ग्रामीण भारत में जागरुकता के अभाव और भ्रम के कारण जांच करवाने, टीका लगवाने में हिचक रहे लोग

कोरोना ग्रामीण भारत में बढ़ता जा रहा है। गांवों से लगातार मौत की खबरें आ रही हैं। लोगों को बुखार, दस्त, खांसी जैसे कोरोना के लक्षण हैं बावजूद इसके ज्यादातर जगहों पर लोग कोविड-19 जांच और टीकाकरण से पीछे हट रहे हैं, एक वर्ग को अभी भी लगता है उन्हें कोरोना नहीं हो सकता।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   8 May 2021 3:00 PM GMT

ग्रामीण भारत में जागरुकता के अभाव और भ्रम के कारण जांच करवाने, टीका लगवाने में हिचक रहे लोग

टीकाकरण को लेकर ग्रामीणों में कई तरह के भ्रम हैं। (फोटो- अरेंजमेंट)

"गांव में कई लोग बीमार हैं, लेकिन कोई जांच नहीं करवा रहा है। लोगों को डर है कि जांच कराने से कोरोना हो जायेगा। लोग टीका भी नहीं लगवा रहे हैं। शुरू में तो गांव के आधे से ज्यादा लोगों ने टीका लगवा लिया था, लेकिन उसके बाद कई लोगों को बुखार आ गया है। अब बाकी के बचे लोगों को लगता है कि टीका लगवाने से उन्हें भी बुखार हो जायेगा, इस कारण लोग टीका नहीं लगवा रहे हैं।" ये कहना है 24 वर्षीय तरुण मिश्रा का।

तरुण वैसे तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं लेकिन कॉलेज बंद होने की वजह से प्रयागराज से लगभग 300 किलोमीटर दूर जिला सीतापुर के तहसील सिधौली के गांव पतारा खुर्द में हैं।

"लोगों में जागरुकता की कमी है। मेडिकल स्टोर से कोई भी दवा लेकर खा ले रहे हैं। बड़ी बात तो यह है कि इन सब मामलों को लेकर गांवों में किसी भी तरह का जागरुकता कार्यक्रम भी नहीं चल रहा।" तरुण चिंतित होते हुए कहते हैं।

उत्तर प्रदेश में सीतापुर जिले से लगभग 900 दूर झारखण्ड के जिला जामतारा के ब्लॉक नाला के गांव गोपालपुर में रहने वाले नीलेश कुमार ठाकुर (25 वर्ष) भी तरुण की ही तरह चिंतित हैं।

वे कहते हैं, "लोग सर्दी खांसी से पीड़ित हैं, लेकिन जांच इसलिए नहीं करा रहे हैं कि अगर कहीं कोरोना निकल आया तो लोग उनसे दूरी बना लेंगे। लोग भ्रम के कारण टीका भी नहीं लगवा रहे। मेरे घर से लगभग 30 किमी दूर पश्चिम बंगाल का जिला आसनसोल है। वहां वैक्सीन लग रही है।"

कोविड का टीका लगने के बाद कई लोगों को बुखार आ जाता है। इसीलिए स्वास्थ्यकर्मी टीका लगाने के बाद व्यक्ति को पेरासिटामोल देते और हैं कहते हैं कि अगर जरूरत लगे तो खा लेना। डॉक्टरों के मुताबिक किसी भी तरह के टीके के बाद बुखार आना सामान्य बात है। लेकिन इस बुखार को लेकर कोरोना से जोड़कर देख रहे हैं।

"मेरे यहां से जमतारा मुख्यालय 40 किमी दूर है। ऐसे में लोग आसनसोल टीका लगवाने जाते थे, लेकिन पता नहीं किसने गांव के लोगों को बता दिया है कि टीका लगवाने से बीमार हो जायेंगे जिसके बाद कोरोना हो जायेगा। इस डर के कारण लोग टीका भी नहीं लगवा रहे। पिछली बार गांवों में इतना डर नहीं था, लेकिन इस बार लोग डरे हुए हैं।" नीलेश आगे कहते हैं।

