आर्थिक सर्वेक्षण 2018 : क्यों कम हो रही है कामकाजी महिलाओं की संख्या 

आर्थिक सर्वेक्षण 2018 : क्यों कम हो रही है कामकाजी महिलाओं की संख्या आर्थिक सर्वेक्षण 2018

आपने अपने घरों में देखा होगा कैसे आपकी नौकरी या कोई रोजगार न करने वाली मां, बहनें, बीवी थोड़े - थोड़े रुपये जोड़ती रहती हैं। कुछ महिलाएं तो ऐसी भी होती हैं जो आटे, चावल के डिब्बे में रुपये छुपाकर रखती हैं। वैसे तो कुछ लोग महिलाओं की इस आदत का मज़ाक उड़ाते हैं लेकिन थोड़ा थोड़ा करके इकट्ठा किए हुए उनके ये रुपये घर की बड़ी ज़रूरतों में काम आते हैं। ये तो वो महिलाएं हैं, जो खुद पैसे नहीं कमातीं लेकिन इन्हें जो थोड़े - बहुत पैसे मिलते हैं उससे ही ये घर की कई मुसीबतें आसान कर देती हैं तो सोचिए अगर हर घर की महिला कामकाजी हो जाए और पैसे कमाने लगे तो परिवार की आर्थिक परेशानियां कितनी आसानी से दूर हो जाएंगी।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रबंध निदेश क्रिस्टीन लेगार्ड ने ‘वीमेंस एंपावरमेंट: एन इकोनॉमिक गेम चेंजर' नामक कार्यक्रम में कहा था कि भारत की राष्ट्रीय आय में 27 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है अगर यहां के कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के स्तर के बराबर हो जाए। लेकिन फिलहाल ये स्थिति बिगड़ती जा रही है। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018 में सामने आया है कि वित्त वर्ष 2005-06 में 36 फीसदी महिलाएं कामकाजी थीं, जिनका स्तर 2015-16 में घटकर 24 फीसदी पर आ गया जबकि भारत में 2006 में महिलाओं की साक्षरता दर 50.82 फीसदी थी जो 2015 में बढ़कर 62.98 फीसदी हो गई। यानि 10 साल में महिलाओं के रोजगार में 12 फीसदी की कमी और साक्षरता में 12 फीसदी की बढ़ोतरी।

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ग्लोबल जेंडर रिपोर्ट 2015 के मुताबिक, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसर सूचकांक के मामले में 144 देशों में भारत 136वें नंबर पर रहा, यहां तक कि इस रिपोर्ट में नेपाल और बांग्लादेश भी भारत से काफी आगे थे। इन सारे आंकड़ों से ये पता चलता है कि हमारे देश में महिलाओं की सुधरती स्थिति और उनके लिए बेहतर माहौल बनाने की चाहे जितनी बातें कर ली जाएं ये हक़ीकत कुछ और ही है। 2017 में भारत विकास रिपोर्ट में कामकाजी महिलाओं की स्थिति में 131 देशों में भारत 120वें नंबर पर रहा। तब वर्ल्ड बैंक ने कहा था कि इस मामले में भारत की स्थिति सबसे ज़्यादा ख़राब है। भारत ने 2005 और 2012 के बीच वयस्क जनसंख्या के मुकाबले सिर्फ 0.9 फीसदी नौकरियां पैदा कीं।

अब सवाल ये उठता है कि आख़िर ऐसे क्या कारण हैं कि भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या इतनी कम होती जा रही है। इस बारे में बात करते हुए वर्ल्ड बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री फ्रेडेरिको गिल सेंडर ने कहा, ''हालांकि भारत में अब पहले से ज़्यादा लड़कियां स्कूल जाकर पढ़ने लगी हैं लेकिन नौकरियों की कमी और कुछ दूसरे कारणों से रोजगार को छोड़ रही हैं। उन्होंने कहा कि एक तो भारत में नौकरियां कम पैदा हो रही हैं लेकिन जो पैदा हो रही हैं उनमें से सामाजिक मानदंडों के मुताबिक पुरुषों की भागीदारी ज़्यादा है।

