पाणी नथी: 'इस गांव में मैं अकेला शख्स बचा हूं, गांव के सभी लोग यहां से चले गए'

साहब अली गुजरात के जिस गाँव में रहते हैं वहां 650 से ज्यादा घर हैं, लेकिन सब के सब खाली हैं। सूखे के चलते यहां के रहने वाले लोग अपने जानवरों को लेकर गाँव से पलायन कर गए हैं।

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   10 May 2019 9:17 AM GMT

पाणी नथी:

मिथिलेश धर दुबे/रणविजय सिंह

कच्छ (गुजरात)। ''इस गाँव में मैं अकेला शख्स बचा हूं। गाँव के सभी लोग यहां से चले गए, यह अकाल बहुत खतरनाक है,'' यह बात गुजरात के कच्छ जिले के बन्नी ग्रास लैंड के गाँव नानासराडा के रहने वाले साहब अली (40 वर्ष) कहते हैं।

साहब अली जिस गाँव में रहते हैं वहां 650 से ज्यादा घर हैं, लेकिन सब के सब खाली हैं। सूखे के चलते यहां के रहने वाले लोग अपने जानवरों को लेकर गाँव से पलायन कर गए हैं।

गुजरात का कच्छ जिला लगातार तीसरे साल सूखे की चपेट में है और इस बार पिछले 20 साल के बाद ऐसा भीषण सूखा पड़ा है। इस वजह से स्थिति भयावह हो चली है। कच्छ के बन्नी ग्रास लैंड में तो स्थिति और भी खतरनाक है। यहां कई गाँव के लोग अपने जानवरों को लेकर पलायन कर दूसरे क्षेत्रों में जा रहे हैं।

बन्नी ग्रासलैंड कुल 2,500 स्क्वायर किमी में फैला हुआ है। कच्छ का यह तालुका देश के कई बड़े जिलों से भी बड़ा है, जबकि पूरा जिला 45,000 स्क्वायर किमी में फैला हुआ है।

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गुजरात के कच्छ जिले के बन्नी ग्रास लैंड के नानासराड़ा गाँव में सूखे की चपेट में ग्रामीण। फोटो: रणविजय सिंह

सूखा पड़ने में मवेशियों के लिए भी समस्या

कच्छ में पिछले 35 साल से पानी और पारिस्थितिकी तंत्र (इको सिस्टम) पर काम कर रही संस्था सहजीवन के कार्यकारी निदेशक डॉ. पंकज बताते हैं, "बन्नी ग्रास लैंड एरिया में रहने वाले लोगों के आय का मुख्य साधन मवेशी पालन होता है। यहां एक-एक मालदार (पशुपालक) के पास 50 से लेकर 300 तक या इससे भी ज्यादा मवेशी होते हैं। ऐसे में ग्रास लैंड में लोगों से ज्यादा मवेशियों की संख्या होती है और सूखा पड़ने पर मवेशियों के चारे और पानी की समस्या पैदा हो जाती है।''

वर्ष 2012 में जब पशु जनगणना हुई थी तब कच्छ में कुल 19 लाख मवेशी थे, ये जिले की आबादी 20 लाख के लगभग के बराबर है। इन मवेशियों में भैंस, गाय, बकरी और ऊंट हैं। ऊंटों की संख्या 10 लाख के आसपास बताई गयी थी।

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बन्नी ग्रास लैंड के होड़कों के पास ही अलादीन युसूफ मुम्बा (25 वर्ष) बंजारों की तरह अपने परिवार और 300 गायों को लेकर रह रहे हैं। अलादीन बताते हैं, ''मैं 10 किमी दूर मिसरियाडा गाँव का रहने वाला हूं। सूखे की वजह से वहां चारा और पानी की दिक्कत हो गई, इस कारण गाँव छोड़ना पड़ा है।''

अलादीन ने बताया कि अभी जहां उन्होंने अपना डेरा जमाया है इससे पहले वो यहां से 40 किमी दूर गए थे, लेकिन वहां चारे की व्यवस्था नहीं हो पाई तो उन्हें यहां आना पड़ा। अब वो जहां है यहां कैटल कैंप (मवेशियों के लिए कैंप) से एक पशु पर ढाई से तीन किलो चारा मिल रहा है।

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'बहुत छोटा था तब ऐसा भयानक सूखा देखा था'

अलादीन इस बार पड़े सूखे पर कहते हैं, "मैं 25 साल का हूं, बहुत छोटा था तब ऐसा भयानक सूखा देखा था। मेरी ही तरह मेरे गाँव के सैकड़ों लोग अलग-अलग दिशा में अपना घरबार छोड़कर निकल चुके हैं। अब हम अपने घरों में वापस तभी जाएंगे जब अच्छी बारिश होगी।"