एक तरफ तो केंद्र सरकार लगातार टीकाकरण बढ़ाने पर जोर दे रही है, लेकिन आंकड़े बता रहे हैं टीकाकरण अभियान सुस्त पड़ता जा रहा है। देशभर में टीकाकरण की रिपोर्ट बताने वाली सरकारी वेबसाइट के cowin.gov.in के आंकड़ें को देखें तो 7 अप्रैल से 6 मई के बीच टीकाकरण में 30 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है।

सात अप्रैल को देशभर में कुल 34,26,224 टीके लगे, इसमें से 31,36,775 टीके का पहला डोज और 2,89,449 दूसरा डोज था। इसकी तुलना में 6 मई को देशभर में 23,59,633 टीके लगे जिसमें 10,57,318 पहला डोज और 13,02,315 दूसरा डोज शामिल है। ऐसे में जब कोरोना की बढ़ती रफ़्तार को देखते हुए ज्यादा टीके लगने चाहिए तो आंकड़ें नीचे आ रहे हैं।

देशभर में टीकाकरण की स्थिति। (सोर्स-https://dashboard.cowin.gov.in/)

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी पिछले एक महीने में टीकाकरण में काफी गिरावट आयी है। प्रदेश में पहला टीका 12 अप्रैल को लगा था तब फर्स्ट और सेकंड डोज मिलाकर 5 लाख से ज्यादा डोज लगे थे, इसकी तुलना में 6 मई को डेढ़ लाख से थोड़ा ज्यादा (दोनों डोज मिलाकर) टीका ही लग पाया।

ऐसा क्यों हो रहा है? इसके लिए कुछ लोग टीके को अनुपलब्धता को जिम्मेदार मान रहे हैं तो कुछ लोग भ्रम और जागरुकता की कमी को कारण बता रहे हैं।

पिछले 30 दिनों में उत्तर प्रदेश में टीकाकरण की स्थिति। https://dashboard.cowin.gov.in/

मध्य प्रदेश के जिला छिंदवाड़ा के ग्राम सांवली में रहने वाले रमेश दलदले ने टीका के लिए 1 मई को रजिस्ट्रेशन करवाया था। उनके पास मैसेज आया कि नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर आपको 5 मई को टीका लगेगा।

"पांच मई को मैं सेंटर पर गया, लेकिन वहां बताया गया कि अभी टीके की खेप नहीं आई है। आज 8 मई हो गए लेकिन अभी तक मैं टिका नहीं लगवा सका हूँ।"

टीकाकरण के मामले में मध्य प्रदेश की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। प्रदेश में 7 अप्रैल को साढ़े तीन लाख से ज्यादा डोज लगे थे जबकि एक महीने बाद 6 मई को यह आंकड़ा लगभग 98 हजार पर आ गया। एक महीने में टीकाकरण अभियान में 30 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है।

मध्य प्रदेश में पिछले 30 दिनों में टीकाकरण की स्थिति।

राजस्थान के जिला सिरोही, ब्लॉक गांव गुलाबगंज में रहने वाले 25 वर्षीय गोविन्द वैष्णव का मानना है कि जागरुकता की कमी और भ्रम के कारण टीकाकरण नहीं हो पा रहा। वे खुद अपना अनुभव शेयर करते हुए गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "मेरे घर में कई लोगों को कोरोना हो गया था। हालाँकि अब लोग स्वस्थ्य हैं। मेरी माँ आशा कार्यकर्ता हैं। मैं एक दिन उनके एएनएम सेंटर गया जहां टीका लग रहा था। वहां आये लोगों को मां टीके के फायदे के बारे में बता रही थीं, लेकिन लोग टीका लगवाने को राजी ही नहीं हुए।"

