सरकार अपने वादे से चूक गई पर बिहार की जनता नहीं चूकी

बिहार में प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सहयोग राशि तो साल भर बाद मिली पर माता-पिता सजग बने रहे और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार दिखने लगा।

सरकार अपने वादे से चूक गई पर बिहार की जनता नहीं चूकी

भारत सरकार के मातृत्व सहायता कार्यक्रम - प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना- का उद्देश्य ग्रामीण भारत में गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को आय सहायता मुहैया कराना है। इस लेख में बिहार में चलाए गए इस कार्यक्रम का मूल्यांकन किया गया है, जिसमें पाया गया कि भुगतान में देरी होने के बावजूद इस योजना की वजह से पहले बच्चे के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार हुआ। इसकी संभावित वजह है पहले और दूसरे जन्म के बीच अंतराल में बढ़ोतरी।

2015 में बिहार में फील्डवर्क के समय हमें यह देखकर बहुत निराशा हुई कि मातृत्व सहायता कार्यक्रम के तहत होने वाले भुगतान में एक साल तक का विलंब हुआ। यह कार्यक्रम गर्भावस्था के दौरान माताओं को अतिरिक्त आय प्रदान करने के लिए चलाया गया था और यह राशि गर्भावस्था के समय यह शिशु जन्म के छह महीने के भीतर मिल जानी चाहिए थी। हमें लगा कि एक बार फिर क्रियान्वयन में गड़बड़ी की वजह से कार्यक्रम का असर कम हो जाएगा। इसके बावजूद हमने अपने विश्लेषण में पाया कि लक्षित शिशु पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा (घोष एवं कोचर 2018)। इसका क्या अर्थ है और हम इन नतीजों से क्या सीख सकते हैं?

बिहार में सरकार के मातृत्व सहायता कार्यक्रम का मूल्यांकन

यहां विश्लेषण का विषय है भारत की प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई), इस योजना को केंद्र सरकार ने 2011 में देश के 52 जिलों में संचालित किया था। इसमें गर्भवती महिलाओं और ग्रामीण इलाकों में स्तनपान कराने वाली माताओं को आय समर्थन के माध्यम से मातृ और शिशु स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार करने की संभावना है। इनमें अधिकतर वे महिलाएं हैं जो असंगठित क्षेत्र में काम करतीं हैं इसलिए अगर वे गर्भावस्था के दौरान कम घंटे काम करती हैं तो उनकी आय भी कम हो जाती है। अध्ययन में देखा गया कि आय में होने वाले इस घाटे से बचने के लिए ये ग्रामीण महिलाएं अपनी पूरी गर्भावस्था भर काम करती हैं और बच्चे को जन्म देने के फौरन बाद फिर से काम पर लौट आती हैं। इससे खुद उनको और नवजात शिशु की सेहत को नुकसान होता है (सहयोग 2012)। सरकार इस कार्यक्रम के महत्व को पहचानती है: यह उन कार्यक्रमों में से था जिसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत अनिवार्यतया सभी महिलाओं के लिए लागू किया जाना था। मौजूदा दिशानिर्देशों के तहत, प्रत्येक गर्भवती महिला को दो किश्तों में 6,000 रुपए (बिहार में पूर्णकालिक मजदूरी के लगभग 50 दिनों के बराबर) दिए जाने हैं, इसमें दूसरी किश्त तब दी जानी थी जब यह साबित हो जाए कि नवजात की मां कार्यक्रम की शर्तों के अनुसार स्वास्थ्य-सुधार के नियम जैसे प्रसव के पूर्व और पश्चात अस्पताल जाना, बच्चे को नियमित टीके लगवाना जैसे नियमों का पालन कर रही हैं।

ऐसा लग रहा था कि यह कार्यक्रम उत्तरी बिहार के पिछड़े इलाके में बुरी तरह विफल हो जाएगा क्योंकि हमने पाया कि यहां महज 5 प्रतिशत अर्ह महिलाओं को तय समयसीमा में पैसा मिला था। यह धनराशि सीधे लाभार्थी महिला के बचत खाते में आनी थी इसके बावजूद देरी हुई। ऐसी व्यवस्था कार्यक्रम के क्रियान्वयन में बिलंब कम करने और कार्यक्रम की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए की गई थी। हमें लगा कि अगर कोई असर हुआ तो वह भी बाद में पैदा हुए बच्चे की सेहत में दिखाई देगा क्योंकि अक्सर धनराशि पहले बच्चे के जन्म के बाद तब आई जब दूसरे बच्चे का जन्म होने वाला था।

