इस दुर्गा पूजा पर पश्चिम बंगाल के ज्यादातर मूर्तिकारों के चेहरे पर छायी है मायूसी

दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए कारीगर पिछले दो-तीन महीने से रोजाना 17 से 18 घंटे मेहनत कर रहे हैं। उसके बावजूद उनकी कमाई काफी कम है। वो परेशान हैं क्योंकि कच्चे माल, जैसे कि मिट्टी और पुआल की लागत बढ़ गई है। 300 कारीगरों वाले हावड़ा के प्रसस्थ गाँव से एक ग्राउंड रिपोर्ट

Gurvinder SinghGurvinder Singh   28 Sep 2022 8:43 AM GMT

प्रसस्थ (हावड़ा), पश्चिम बंगाल। हावड़ा जिले के प्रसस्थ गाँव के लगभग हर परिवार में एक न एक मूर्ति कारीगर मौजूद हैं। इस गाँव में मूर्तियों को तैयार करने वाली वर्कशॉप में 300 से ज्यादा शिल्पकार अपने काम में बड़ी शिद्दत के साथ जुटे है और 17 से 18 घंटे लगातार काम कर रहे हैं. इनमें से कुछ चौथी या पांचवीं पीढ़ी के शिल्पकार भी हैं।

दुर्गा पूजा करीब है, 1 अक्टूबर से शुरू होकर 5 अक्टूबर तक चलने वाले इस उत्सव को लेकर लोगों के मन में अथाह उमंगे हैं। पश्चिम बंगाल के इन हजारों लोगों की ये खुशी सिर्फ इसलिए नहीं है कि मां दुर्गा उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आती हैं और उनकी पूजा की जाती है, बल्कि इसलिए भी है कि बहुत से लोगों की आजीविका उत्सव के अवसर पर मिलने वाले काम से जुड़ी है.

प्रसस्थ गाँव के 74 वर्षीय कारीगर दिलीप कुमार मंडल ने गाँव कनेक्शन को बताया, "मैं पिछले साठ सालों से मूर्तियां बना रहा हूं। बचपन में अपने पिता के साथ काम करना शुरू किया था।" वह आगे बताते हैं कि दुर्गा पूजा का मतलब मूर्ति कारीगरों के लिए समृद्धि और मुनाफे का समय है। लेकिन कच्चे माल की बढ़ती लागत और कम कमाई के कारण स्थिति अब वैसी नहीं रही।


राज्य की राजधानी कोलकाता से लगभग 25 किलोमीटर दूर प्रसस्थ गाँव के एक अन्य शिल्पकार बिजय पाल ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हम हर दिन कम से कम 17-18 घंटे काम कर रहे हैं। लेकिन, कड़ी मेहनत के बावजूद, हमें ज्यादा मुनाफे की उम्मीद नहीं है। क्योंकि कच्चा माल काफी महंगा मिल रहा है।"

कच्चे माल के आसमान छूते दाम

पाल ने कहा, "यह सच है कि दो साल बाद बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा हो रही है और लोगों में काफी उत्साह है। हम भी खुश हैं क्योंकि हमने दो साल में पहली बार काम मिला है। लेकिन इस बार हमारी कमाई बहुत ज्यादा होने वाली नहीं है।"

35 साल के कारीगर रमेश हलदर ने गाँव कनेक्शन को बताया, "दो साल पहले मूर्तियां बनाने के लिए 13 टन मिट्टी की कीमत 10,000 रुपये थी. इस साल हमें ये 14 हजार की पड़ी है।"

उन्होंने कहा कि देवी को सजाने के लिए जो नकली आभूषण तकरीबन एक हजार रुपये में आ जाते थे, अब उनकी कीमत 1,500 रुपये है। हलदर ने बताया, "मूर्ति बनाने में इस्तेमाल होने वाले भूसे की कीमत 50 रुपये से दोगुनी होकर 100 रुपये प्रति किलो हो गई है और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते ट्रांसपोर्टेशन की लागत भी बढ़ गई है।"


उनके मुताबिक, दुर्गा की नौ फुट की मूर्ति बनाने में 40,000 रुपये का खर्च आता है और वह सिर्फ 45,000 रुपये में बेची जाती है। उन्होंने बताया कि शिल्पकारों को स्किल के आधार पर अपने सहायकों और हेल्परों को प्रतिदिन 800 रुपये से 12,00 रुपये के बीच देने पड़ते हैं।

मंडल ने कहा, "अगर हालात ऐसी ही रहे तो कारीगर मूर्ति बनाना बंद कर देंगे। क्योंकि रोजाना 17 से 18 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद मूर्ति बनाने में आम तौर पर दो से तीन महीने लग जाते हैं।"

पाल के अनुसार, पूजा का आयोजन करने वाले भी पैसों की कमी की समस्या से जूझ रहे है। इसलिए वे भी मूर्तियों के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयार नहीं हैं।


उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा, "आयोजक अपनी जेब ढीली करने को तैयार नहीं हैं. हम इस साल फायदे की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। लेकिन कम से कम इनपुट लागत निकालने की कोशिश तो कर ही सकते हैं।"

आयोजकों ने गिनाई अपनी मजबूरियां

पूजा आयोजकों की भी अपनी मजबूरियां हैं. हावड़ा जिले के अंदुल क्षेत्र के बड़े टिकट आयोजकों में से एक आमर सबई दुर्गोत्सव कमेटी के सदस्य प्रबीर चटर्जी ने गांव कनेक्शन को बताया। "COVID के बाद दान में भारी कमी आई है। बहुत बड़ा आर्थिक संकट है। हम घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन लोग बहुत कम दान दे रहे हैं।" उन्होंने कहा कि विज्ञापनदाता भी पीछे हट रहे हैं।

उन्होंने कहा, "मूर्ति खरीदने के अलावा हमारे पास और भी कई खर्च हैं. इस साल दुर्गा पूजा के आयोजन की लागत 15 लाख रुपये आ रही है।"

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