वो आगे बताते हैं, "मैंने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि हमारे बेटे बाहर रहते हैं, उन्होंने वैक्सीन लगवाने को मना किया है। तब मैंने उनको उदाहरण दिया कि प्राइम मिनिस्टर ने लगवाया, चीफ मिनिस्टर लगवा रहे, लेकिन फिर भी लोग नहीं मान रहे थे। कुछ लोग तो मेरे मुंह पर बोलकर गए कि साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों को वैक्सीन इसलिए दे रहे हैं कि वे मर जाएं और उन्हें पेंशन न देनी पड़े।"

बात अगर टीकाकरण की करें तो राजस्थान की स्थिति मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से भी ख़राब है। पिछले एक महीने के रिकॉर्ड को देखें तो प्रदेश में 7 अप्रैल को साढ़े 5 लाख से ज्यादा टीके लगे थे और 6 मई को ये आंकड़ा लगभग 97 हजार पर आ गया। लगभग 80 फीसदी गिरावट दर्ज की गयी।

जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़ी राजस्थान की छाया पचौली गाँव कनेक्शन को बताती हैं, "मुझे लगता है अभी भी गाँव में वैक्सीन को लेकर लोगों में डर है, वे अभी भी नहीं जा रहा है, क्योंकि जिस तरह से गाँव-गाँव में वैक्सीन लगनी शुरू हुई, उस तरह से लोग नहीं आ रहे हैं। मन में अभी भी लोगों के संदेह है, इसलिए गाँव में जाकर लोगों को जागरूक करना और लोगों के मन की शंका को जब तक दूर नहीं किया जाएगा, तब तक कितना भी गाँव में टीकाकरण शुरू हो जाए लोगों को जिस तरह से आना चाहिए लोग नहीं आ रहे हैं। क्योंकि आप किसी को जबर्दस्ती नहीं ला सकते हैं, जब तक लोग खुशी से खुद न आ जाएं।"

राजस्थान में पिछले 30 दिनों में टीककरण की स्थिति।

हरियाणा के जिला फतेहाबाद के गांव पिरथला के विकास विश्नोई (22वर्ष ) दिल्ली में रहते हैं और हिंदू कॉलेज से मास्टर कर कहते हैं, वे कहते हैं कि उनके गांव में तो लोग टीके को लेकर फेक न्यूज़ के शिकार हैं। वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "गांवों में लोग कह रहे हैं कि टीका लगवाने से हम मर जायेंगे। बहुत लोगों की तबियत ख़राब है लेकिन फिर वे लोग जांच नहीं करवा रहे हैं जबकि मेरे गांव में 11 लोगों को कोरोना है इस समय। फिर भी लोग टीका नहीं लगवा रहे हैं। लोगों को जागरूक करने की जरूरत है।"

कई जगहों पर तो लोगों ने टीके का पहला डोज लगवाया, लेकिन वे दूसरा डोज नहीं लगवा रहे हैं। बिहार के जिला औरंगाबाद के हंसपुरा प्रखंड के गांव कैथी बनकट में रहने वाले मारुत नंदर शरण (22 वर्ष) भी अपने गांव की यही कहानी बताते हैं।

वे फोन पर बताते हैं, "अप्रैल के पहले सप्ताह में गांव में टीका लगाने वाले लोग आये थे। लगभग 800 की आबादी वाले गांव में पहले दिन तो 110 लोगों ने टीका लगवाया। इसके बाद कई लोगों को बुखार हो गया। इससे गांव में डर फ़ैल गया। फिर जब दूसरे दिन वैक्सीन लगाने वाले लोग आये तो केवल 35 लोगों ने ही वैक्सीन लगवाया। बुखार आने के बाद से लोग डर गए। फिर किसी ने टीका नहीं लगवाया, लेकिन अब लोगों का थोड़ा डर ख़त्म हुआ है जिसके बाद आज (8 मई) को कई लोगों ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाकर टीका लगवाया।"

जागरूकता की कमी के कारण लोग टीका लगवाने के कतरा रहे हैं। (फोटो- अरेंजमेंट)

