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पर्यावरण व जल संरक्षण के लिए सभी को एक साथ आना होगा

कुछ लोग यह मानते हैं की पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करना सिर्फ सरकार या कुछ संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है। यह निरर्थक सोच है, वास्तव में पर्यावरण संरक्षण समाज के हर वर्ग तथा हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। प्रत्येक व्यक्ति जब इस अभियान से जुड़ेगा, तभी हम पर्यावरण को वर्तमान और भविष्य के लिए संरक्षित कर पाएंगे।

पर्यावरण व जल संरक्षण के लिए सभी को एक साथ आना होगा

हर साल हम जुलाई में वन महोत्सव मनाते हैं। वन महोत्सव में सरकारी विभागों, ग्राम सभाओं, सामाजिक संस्थाओं, गैर सरकारी संस्थाओं व अन्य निकायों द्वारा करोड़ों वृक्षों का रोपण किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह होता है की हरियाली बढ़े, वातावरण शुद्ध हो और पर्यावरण को संरक्षित करें। देश में वन महोत्सव का आरंभ वर्ष 1950 में तत्कालीन कृषि मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी किया गया था।

इतने वर्षों के बाद भी हम पर्यावरण के प्रति उतने संवेदनशील नहीं हैं जितना होना चाहिए था। पर्यावरण शब्द का अर्थ है हमारे चारों ओर का वातावरण या परिवेश। इसीलिए पर्यावरण संरक्षण का तात्पर्य है कि हम अपने चारों ओर के वातावरण को संरक्षित करें और उसे जीवन के अनुकूल बनाएं। पर्यावरण और जीव एक दूसरे के पूरक हैं। इसी कारण भारतीय दर्शन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना यहां मानव जाति का इतिहास है।

भारतीय दर्शन के अनुसार मानव शरीर की रचना पर्यावरण के पांच महत्वपूर्ण घटकों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से हुई है। दीर्घायु और स्वस्थ मानव जीवन के लिए यह आवश्यक है कि पर्यावरण के इन सभी पांच घटकों को प्रदूषित न करते हुये भविष्य के लिए संरक्षित किया जाए। विश्व भी भारत के इस दर्शन को सम्मान करता है। इसीलिए पर्यावरण की सुरक्षा व संरक्षण के लिए पूरे विश्व में प्रत्येक वर्ष 05 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार ने वर्ष 1976 में पर्यावरण संरक्षण का विशेष संज्ञान लेते हुये संविधान में संसोधन कर नया अनुच्छेद 48A और 51A(G) जोड़े थे। अनुच्छेद 48A सरकार को निर्देश देता है कि वह पर्यावरण की सुरक्षा करे और अनुच्छेद 51A (G) नागरिकों को पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।

पर्यावरण संरक्षण के विरोधाभास में प्रगति के नाम पर मानव द्वारा पर्यावरण को विकृत करने का प्रयास हो रहा है। विकास के अंध दौड़ में विश्व का प्रत्येक देश आगे बढ़ने को बेचैन है। प्रतिस्पर्धा के इस दौड़ में प्रकृति के बनाए हुए नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। इसका दुष्परिणाम मानव समाज के समक्ष समय-समय पर परिलक्षित होता रहता है। वर्तमान वैश्विक महामारी कोविड-19 भी प्रकृति एवं पर्यावरण को दूषित करने का ही परिणाम है। प्रकृति हमें समय-समय पर इस प्रकार के महामारी या अन्य आपदाओं जैसे चक्रवात/समुद्री तूफान,भूकंप, बाढ़, सूखा इत्यादि से अपनी नाराजगी से सचेत करता रहता है।


