'मारपीट की वजह से मेरी आंख में खून जम गया था, मैं रिश्‍ता बचा रही थी'

भारत में मौजूद लड़कियों और महिलाओं की आबादी का करीब-करीब आधा हिस्‍सा अपने पार्टनर द्वारा की गई शारीरिक या यौन हिंसा का कभी न कभी शिकार होती हैं।

Ranvijay SinghRanvijay Singh   8 Jan 2019 9:50 AM GMT

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मारपीट की वजह से मेरी आंख में खून जम गया था, मैं रिश्‍ता बचा रही थी

लखनऊ। ''एक बार मेरे पति ने मेरी आंख के पास घूंसा मार दिया था। मेरी आंख में और उसके आस पास खून का थक्‍का जम गया। आंख के पास बिल्‍कुल स्‍याह घेरा बन रहता। मैं इसे बाहर वालों से छिपाती रहती। मैं बस रिश्‍ता बचाना चाहती थी।'' ये बात बताते हुए निधि भावुक हो जाती हैं। निधि करीब 5 साल तक घरेलू हिंसा को झेलती रहीं और जब हालात बद से बदतर हो गए तो अपने पति से अलग होने का फैसला लिया। निधि की तरह भारत में मौजूद लड़कियों और महिलाओं की आबादी का करीब-करीब आधा हिस्‍सा अपने पार्टनर द्वारा की गई शारीरिक या यौन हिंसा का कभी न कभी शिकार होती हैं।

हाल ही में टीवी कलाकार टीना दत्‍ता ने एक इंटरव्‍यू में बताया कि वो पांच साल त‍क घरेलू हिंसा का शिकार हुई हैं। उनका ब्‍वॉयफ्रेंड उन्‍हें पीटता था। वो इतने दिनों तक इसलिए खामोश रहीं क्‍योंकि वो इस रिश्‍ते को बचाना चाहती थीं। यानी घरेलू हिंसा आम से लेकर खास तक के साथ हो रही है।

नेशनल हेल्‍थ सर्वे के मुताबिक, भारत में 15 से 50 साल के बीच की 31 प्रतिशत महिलाएं कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार हुई हैं। शहरी महिलाओं में करीब 25.3 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। वहीं, ग्रामीण महिलाओं में 34.1 प्रतिशत महिलाओं ने इस दंश को झेला है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 71% महिलाओं के साथ उनके पार्टनर ने कभी ना कभी शारीरिक या यौन हिंसा या फिर दोनों ही करते हैं। ऐसे में स्‍थ‍िति का आंकलन किया जा सकता है। इन मामलों को जानने के बाद मन में सबसे पहला सवाल उठता है कि आखिर महिलाएं इतना कुछ झेल क्‍यों रही हैं?


इसका जवाब भी हिंसा झेल चुकी महिलाएं ही देती हैं। ''मुझे उससे प्‍यार था। इसलिए घर वालों से बगावत करके उससे शादी की थी। शुरुआत के कुछ महीने सब अच्‍छा रहा। मुझे उसके साथ होने से बहुत खुशी थी। लेकिन फिर हालात बदलने लगे। अब वो जब तब दफ्तर से देर रात को आने लगा। आता तो नशे में होता। बात बात पर चिड़चिड़ा जाता और हाथ छोड़ना तो उसकी आदत हो गई थी।'' अपने पुराने दिनों को याद करते हुए निधि बताती हैं।

''आप किसी से कुछ नहीं कह सकते, क्‍योंकि आपका आत्‍मविश्‍वास खत्‍म हो जाता है। मैं बस रिश्‍ता बचाना चाहती थी। ये नहीं चाहती थी कि लोग मुझे गलत समझें।'' निधि कहती हैं

आज निधि अपने बुरे दौर से निकल आई हैं और खुद का बिजनस चला रही हैं। निधि कहती हैं, ''शायद मैंने उसे छोड़ने में देर कर दी। अगर फैसला जल्‍द लिया होता तो इतना कुछ न झेला होता। खैर, जो हुआ उससे सीखा बहुत। इंसान को परखने का नजरिया मिला है।'' निधि मजबूत थीं तो शायद देर सबेर अलग होने का फैसला ले पाईं, लेकिन बहुत से मामलों में महिलाएं जीवन भर या बहुत ही लंबे वक्‍त तक घरेलू हिंसा को झेलती रहती हैं। कई बार पुरुष भी पीड़ित होते हैं, लेकिन महिलाओं के मुकाबले उनका प्रतिशत काफी कम है।


घरेलू हिंसा को झेलते रहने पर अगर बात करें तो इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं, जिसमें से एक वजह जो खुलकर सामने आती है वो यह है कि महिलाएं अंत तक रिश्‍ते को बचाने का प्रयास करती हैं। साथ ही मारपीट करने वाले लोग एक पल को प्‍यार करते हैं और दूसरे ही पल मारपीट। ऐसे में महिलाएं तय ही नहीं कर पाती कि उन्‍हें फैसला क्‍या लेना है।

