जल की सैंपलिंग के पहले हिस्से गंगा में ऐसे तत्व पाए गए, जो बीमार करने वाले बैक्टीरिया को मारते हैं। हालांकि इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई कि आखिर वो ऐसी क्या चीज है, जो बैक्टीरिया को मारने का काम करती है। इसे अभी भी एक्स फैक्टर ही कहा जा रहा है। ये एक्स फैक्टर सैंपलिंग के दूसरे और तीसरे हिस्से में नहीं मिला।

गंगा के शुरुआती हिस्से तक सीमित

कुछ अन्य रिपोर्ट्स और आंकड़े गंगा की सैंपलिंग के इस दूसरे और तीसरे हिस्से की कहानी कहते हैं। बताया जाता है कि हिमालय की चोटी से निकलने और बंगाल की खाड़ी में गिरने तक गंगा काफी मैली और ज़हरीली होती जा रही है। वायु पुराण में साफ कहा गया है कि गंगाजल में कभी कीड़े नहीं पड़े। स्कंदपुराण में इस बात का जिक्र है कि गंगाजल बासी होने पर भी खराब नहीं होता। लेकिन ये तथ्य और विश्वास सिर्फ उस गंगा के शुरुआत हिस्से तक सीमित है।

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2525 किलोमीटर के सफर में गंगा में 1.6 बिलियन टन कचरा गिरता है। इस आंकड़े के साथ गंगा दुनिया भर में सबसे ज्यादा कचरा ढोने वाली नदी बन चुकी है। संस्कृत में गंगा को बेशक त्रिलोकपथगामिनी यानी तीनों लोकों की देवी कहा गया है। मगर धरती पर आने के बाद 30 शहर, 70 कस्बों और हजारों गाँव से होते हुए जब गंगा गुजरती है तो इसमें औद्योगिक प्रदूषकों के साथ-साथ सीवेज का पानी भी गिरता है।

ऐसे में आस्था और तर्क से जुड़ा ये तथ्य फीका पड़ने लगता है कि गंगा में स्नान करने या इसका जल पीने से रोगों से मुक्ति या मोक्ष मिलता है। जो लोग इन दिनों कुंभ स्नान की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए अच्छी खबर ये हो सकती है कि कुंभ के दौरान गंगा जल को तमाम अशुद्धियों से मुक्त करने के लिए सरकार ने कुछ आदेश दिए हैं।

'क्या प्रयागराज 12 साल बाद कुंभ देख पाएगा?'

नीर फाउंडेशन के डायरेक्टर रमन त्यागी इस बारे में बताते हैं। कहते हैं, "मुझे चिंता है कि क्या प्रयागराज 12 साल बाद कुंभ देख पाएगा? क्योंकि गंगा की स्थिति चिंताजनक है। सरकार ने आदेश जारी किया है कुंभ के दौरान तीन महीने के लिए आसपास के सभी उद्योगों को बंद किया जाए। सरकार भी मानती है कि उद्योग धंधों से निकलकर गंगा में मिलने वाला पानी गंगा नदी को प्रदूषित कर रहा है। फिर भी सीवरेज पर लगाम लगाना मुमकिन नहीं हो पाया है।"

रमन त्यागी आगे कहते हैं, "गंगा इस समय सिर्फ 40 प्रतिशत बची है। 12 साल बाद कितनी बचेगी? इस बात की चिंता सिर्फ सरकार को ही नहीं, समाज को भी करनी चाहिए और उन संन्यासियों को भी, जो इन दिनों कुंभ आयोजन में हिस्सा लेने पहुंचे हैं। जहां तक गंगा की शुद्धता की बात है, तो अपने उद्गम में गंगा का फ्लो इतना ज्यादा है कि ये नदी वाइल्ड रिवर कहलाती है।"

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उन्होंने बताया, "पानी हवा और सूर्य की किरणों के साथ जमीन को छूते हुए जिस तरह गंगा जल तीनों तत्वों के समन्वय से बहकर निकलता है, उससे पानी की शुद्धता बढ़ती जाती है। कोई भी नदी जब अविरल बह रही है, तो 50 प्रतिशत खुद को यूं भी साफ कर लेती है।"

'आज गंगा मैली हो चुकी है'

इस बीच जब गंगा जल से जुड़ी कहानियों और हकीकत की तह तक जाने के लिए भूविज्ञानी प्रोफेसर बृजगोपाल से बात करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने काफी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है, "आज के जमाने में आप गंगा को पाप मुक्त करने वाली नदी बता रहे हैं, तो आप खुद पापी हैं। आज गंगा मैली हो चुकी है और आप कह रहे हैं कि गंदगी में पाप धुल रहे हैं। मैं तो कहता हूं पापी हैं वो लोग जो गंगा में गंदा पानी डाल रहे हैं।"