हमने कार्यक्रम का मूल्यांकन उसके चरणों और कार्यक्रम अर्हता नियमों के आधार पर किया था। यह कार्यक्रम देश के केवल 52 जिलों में लागू किया गया था इनमें जच्चा-बच्चा की खराब सेहत से लेकर जच्चा-बच्चा की अच्छी सेहत वाले जिले शामिल थे। इन जिलों का यह वर्गीकरण जच्चा-बच्चा के राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर किया गया था। हमने बिहार के दो पायलट जिलों को लिया। इनमें से एक जिला उपरोक्त वर्गीकरण के आधार पर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में था मतलब उसका अच्छा स्कोर था। इसके बाद हमने तुलना के लिए दो ऐसे जिले लिए जो इस कार्यक्रम से बाहर थे पर उनका जच्चा-बच्चा स्कोर पायलट जिलों के बराबर था। हमारा उद्देश्य था कि हम कार्यक्रम में शामिल जिले और कार्यक्रम के बाहर के जिलों में अर्ह समूहों की तुलना अनर्ह समूहों से करें। अर्ह समूहों में अर्ह या योग्य बच्चों की तुलना अनर्ह बच्चों से की जाए (कार्यक्रम के नियमों के अनुसार यहां अनर्ह बच्चों से आशय उन बच्चों से है जो 2011 से पहले जन्मे हैं और इस योजना के तहत नहीं आते हैं; और वे बच्चे जो दो बच्चों के जन्म लेने के बाद पैदा हुए क्योंकि नियमत: यह योजना सिर्फ पहले दो बच्चों के लिए है।)


बच्चों की सेहत पर सकारात्मक प्रभाव

हैरानी की बात है कि WAZ स्कोर (वजन और उम्र के अनुपात) में हमें पहले योग्य शिशु के काफी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। WAZ स्कोर एक ही उम्र और लिंग के बच्चों और उनके वजन की तुलना पर आधारित विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक है। चूंकि बहुत कम अर्ह परिवारों को पहले बच्चे के जन्म के आसपास समर्थन राशि मिली थी, इसलिए इसका प्रभाव इतना सकारात्मक कैसे आया?

एक संभावना यह थी कि यह सकारात्मक परिणाम उन बाध्यताओं की वजह से आया जिनके तहत समर्थन राशि पाने के लिए गर्भवती महिला को प्रसव पूर्व और बाद में स्वास्थ्य नियमों का कड़ाई से पालन करना था। चूंकि राशि के भुगतान से पहले गर्भावस्था में नियमित रूप से अस्पताल जाना जरूरी था इसलिए हो सकता है कि ऐसी स्वास्थ्यकर आदतों की वजहों से जच्चा-बच्चा की सेहत सुधरी भले ही उन्हें भुगतान काफी देर से हुआ हो। हालांकि, इस तरह के व्यवहार पर कार्यक्रम का असर उन महिलाओं में भी बहुत कम समझ में आया भले ही उन्हें राशि मिलती रही। इससे पता चलता है कि सरकार कार्यक्रम के मानदंडों को लागू करवाने में नाकाम रही, यह ऐसी कमी है जो इसी तरह के दूसरे कार्यक्रमों पर भी लागू होती है। जिन महिलाओं को समय पर राशि मिलती रही वे भी मदर चाइल्ड प्रोटेक्शन कार्ड नहीं दिखा पाईं जबकि, इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि वे कार्यक्रम के नियमों का पालन कर रही हैं या नहीं। हमने पाया कि लक्षित जिलों पर सरकार के बहुत अधिक ध्यान देने का असर आसपास के दूसरे जिलों और कार्यक्रमों पर बिल्कुल नहीं पड़ा। एक अंतिम संभावना यह है कि सरकार से मिलने वाली राशि का असर बच्चों की उम्र के हिसाब से अलग-अलग रहा, मतलब अधिक उम्र के बच्चों पर अधिक असर देखा गया। लेकिन अगर ऐसा है तो भुगतान में हुई देरी से बड़े बच्चे के स्वास्थ्य में उसके बाद जन्मे बच्चे की तुलना में ज्यादा असर दिखना चाहिए था। लेकिन हमारे सर्वे में इस स्पष्टीकरण का भी खंडन हुआ है।

