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'पहले जो कमाई 500 रुपए से ऊपर होती थी, आज 100 रुपए भी नहीं होती'

दिल्ली में कई ई-रिक्शा चालक, जो किराये पर लेकर रिक्शा चलाते थे, लॉकडाउन लगने के पहले-दूसरे सप्ताह में अपने गाँव को लौट गए। जो नहीं जा सकें, वे अभी भी बहुत दयनीय स्थिति में हैं। इस उम्मीद से कि लॉकडाउन के खुलते ही काम मिल जायेगा लेकिन स्थिति अब भी सुधरी नहीं है।

Jagannath JagguJagannath Jaggu   22 July 2020 3:48 PM GMT

लॉकडाउन के चार महीने बीतने के बाद भी कम नहीं हो रहीं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की मुश्किलें। फोटो : गाँव कनेक्शन

लॉकडाउन से असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले मजूदर, कारीगर, रिक्शा-ऑटो चालकों को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचा है। रोज कमा कर अपना पेट भरने वाले इन लोगों के रोजगार छिन गए। चार महीने बीतने के बाद भी इनके सामने मुश्किलें जैसे किसी पहाड़ जैसी सामने खड़ी हैं।

दिल्ली में कई ई-रिक्शा चालक, जो किराये पर लेकर रिक्शा चलाते थे, लॉकडाउन लगने के पहले-दूसरे सप्ताह में अपने-अपने गाँव को लौट गए। जो नहीं जा सकें, वे अभी भी बहुत दयनीय स्थिति में हैं। इस उम्मीद से कि लॉकडाउन के खुलते ही काम मिल जायेगा लेकिन स्थिति अब भी सुधरी नहीं है।

बिहार के मधुबनी जिले से राम कुमार (45 वर्ष) क़रीब 30 साल पहले रोजगार के तलाश में दिल्ली आए थे। पिछले पांच सालों से राम बैटरी वाली ई-रिक्शा चलाते हैं। किराये के मकान में रहते हैं इसलिए रिक्शा खड़ा करने की जगह नहीं है। हर दिन चार्ज़ करने के लिए बिजली और पार्किंग के लिए जगह किराये पर लेनी पड़ती है, रोज का 150 रुपए के हिसाब से। पूरे लॉकडाउन के दौरान ई-रिक्शा पार्किंग में ही खड़ा रहा।

राम कुमार 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "लॉकडाउन में ई-रिक्शा बिल्कुल नहीं चला लेकिन पार्किंग के किराये तो देने ही पड़ते है। कमाई हो नहीं रही है इसीलिए अभी पार्किंग मालिक को भी किराया नहीं चुका पाया हूँ। कुछ वक़्त मांगा हूँ उनसे। अभी तो लॉकडाउन खुला हैं मगर सवारी नहीं मिल रही है।"

राम कुमार शास्त्री नगर मेट्रो स्टेशन के नीचे ई-रिक्शा लगाते हैं और आसपास के तीन-चार किलोमीटर के दायरे में सवारियों को सेवा देते हैं। वह कहते हैं, "लॉकडाउन खुला लेकिन मेट्रो अभी भी बंद है इसीलिए सवारी नहीं मिल रही। कमाई का जरिया बिल्कुल बंद है। पता नहीं कब सब ठीक होगा।" दिल्ली विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन के आसपास के क्षेत्रों और नॉर्थ कैंपस में ई-रिक्शा चलाने वाले महेंद्र पंडित विश्वविद्यालय मेट्रो ई-रिक्शा संघ से जुड़े हुए हैं। महेंद्र बताते हैं, "पिछले चार महीने से लॉकडाउन की वजह से जीवन-यापन करना मुश्किल हो गया। सभी जमा पूंजी खाने और मकान के किराये देने में खर्च हो गई। यह सिर्फ मेरी हालत नहीं है, कमोबेश सभी ई-रिक्शा चालकों का हाल है।"

पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने और चार्जिंग करने का भी पैसा नहीं निकाल पा रहे ई-रिक्शा चालक। फोटो : गाँव कनेक्शन

महेंद्र कहते हैं, "जिनके पास अपनी रिक्शा नहीं था, वे सभी अपने गाँव को लौट गए हैं। हमारे जैसे लोग नहीं लौट पाएं क्योंकि हम पूरे परिवार के साथ यहीं बसे हुए हैं। जाने-आने में भी हजारों का खर्च हो जाता है।"

बिहार के पटना जिला के रहने वाले महेंद्र बताते हैं, "विश्वविद्यालय मेट्रो पर लगभग 300 ई-रिक्शा पंजीकृत हैं जो आसपास के क्षेत्रों में ई-रिक्शा चलाते हैं। लेकिन आज हालत यह है कि मुश्किल से 5-10 ई-रिक्शा खड़े होते हैं क्योंकि मेट्रो बंद है और सवारी भी संक्रमित होने के डर से रिक्शा पर नहीं बैठना चाहती है।"