अगर हम कृषि की बात करें तो मृदा का अनावश्यक दोहन, रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग तथा भूजल का अत्यधिक दोहन से खेती के लिए आवश्यक इन संसाधनों के गुणवत्ता तथा उपलब्धता पर संकट खड़ा हो गया है। देश के कई हिस्सों में खेती के लिए उपलब्ध जमीन बंजर होता जा रहा है, भूजल स्तर प्रति वर्ष लगातार नीचे जा रहा है। इन कारणो से लाखों किसानो के आजीविका पर प्रश्न चिन्ह सा लगता दिखाई दे रहा है। जल संकट की समस्या को गंभीरता से लेते हुये भारत सरकार ने वर्ष 2018 में जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया जिससे जल संसाधन को संरक्षित करने हेतु अधिक समग्र तथा उपयोगी नीति बनाकर पूरे देश में तीव्र गति से लागू किया जा सके। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले 'मन की बात' कार्यक्रम के एक अंक में जल संकट पर बोलते हुये अपने विचार साझा करते हुये विभिन्न क्षेत्र के विशिष्ट हस्तियों से जल संरक्षण के क्षेत्र में नवोन्मेषी कार्य करने का आग्रह कर चुके हैं।

कुछ लोग यह मानते हैं की पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करना सिर्फ सरकार या कुछ संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है। यह निरर्थक सोच है, वास्तव में पर्यावरण संरक्षण समाज के हर वर्ग तथा हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। प्रत्येक व्यक्ति जब इस अभियान से जुड़ेगा, तभी हम पर्यावरण को वर्तमान तथा भविष्य के लिए संरक्षित कर पाएंगे।

पृथ्वी के हर जीव के लिए जल की बहुत आवश्यकता होती है। पेड़-पौधों के लिए भी जल की बहुत आवश्यकता होती है। जल तरल, ठोस एवं गैस रूप में विद्यमान होता है। जल जीवन का सबसे आवश्यक घटक है और जीविका के लिए महत्वपूर्ण है। जल प्रकृति की अनमोल धरोहर है। बिना पानी के जीवन संभव नहीं है। पीने के लिये शुद्ध जल हमारे लिये जरूरी है। क्योंकि स्वच्छ एवं सुरक्षित जल अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। धरती के दो तिहाई हिस्से पर पानी भरा हुआ है। फिर भी पीने योग्य शुद्ध जल पृथ्वी पर उपलब्ध जल का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा ही है। 97 प्रतिशत जल महासागर में खारे पानी के रूप में भरा हुआ है। शेष रहा दो प्रतिशत जल बर्फ के रूप में जमा है। आज समय है कि हम पानी की कीमत समझें। यदि जल व्यर्थ बहेगा तो आगे आने वाले समय में पानी की कमी एक महा संकट बन जाएगा। ऐसी भी आशंका जताई जाती है कि अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो वह जल संकट के कारण होगा।

लगातार बढ़ रहा है जल संकट

आज लोगों को एक-एक घड़े शुद्ध पेयजल के लिये मीलों भटकना पड़ रहा है। जल के टैंकर और ट्रेन से जल प्राप्त करने के लिये घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है। रोजमर्रा के कामकाज नहाने, कपड़े धोने, खाना बनाने, बर्तन साफ करने, उद्योग धंधा चलाने के लिये तो जल चाहिए वह कहाँ से लाएँ, जबकि नदी, तालाब, ट्यूबवैल, हैण्डपम्प एवं कुएं, बावड़ियां सूख गए हैं। पशु-पक्षियों को भी पानी के लिये मीलों भटकना पड़ता है। हरियाली कम होता जा रहा है। जल की कमी से अनेक कारखाने बंद होने से लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। खेती-बाड़ी के लिये तो और भी अधिक पानी की जरूरत है परन्तु पानी नहीं मिलने से खेती-बाड़ी चौपट होती जा रही है। जल संकट हमारे पूरे दैनिक जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इसलिये इस मसले पर प्राथमिकता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

हम अनावश्यक रूप से तथा अधिक मात्रा में जल का दोहन कर रहे हैं। दैनिक उपयोग में आवश्यकता से अधिक मात्रा में जल का व्यय करने की आदत ने जल संकट बढ़ा दिया है। बढ़ती जनसंख्या के कारण भी जल का उपभोग बढ़ता जा रहा है। खेती एवं उद्योगों में अधिक उत्पाद लेने की खातिर जल का उपभोग बढ़ा दिया है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई व वनों के लगातार घटने से वर्षा होने की अवधि व साथ ही वर्षा की मात्रा में भी कमी आ रही है। कुओं, नलकूपों, तालाबों से अन्धाधुन्ध जल दोहन के कारण भूजल में कमी आ गई है।