मैं 25 साल का हूं, बहुत छोटा था तब ऐसा भयानक सूखा देखा था। मेरी ही तरह मेरे गाँव के सैकड़ों लोग अलग-अलग दिशा में अपना घरबार छोड़कर निकल चुके हैं। अब हम अपने घरों में वापस तभी जाएंगे जब अच्छी बारिश होगी।
- अलादीन युसूफ मुम्बा (25 वर्ष), बन्नी ग्रास लैंड, कच्छ, गुजरात

अलादीन युसूफ बताते हैं कि सूखे की चपेट में आकर कई उनके कई पशुओं की मौत हो गई। पास ही तख्त पर लेटे एक बुजुर्ग की ओर इशारा करते हुए वो कहते हैं, ''सबसे ज्यादा इसके डोर (पशु) मरे हैं।''

तेरह दिसंबर, 2018 को जारी राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (एसएलबीसी) की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात के 401 एक गाँव सूखे की चपेट में हैं। इनमें से 50 फीसदी या अधिक फसलों के नुकसान वाले गाँवों की सबसे ज्यादा संख्या कच्छ जिले की है। स्टेट इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर के आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2018 में कच्छ में औसतन जितनी बारिश होनी चाहिए थी उसका 25 फीसदी ही हुई है। आईएमडी के अनुसार, कच्छ में 2017 में औसत वर्षा में 56.58 फीसदी की कमी थी। कच्छ में 320 एमएम (मिली मीटर) औसत बारिश मानी गई है।

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'इस बार का सूखा इसलिए भी भयावह'

एरिड कम्युनिटी एंड टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. योगेश जडेजा इस बार के सूखे की भयावहता और इसके कारणों को बताते हुए कहते हैं, ''इस बार का सूखा इसलिए भी ज्यादा भयावह है क्योंकि सन 2000 के बाद से कच्छ में बारिश ठीक हो रही थी। नब्बे के दशक में कई बार सूखा पड़ा और लोगों के रहन-सहन का तरीका बदल गया। लोग पहले जैसे सूखे से निपटने के लिए तैयार रहते थे, उन्हें लगा कि अब स्थिति बुरी नहीं होगी, लेकिन प्रकृति के आगे किसकी चली है।"

डॉ. योगेश आगे कहते हैं, "पिछले साल बारिश नहीं हुई और इस साल यह सूखा पड़ गया। अब ऐसे में जो लोग सूखे को पिछले 20 साल में भूल चुके थे, उनके लिए यह आफत बनकर आया है।'' एरिड कम्युनिटी एंड टेक्नोलॉजी 14 साल से कच्छ में भूजल को लेकर काम कर रही है।

योगेश जडेजा से मिलती-जुलती बात कच्छ की जिलाधिकारी (डीएम) रम्या मोहन भी कई स्थानीय मीडिया संस्थानों से कह चुकी हैं। उनका भी कहना है कि 'यह सूखा पिछले 20 साल में आया सबसे बड़ा सूखा है, इसलिए इसका असर ज्यादा देखने को मिल रहा है।' हालांकि बन्नी ग्रास लैंड के कई इलाकों में नर्मदा कैनाल से पाइप लाइन के माध्यम से पानी आ रहा है, लेकिन इतना नहीं कि लोगों और पशुओं की प्यास बुझा सके।

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'सूखे के पीछे कई वजह हैं'

डॉ. योगेश जडेजा आगे बताते हैं, ''सूखे के पीछे कई वजह हैं। सबसे पहले कि लोग अपनी परंपरा को भूल गए कि उन्हें मानसून में पानी का संग्रह करना होता है और इसी पानी का गर्मियों में इस्तेमाल करना होता है।"

वह आगे कहते हैं, "यह परंपरा ग्रासलैंड के इलाके में बहुत पहले से चली आ रही थी, जोकि नर्मदा से लाए गए पानी की वजह से भुला दी गई। लोग पहले झील विधि (आबत सिस्टम) के द्वारा पानी संचय करते थे और गर्मियों में गड्ढा खोदकर इस पानी का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब यह सिस्टम लोग छोड़ते जा रहे हैं। इस वजह से दिक्कत बढ़ रही है।''

डॉ. योगेश जडेजा कहते हैं, ''साथ ही लोग पहले सूखे के हिसाब से पशुओं की संख्या भी आज के मुकाबले कम रखते थे, लेकिन सन 2000 के बाद मौसम में आए बदलाव और दूध मार्केट के बढ़ने से ग्रासलैंड में रहने वाले लोगों ने बहुतायत में पशुओं को रखना शुरू किया। हाल यह हुआ कि जो बैलेंस होना चाहिए था वो पूरी तरह से बिगड़ गया। अब हल्का भी सूखा पड़ेगा तो मालदारी परेशान होंगे और पशुओं को बचाने के लिए पलायन को मजबूर।''

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