इसी झेलने की प्रवृत्ति या मजबूरी पर घरेलू हिंसा की शिकार रहीं पूजा बताती हैं, ''हमारी शादी 2004 में हुई। मैंने 7 साल तक मारपीट और गालियों के अलावा कुछ देखा ही नहीं। मेरा पति बुरी तरह मारपीट करता और फिर माफी मांगता था। मुझे लगता कि सब सही हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वो माफी सिर्फ इस लिए मांगता था ताकि मैं किसी से शिकायत न करूं।''

''मेरे दो बच्‍चे हैं। मेरे पास कोई आर्थ‍िक आधार नहीं था। मैं पूरी तरह से अपने ससुराल पर निर्भर थी। ऐसे में कहां जाती, क्‍या करती। यही सब सोचकर मैं झेलती गई, लेकिन ये दिन पर दिन बढ़ रहा था। रोज बुरा हो रहा था।'' - पूजा बताती हैं

घरेलू हिंसा झेल चुकी ज्‍यादातर औरतें मानती हैं कि उन्‍हें इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि उनकी मदद कैसे हो सकती है। पूजा कहती हैं, ''मुझे मालूम ही नहीं था की शिकायत किससे करूं। कोई मेरे मदद क्‍यों करेगा। वहीं, कोर्ट कचहरी में तो बहुत वक्‍त लग जाता है। ये सब सोचकर मैं चुप रहती थी।''

सुप्रीम कोर्ट की वकील प्रज्ञा पारिजात स‍ि‍ंह।

घरेलू हिंसा पर कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट की वकील प्रज्ञा पारिजात स‍ि‍ंह बताती हैं, ''घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम' बहुत ही मजबूत कानून है। इस कानून में एक पिटिशन पर ही कई सारे ऑर्डर लिए जा सकते हैं। जैसे- प्रोटेक्‍टशन ऑर्डर, कंपनसेशन ऑर्डर, मेंटिनेंस ऑर्डर, रेसिडेंशल ऑर्डर। प्रोटेक्‍टशन ऑर्डर के तहत महिला को पुलिस सुरक्षा दी जाएगी। कंपनसेशन ऑर्डर में उसे जो भी उसके साथ बुरा हुआ उसकी भरपाई के लिए आदेश पारित किया जाएगा। मेंटिनेंस ऑर्डर में पति को पत्‍नी के मेंटिनेंस का खर्च उठाना होगा। वहीं, रेसिडेंशन ऑर्डर में पत्‍नी उसी घर में रहकर भी केस लड़ सकती है। हालांकि रेसिडेंशन ऑर्डर में सबसे ज्‍यादा खतरा महिला को ही होता है, क्‍योंकि उसी घर में रहना जहां आपके साथ हिंसा हुई है, वो सही नहीं है। लेकिन अगर महिला के पास कहीं रहने का आसरा नहीं तो यह आदेश भी सही है।''

प्रज्ञा पारिजात कहती हैं, ''महिलाओं को घबराने की जरूरत नहीं है। ये फास्‍ट ट्रैक मामला होता है। महिलाओं को एक प्रोटेक्‍शन ऑफिसर भी मिलता है। वो लगातार महिला के संपर्क में रहेगा साथ ही इस बात की जांच भी करेगा कि महिला के साथ कुछ बुरा तो नहीं हो रहा। महिलाओं को सबसे पहले पुलिस में कंप्‍लेन करने से घबराना नहीं चाहिए। अपने इलाके के महिला थाने में शिकायत कर सकती हैं या किसी जानने वाले से भी शिकायत करवाई जा सकती है। इसके बाद महिला थाना अपने स्‍तर से मामले को सुलझाने की कोशि‍श करेगा। अगर तब भी पीड़िता को लगता है कि सब सही नहीं है तो वो समझौते से मना कर सकती है। इसके बाद महिला थाने से मजिस्‍ट्रेट के पास रिपोर्ट चली जाएगी, जहां इस मामले में कार्यवाही होगी। इसके अलावा महिलाएं सीधे कोर्ट में भी जा सकती हैं।''

''सबसे पहले शिकायत करना जरूरी है। अगर आप शिकायत करेंगी तब ही आपकी मदद हो सकेगी। चुप रहने से कुछ नहीं होगा। आपको अपनी आवाज उठानी होगी। कमजोर न बनें, कानून आपके साथ है।'' - प्रज्ञा पारिजात सुप्रीम कोर्ट की वकील

इन नंबरों पर मिलेगी मदद

- शक्‍ति शालिनी: 1091/1291 (011) 23317004

- सार्थक: (011) 26853846/26524061

- ऑल इंडिया विमन कॉन्‍फ्रेंस: 10921/ (011) 23389680

- जागोरी: (011) 26692700

- वुमन पावर लाइन: 1090

- पुलिस: 100

(पहचान छिपाने के लिए पीड़िताओं के नाम बदल दिए गए हैं)

 

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