कोरोना अभी भी अबूझ पहेली है। कोरोना को लेकर जारुकता फैलाने के उद्देश्य से ग्रामीण भारत में कई जगह वॉल पेंटिंग कराई गई थी, छींक आने, बुखार, खांसने, स्वाद का जाना आदि को ही प्रमुख लक्षण माना गया था लेकिन कोरोना ने नए स्टेन में पेट दर्द, दस्त, सिर दर्द भी प्रमुख हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला हापुड़ के सबली गांव में रहनी वाली तरु त्यागी जो पेशे से स्कूल टीचर (प्राइवेट स्कूल) हैं, वे भी अपने गांव को लेकर परेशान हैं। वे कहती हैं, "मैं दूसरों की क्या बात करूं, मेरी मम्मी ही कहती हैं कि इंजेक्शन में पानी है और कुछ नहीं। डर और भ्रम के कारण मेरे गांव में कोई टीका लगवाने के लिए तैयार नहीं है।" तरु ने बताया कि उनके गांव की आबादी लगभग 3000 है।

फिर उपाय क्या है?

लम्बे समय से स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर लिखने वालीं कॉलमिस्ट पत्रलेखा चटर्जी इन सबके लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार बताती हैं। वे कहती हैं, "पहली बात तो सरकार को पता ही नहीं था कि कोरोना गांवों में इतनी तबाही मचाएगा। गांवों में लोगों को टीका लगेगा कि नहीं, इसे लेकर भी कोई नीति नहीं थी। अब सरकार को जरूरी लग रहा है।"

पत्रलेखा कोरोना के लिए पोलियो के स्तर के जागरुकता अभियान की जरुरत बताती हैं, ""लोगों का भ्रम दूर करने के लिए सबसे अच्छा और आसान तरीका है कि पहले तो आशा कार्यकताओं को घर-घर भेजें और दूसरा कारगर तरीका यह है कि धर्म गुरुओं को आगे लाया जाये। हमने पोलियो के खिलाफ अभियान के समय भी यह देखा था। सरकार को बिना देरी किये उस गांवों की तरफ ध्यान देना होगा तभी लोगों का टीके को लेकर भ्रम खत्म होगा।"

पत्रलेखा यह भी कहती हैं कि गांवों में लोग अभी कहते हैं कि हमें तो कुछ होगा नहीं, लोगों का यह भ्रम तोड़ना होगा क्योंकि कोरोना का वायरस गांव यह शहर नहीं देखता।

देश में 8 मई तक टीकाकरण की स्थिति

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आईएमएस के न्यूरोलॉजिस्ट और सरसुंदर लाल चिकित्सालय के पूर्व मेडिकल सुपरिंटेंडेट डॉ विजय नाथ मिश्र सुझाव देते हैं कि गांव के बड़े-बुज़ुर्गों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक गुरुओं को पहले टीका लगवाकर उदाहरण पेश करना चाहिए और उसका प्रचार-प्रसार करना चाहिए।

वे कहते हैं, "लोगों को विश्वास दिलाना होगा कि टीका ही इस महामारी से बचा सकता है। इसके लिए जिला प्रशासन को स्थानीय अख़बार और रेडियो की मदद लेनी चाहिए। जागरूकता ही लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करेगी। एक तरीका यह भी है कि गांव-गांव डुगडुगी बजवाकर लोगों को जागरूक करना होगा। "

देशभर में टीककरण की बात करें तो सरकार के अनुसार 8 मई की शाम 5 बजे तक 16,73,46,544 करोड़ लोगों को टीका लग चुका है। राज्यवार आकंड़े देखें तो 8 मई तक सबसे ज्यादा टीका महाराष्ट्र में (1,76,17,719) में लगा है। 1,38,41,990 टीकाकरण के साथ राजस्थान दूसरे, फिर गुजरात (1,36,06,684) तीसरे और उत्तर प्रदेश चौथे (1,34,70,982) नंबर पर है।

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