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इसकी जगह, हमने देखा कि इस कार्यक्रम की वजह से दोनों बच्चों के जन्म में अंतर बढ़ गया। हेकमैन एंड वॉकर 1990, डा वान्जो, हेल, रज्जाक एंड रहमान 2008 के अध्ययन (जो जन्म अंतराल के निर्धारकों की जांच करता है) के आधार पर हमारी व्याख्या है कि बच्चों के जन्म अंतराल पर आय समर्थन का असर हुआ है। जिन गांवों में कार्यक्रम चल रहा था वहां की माताओं में इस कार्यक्रम की काफी जानकारी थी, ऐसा इसलिए कि पायलट जिले के लगभग हर गांव में कुछ ऐसी महिलाएं थीं जिन्हें कार्यक्रम के मुताबिक राशि मिली थी। पैसे की कमी से जूझ रहे माता-पिता ने सरकारी मदद मिलने की उम्मीद में अपने पहले बच्चे के जन्म में जल्दी की होगी। लेकिन सरकारी मदद मिलने में हुए विलंब की वजह से उन्होंने सरकारी मदद मिलने तक दूसरा बच्चे के जन्म में अंतर रखा होगा। इस वजह से पहले और दूसरे बच्चे की उम्र में अंतर और बढ़ गया होगा। कार्यक्रम में बने रहने की अर्हता को एक कारक के रूप में देखते हुए हमने दिखाया है कि पहले और दूसरे बच्चे के जन्म में अंतर बढ़ जाने से पहले बच्चे की सेहत में सुधार हुआ।

इस कार्यक्रम के निहितार्थ

इस अध्ययन के कई महत्वपूर्ण निहितार्थ सामने आए। पहला, इससे पता चलता है कि प्रजनन के संबंध में क्रियाशील निर्णय, जैसे जन्म में अंतराल, शिशु के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला अहम कारक है। हालांकि, तमाम अध्ययनों और नीति निर्माताओं के बीच यह बात स्पष्ट होने के बावजूद जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य के लिए समर्पित भारत का प्रमुख कार्यक्रम एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) बच्चों के बीच में पर्याप्त अंतराल रखने के विषय पर आवश्यक मात्रा में परामर्श नहीं दे रहा है। दूसरी बात, हमारे नतीजे बताते हैं कि परिवार भविष्य में मिलने वाले पैसे के आश्वासन के बाद भी जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य पर खर्च करने के लिए उधार नहीं लेना चाहते, भले ही भविष्य में मिलने वाला पैसा जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य के लिए ही निर्धारित किया गया हो। इससे यह पता चलता है कि परिवार उपभोग के लिए वर्तमान आय पर कितने निर्भर रहते हैं। इससे यह भी ज्ञात होता है कि नीतियों को ठीक तरह से लागू करने के लिए जरूरी है कि समय पर भुगतान किया जाए, खासकर ऐसे कार्यक्रमों में।

इस संबंध में यह कहना जरूरी है कि, सरकार द्वारा हर शख्स का बैंक खाता खुलवाने और लाभार्थियों को सीधे भुगतान करवाने के वादे के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है। इस कार्यक्रम में समूची राशी सीधे लाभार्थी महिलाओं के खाते में ही गई। पर इससे इन महिलाओं को समय पर भुगतान की प्राप्ति तो सुनिश्चित नहीं हो पाई। इसके अलावा, इससे बचत में कोई मदद नहीं हुई। अगर बचत हुई होती तो दूसरी गर्भावस्था के समय कुछ अतिरिक्त आय का इंतजाम हो जाता। लगभग हर जगह, जैसे ही सहायता राशि लाभार्थी महिला के अकाउंट में पहुंची तुरंत ही वह खाते से निकाल ली गई।

मातृत्व सहायता कार्यक्रमों की अनुपस्थिति में भी, जच्चा-बच्चा की सेहत में महत्वपूर्ण सुधार संभव होगा अगर गर्भावस्था के दौरान आय सुनिश्चित करने के लिए परिवार कुछ बचत कर सके। इसके लिए महज वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम चलाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम को स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ चलाने की जरूरत है ताकि इस पर जोर दिया जा सके कि गर्भावस्था और नवजात शिशु के शुरूआती दिनों के बारे में पहले से योजना बनाना कितना महत्वपूर्ण है।

हमारा रिसर्च इसलिए अहम है क्योंकि देश में इस कार्यक्रम के भविष्य पर चर्चा हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने पर इसका नाम बदल कर प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना रखा गया और लाभ में भी कटौती की गई है। अब कार्यक्रम के तहत सिर्फ पहले बच्चे के जन्म पर 5,000 रुपए की सहायता राशि मिलती है। शेष 1,000 रुपया जननी सुरक्षा योजना के तहत दिया जाता है, जबकि इससे पहले इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना के तहत मिलने वाली सहयोग राशि जननि सुरक्षा योजना के अतिरिक्त हुआ करती थी। मीडिया की खबरों के मुताबिक, इस योजना का क्रियान्वयन अभी भी बहुत खराब है।

(लेखक परिचय: प्रभात पी. घोष एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर हैं। डॉ. अंजनी कोचर स्टैन्फोर्ड सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट में इंडिया प्रोग्राम की डायरेक्टर हैं। यह लेख Ideas for India की अनुमति से इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर (IGC) के शोध पर आधारित हिंदी अनुवाद है।)

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