जीटीबी नगर से शक्ति नगर, कमला नगर और अन्य आसपास के इलाकों में ई-रिक्शा चलाने वाले राजेश झा बताते हैं, "जो कमाई 500 रुपए से ऊपर होती थी, आज 100 भी नहीं पार कर पाता।" भरी दोपहर में बातचीत के दौरान उन्होंने बताया, "अभी महज़ 60 रुपए कमाई हुई है। ई-रिक्शा चार्ज करने तक के पैसों की कमाई नहीं हो पाती। मज़बूरी है इसीलिए इस उम्मीद में चलाते हैं कि आज बेहतर होगा, कल बेहतर होगा, लेकिन अब उम्मीद भी टूटती नज़र आ रही है। दिल्ली सरकार तीन महीने राशन दी है, जिससे किसी तरह गुज़ारा हुआ। अब तो वो भी नही मिल रहा है।"

जनवरी 2020 में बुराड़ी कल्याण मंडल द्वारा दायर सूचना के अधिकार के तहत दिल्ली में 45 हज़ार से अधिक ई-रिक्शा पंजीकृत हैं। लेकिन इसी कल्याण मंडल से जुड़े महेंद्र बताते हैं कि दिल्ली में पंजीकृत से कहीं अधिक गैर-पंजीकृत ई-रिक्शा सड़कों पर चलते हैं जिसकी संख्या अनुमानतः डेढ़ लाख के आसपास होगी।

लॉकडाउन के दौरान बेरोजगार हुए कई ऑटो, ई-रिक्शा, ग्रामीण सेवा, टैक्सी चालकों से दिल्ली सरकार द्वारा 5,000 रुपये सीधे बैंक खाता में आर्थिक मदद दिए जाने के सम्बन्ध में सवाल पूछा तो कुछ लोग थे जिन्होंने 'हाँ' में जवाब दिया।

लॉकडाउन में सरकार की ओर से यह आर्थिक उन रिक्शा चालकों को मिली जिनके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस था। वैध ड्राइविंग लाइसेंस और वैध बैज वाले लोग ही इसका फायदा उठा सकते हैं। कई लोगों के पास बैज की वैधता समाप्त हो गई इसीलिए उन्हें योजना के लाभ से वंचित रखा गया है।

मगर एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पंजीकृत से दोगुने चालक गैर-पंजीकृत वाले हैं जो सीधे तौर पर इस योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। साथ ही किराये पर ई-रिक्शा चलाने वाले चालक भी इस योजना के लाभ से वंचित हैं। केंद्र या राज्य सरकार ने ऐसे लोगों के लिए कुछ किया हो, फिलहाल ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा है।


दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने मई के शुरुआती दिनों में कहा था कि दिल्ली सरकार को अब तक 1.6 लाख ऑटो, टैक्सी, ई-रिक्शा और ग्रामीण सेवा के चालकों के आवेदन प्राप्त हुए हैं। इसमें से अब तक 43,000 चालकों के बैंक खाते में पांच हज़ार रुपए की रकम ट्रांसफर कर दी गई है। यह डाटा मई के प्रथम सप्ताह का है, लेकिन गैर-पंजीकृत और किराये वाले चालकों के सवाल अब भी गौण है।

उत्तर प्रदेश के महुआ के रहने वाले हरिश्चंद्र तिमारपुर में रहते हैं। फाइनेंस पर ई-रिक्शा लेकर चलाते हैं। हर महीने किश्त भरते हैं लेकिन लॉकडाउन लगने की वजह से पिछले 3-4 महीने से किश्त नहीं भर पा रहे हैं। फाइनेंस कंपनी वाले बार-बार घर पर आकर उनसे तकादा करते हैं।

हरिश्चंद्र कहते हैं, "सरकार ने 31 अगस्त तक के लिए क़िस्त भरने की छूट दी हैं, इसके बावजूद कंपनी वाले बार-बार क़िस्त भरने के लिए परेशान करते हैं। वो कहते हैं कि तीन महीने की छूट थी। अब क़िस्त भरने होगी वरना पनैल्टी (लेट फाइन) देने होंगे।"

यूपी के ही रायबरेली के कमलेश जो तीन लोगों के साथ एक किराये के कमरे में रहते हैं, किराए पर ही ई-रिक्शा चलाते हैं, बताते हैं, "अगर हम मालिक के घर से रिक्शा निकालते हैं तो हमें उन्हें ढाई सौ रुपये देने ही पड़ते है, चाहे मेरी कमाई जितनी हो। पहले मालिक को किराया देकर भी तीन सौ रुपये से अधिक बचा लेता था लेकिन अभी किराया देने तक का पैसा नहीं कमा पाते।"

कमलेश कहते हैं, "रिक्शा मालिक को बोल दिए हैं कि उन्हें बाद में देंगे क्योंकि अभी खुद के खाने के लिए भी मुश्किल से ही कमा पाते हैं।" वह कहते हैं, "हम जिस हालात में हैं, इसके जिम्मेदार सरकार ही है। दिल्ली सरकार द्वारा लॉकडाउन में पाँच हज़ार की सहायता भी हमें नहीं मिल सकी।"

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