आखिर लोग गंगा में गंदा पानी क्यों डाल रहे हैं? इस बारे में टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज से जुड़े डॉ. चंद्र कुमार सिंह कहते हैं, "लोग आस्था में बहते हैं। उन्हें आस्था के दृष्टिकोण से ही समझाना होगा कि जिस गंगा में नहाकर वो मुक्ति और मोक्ष पाना चाहते हैं, वो गंगा भी आज मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही है। ग्लोबलाइजेशन के बाद से गंगा लगातार अशुद्ध होती जा रही है। कुंभ के दौरान बेशक तमाम तरह की रोक लगाई गई हैं, लेकिन तीन महीने बाद वही स्थिति शुरू हो जाएगी।"

डॉ. चंद्र कुमार कहते हैं, "नदी की सबसे बड़ी ताकत होती है उसका फ्लो। जब उस फ्लो को रोका जाता है, नदी कमजोर होने लगती है। फ्लो रोका जाता है, तो पानी रुकता है, पानी रुकता है तो उसमें जाने वाली अशुद्धियां जमा होने लगती है, जिससे जल प्रदूषित हो जाता है। गंगा अपने शुरुआती पड़ाव को पार करके जैसे-जैसे मैदानी इलाकों में आती है, उसमें गिरने वाले इंडस्ट्री और सीवेज के कारण वह अशुद्ध होने लगती है। हम विकास की बात करते हैं, लेकिन प्रकृति की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए।"

सिकुड़ रही है गंगा

मगर इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि विकास प्रकृति की कीमत पर ही हो रहा है। फिर भी आज का सच यह है कि कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु पहुंचे हैं। गंगाजल में डुबकी लगा रहे हैं। पाप धोने की कोशिश कर रहे हैं। कुंभ के इस नजारे को प्रयागराज में रहने वाले प्रोफेसर धनंजय चोपड़ा सालों से देख रहे हैं।

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प्रो. धनंजय चोपड़ा बताते हैं, "प्रयाग में गंगा का पाट बदलता रहता है। गंगा कभी पास आ जाती है, कभी दूर चली जाती है। गंगा के पानी का स्तर धीरे-धीरे कम ही हुआ है। जब तक गंगा में पानी नहीं छोड़ा जाता है, तब तक उसका स्तर बढ़ता नहीं है। वैसे भी गंगा का प्रदूषण आज का नहीं है। सालों से ये लगातार होता आ रहा है।"

वह आगे कहते हैं, "इतना बड़ा मेला लगा है। सबके रहने का इंतजाम किया गया है। शौचालय भी बनाए गए हैं। ऐसे में शौचालय का डिस्पोजल कहां हो रहा है... उसी गंगा के नीचे हो रहा है। अब ये सारा गंगा में प्रवाहित हो जाएगा, तो हम कैसी शुद्धता की बात कर रहे हैं। गंगा दिनों-दिन छोटी होती जा रही है, सिकुड़ती जा रही है। कभी नदी हमें जीवन देती थी। अब हमारी बारी है कि हम उसे जीवन दें क्योंकि उसका जीवन हमने ही छीना है।"

कुंभ और गंगा स्नान से जुड़े अनुभव पर प्रयागराज के सुधीर कुमार कहते हैं, "मैं छह-सात साल की उम्र से गंगा स्नान से जुड़ा रहा हूं। जब भी यहां कुंभ आयोजित हुआ है, हर बार मैंने यहां डुबकी लगाई है। सन 90 में जब घाट के पास पहुंचते थे फिसलन होती थी। अब साल दर साल इंतजामों में तो सुधार हो गया है, लेकिन गंगा के पानी का स्तर खराब हुआ है।"

सुधीर कहते हैं, "1994 में गंगा साफ दिखती थी। इसके बाद से जलस्तर कम होता गया। एक वो भी दौर था जब हम गंगा जी में दूर तकर निकल जाते थे और घुटनों तक पानी रहता था। मगर जैसे-जैसे शहर का विकास होता गया नालों की संख्या बढ़ती गई। इन नालों का पानी गंगा में गिरता गया और गंगा मैली होती गई। कुंभ के दौरान पानी साफ करने के लिए कई इंतजाम किए जाते हैं, मगर तीन महीने बाद हाल फिर वही हो जाता है।"

कैसे जानेंगे पानी शुद्ध या नहीं

वैज्ञानिक डॉ. कृष्णा कहते हैं, "पानी को केवल देखकर नहीं बताया जा सकता कि वो अच्छा है या नहीं। पानी देखने में साफ दिख सकता है, लेकिन हो सकता है कि उसमें हानिकारक कैमिकल हों। वहीं पानी मटमैला हो सकता है, लेकिन पीने में हो सकता है कि वह हानिकारक ना हो।" वैसे इंटरनेट पर सर्च करें, तो ऐसे भी कई प्रयोग पढ़ने को मिलते हैं, जिनसे पीएच का स्तर मापकर पानी की शुद्धता पता करने का दावा किया जाता है। मगर वैज्ञानिक इसे ठीक नहीं मानते हैं।

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