जन्मदिन विशेष: स्पेस प्रोग्रामर के नाम से जाने जाते थे विक्रम साराभाई

जन्मदिन विशेष: स्पेस प्रोग्रामर के नाम से जाने जाते थे विक्रम साराभाईविक्रम साराभाई साथ में उनकी फैमली।

लखनऊ। महज 28 साल की उम्र में एक वैज्ञानिक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में हुआ था। विक्रम साराभाई को इंडिया के स्पेस प्रोग्राम के फादर के नाम से भी जाना जाता है। साराभाई का विवाह मशहूर क्लासिकल डांसर मृणालिनी साराभाई के साथ साल 1942 को हुआ था।

उन दिनों साराभाई का परिवार स्वतंत्रता अभियान में शामिल था। शादी के समय महात्मा गाँधी द्वारा चलाया जा रहा भारत छोड़ो आन्दोलन चरम पर होने के कारण समारोह के दौरान साराभाई के परिवार का एक भी सदस्य मौजूद नहीं था। पत्नी मृणालिनी साराभाई का जन्म 11 मई 1918 को केरल में हुआ था।

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जब अब्दुल कलाम को सुबह 3.30 बजे मिलने बुलाया

विक्रम साराभाई के साथ एक रोचक किस्स मशहूर है बात है जनवरी 1968 की। अब्दुल कलाम साहब को मैसेज मिला कि साराभाई दिल्ली में उनसे अर्जेंट मिलना चाहते है। कलाम साहब उस समय त्रिवेंद्रम में थे लिहाजा त्रिवेंद्रम से दिल्ली जाना उस दौर में आसान नहीं था। फिर भी कलाम साहब दिल्ली पहुंचे और साराभाई के ऑफिस गये। उन्हे होटल अशोक में सुबह 3.30 बजे पहुंचने को कहा गया इसके अलावा सराभाई के सेक्रेटरी ने कुछ भी नहीं बताया। अब्दुल कलाम दिन में ही वहां चले गए और होटल की लॉबी में वेट करने लगे। वहां डिनर करना उन्हें बहुत महंगा पड़ता इसलिए वो होटल के बाहर एक सड़क किनारे की दुकान से खाना खा आये। वापस आकर उन्होंने खुद को साराभाई का मेहमान बताया। इस पर उन्हें एक शानदार लाउंज में ले जाया गया। मीटिंग के बाद जब डॉक्टर साराभाई ने कलाम को होटल के बाहर ड्रॉप किया तो वो इस अटपटी टाइमिंग की वजह समझ गए। दरअसल अगली सुबह ही प्रधानमंत्री से उनकी मीटिंग थी।

साराभाई के बारे में पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन अब्दुल कलाम कहते हैं, “मुझे प्रोफ़ेसर विक्रम साराभाई ने इसलिए नहीं स्पॉट किया था क्योंकि मैं मेहनती था। जब उन्होंने मुझे एक युवा साइंटिस्ट के तौर पर स्पॉट किया, मैं काफी एक्सपीरियंस्ड हो चुका था। उन्होंने मुझे और सीखने की आज़ादी दी। मुझे तब चुना जब मैं बहुत नीचे था। सीखना मेरी ज़िम्मेदारी थी। अगर मैं फ़ेल होता तो वो मेरे साथ खड़े रहते। एक अच्छा लीडर, चाहे वो पोलिटिकल हो, चाहे साइंस की फील्ड में हो या उद्योग में, हमेशा सक्सेस का हक़ अपने छोटों को देता है। फेलियर को वो अपने सर ले लेता है. अच्छे नेता की सबसे बड़ी खूबी यही है।”

ऐसे खुला आईआईएम अहमदाबाद

बात उस समय की है जब साराभाई और कमला चौधरी की 20 साल की कहानी का द एंड हो रहा था। उन दिनों कमला ATIRA (अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज़ रिसर्च एसोसिएशन) में नौकरी करती थीं। ऐसा माना जाता है कि साराभाई से दूर जाने के लिये दिल्ली स्थित डीसीएम से आए ऑफर को एक्सेप्ट करने का विचार कर रहीं थी। बतौर कक्कड़ साराभाई ने हरसंभव कोशिश की कि कमला अहमदाबाद से न जायें।

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इसके लिये उन्होंने फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री की डायरेक्टरशिप ऑफर की। उसके बाद लंदन के टैविस्टाक इंस्टिट्यूट से रिक्वेस्अ की कि उनका एक सेंटर अहमदाबाद में भी खोल दिया जाये। जब साराभाई की सारी मेहनत पर पानी भिर गया तब उन्होंने भारतीय सरकार से पैरवी करी जिसके बाद बॉम्बे को छोड़कर अहमदाबाद में आईआईएम खुलवाया गया और कमला चौधरी उसकी पहली रिसर्च डायरेक्टर बनीं।

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