गाँवों में मनरेगा जैसी कई योजनाएं चलती हैं जिनमें पुरुषों के साथ - साथ महिलाओं को भी बराबर काम मिल जाता है लेकिन शहरों में ऐसी कोई योजना नहीं है
अश्वनी महाजन, अर्थशास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली विश्वविद्यायल के अर्थशास्त्री अश्वनी महाजन कहते हैं, ''भारत में रोजगार सृजन बीते वर्षों में काफी कम हुआ है। ऐसे में कामकाजी महिलाओं के आंकड़ों में भी कमी आई है। दूसरा, गाँवों में मनरेगा जैसी कई योजनाएं चलती हैं जिनमें पुरुषों के साथ - साथ महिलाओं को भी बराबर काम मिल जाता है लेकिन शहरों में ऐसी कोई योजना नहीं है जहां आसानी से महिलाओं को काम मिल सके, इसलिए शहर में कामकाजी महिलाओं का अनुपात कम हो जाता है। अश्वनी महाजन महिलाओं की स्थिति को चिंताजनक बताते हुए कहते हैं कि देश की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए पुरुषों के साथ - साथ महिलाओं का योगदान भी काफी ज़रूरी है। इसलिए इसे सुधारना बहुत ज़रूरी है।

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वर्ल्ड बैंक की 2017 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन और ब्राजील में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 65 से 70 है। नेशनल सैम्पल सर्वे (68वां राउंड) के मुताबिक, 2011 - 12 में भारत के गाँवों में हर 100 में 24 महिलाएं कामकाजी थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 में 49 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं कामकाजी थीं ये आंकड़ा 2012 में घटकर 36 फीसदी रह गया। यानि शहरों के साथ - साथ गाँवों में भी कामकाजी महिलाओं की भागीदारी में कमी आई है।

पिछले कुछ वर्षों में नौकरियों का सृजन कम हुआ है और छोटे व्यवसायों की संख्या बढ़ी है। अपना व्यवसाय शुरू करने के मामले में आज भी देश में पुरुष ही आगे हैं।
डॉ. अरविंद कुमार, विभागाध्यक्ष, समाज शास्त्र विभाग, बीएचयू

कामकाजी महिलाओं में आती कमी के बारे में बात करते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के अध्यक्ष व प्रोफेसर डॉ. अरविंद कुमार जोशी कहते हैं, ''पिछले कुछ वर्षों में नौकरियों का सृजन कम हुआ है और छोटे व्यवसायों की संख्या बढ़ी है। अपना व्यवसाय शुरू करने के मामले में आज भी देश में पुरुष ही आगे हैं। वहीं इसका एक कारण सामाजिक सुरक्षा की भावना में कमी भी हो सकती है।'' डॉ. जोशी कहते हैं कि महिलाओं को काम पर रखते समय उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी कंपनी पर होती है। वे देर रात तक काम नहीं कर सकतीं, अगर करती हैं तो उन्हें छोड़ने जाने के लिए कैब की ज़रूरत होती है। बड़ी कंपनियां तो ये सुविधाएं देती हैं लेकिन जो छोटी कंपनियां हैं वे सोचती हैं कि इन सुविधाओं पर अलग से खर्च करने से अच्छा है कि महिलाओं को काम पर रखो ही न।

वह कहते हैं कि कई बार कुछ महिलाएं अपने निज़ी फायदे के लिए अपने ऑफिस को लोगों को ग़लत मामलों में फंसा देती हैं या उन पर शोषण का इल्ज़ाम लगा देती हैं लेकिन इसका ख़ामियाज़ा उन महिलाओं को भुगतना पड़ता है जो उस क्षेत्र में कुछ अच्छा कर सकती हैं। ऐसी घटनाओं के बारे में सुनकर लोग महिलाओं को काम देने से कतराने लगते हैं। ये भी कारण हो सकता है कि कामकाजी महिलाओं की संख्या में कमी आ रही है।

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