भारत के कुल कृषि उत्पादन का लगभग 70-80 प्रतिशत हिस्सा भूजल पर निर्भर है। भूजल घरेलू उपयोग के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 80% हिस्सा भूजल से पूरा होता है। भूजल स्तर पर्यावरण को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। जहां भूजल स्तर ऊपर रहता है वहाँ जैव विविधता तथा वनस्पतियाँ ज्यादा पाई जाती है। यह वनस्पतियाँ वन्य जीवों के लिए प्रकृतिक आवास का काम करती है। इसके अलावा वनस्पतियाँ भोजन, ईंधन एवं लकड़ी भी उपलब्ध कराता है। इस प्रकार भूजल स्तर पर्यावरण,प्रकृति संतुलन,तथा जीवन यापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके विपरीत जल स्तर निरन्तर नीचे जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार देश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में पिछले तीन-चार दशक में भूजल स्तर 8-16 मीटर नीचे चला गया जो कि गंभीर हालात को दर्शाता है। कल-कारखानों से निकले दूषित जल व शहरी क्षेत्रों के गटर एवं कूड़े-कचरे ने जलस्रोतों को प्रदूषित कर दिया है जिससे पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है। यह सब कुछ अनियन्त्रित मानवीय गतिविधियों के कारण ही हुआ है। इन सभी कारणों से मानव समाज एवं सम्पूर्ण जीवों के समक्ष गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। इसीलिए जल संकट का निराकरण अति आवश्यक एवं अपरिहार्य है।

जल संरक्षण में बढ़ानी होगी लोगों की भागीदारी

हमारे देश में पुरखों से हमें अनेक प्रकार के जलस्रोत विरासत में मिले हैं। यदि हमने इस विरासत को संभाल कर नहीं रखा तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी। गाँव-गाँव में परम्परागत कुएँ, बावड़ी व तालाब बने हुए हैं। पिछले वर्षों में लम्बे समय से हम इनकी अनदेखी करते आ रहे हैं। इन्हें या तो तोड़फोड़ दिया गया है या प्राकृतिक रूप से नष्ट हो गए हैं। आगे से इन जलस्रोतों की चिन्ता सभी मिलकर करेंगे तभी जल संकट से निजात मिल सकेगी। जनता ने जल संरक्षण की जिम्मेदारी अपने कंधों से उतारकर सरकार के कंधों पर रख दी है। जबकि सरकारें योजनाएँ बनाने तक सीमित हो जाती हैं क्योंकि इन्हें कारगर ढंग से लागू करने में जन सहभागिता का अभाव रहता है और व्यक्तिगत/सामुदायिक/सामाजिक/वर्ग विशेषस्वार्थ इन योजनों के क्रियान्वयन में आड़े आता है।

गाँव-गाँव और शहर-शहर में बने हुए जलस्रोतों का पुनरुद्धार किया जाना आवश्यक है। मोहल्ले, गाँव, शहर जहाँ भी ऐसे स्रोत हैं वहाँ के लोग मिलकर इन जलस्रोतों की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर लें। मिलकर इनमें जमा कूड़े-कचरे, मिट्टी, कंकड़, झाड़-झंखर को हटाएँ। जलस्रोतों के जल मार्ग में आने वाले अवरोध व नाजायज कब्जे हटाएँ। जलस्रोतों के रखरखाव में अपनी व दूसरे लोगों की भागीदारी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। अब तक जो गलतियाँ हमने की है उनका सुधार भी हमें मिल कर ही करना होगा। श्रमदान करके जलस्रोत साफ करना होगा। "साथी हाथ बटाना, एक अकेला थक जाएगा तो मिलकर बोझ उठाना" के कथन को चरितार्थ करते हुए हमें जल संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास करने होंगे।

गाँवों में पंचायतें, शहरों में नगरपालिका व नगरों में नगर व महानगर निगम को अपना दायित्व समझना चाहिए। सभी लोगों को जल शुद्ध एवं पर्याप्त मात्रा में मिले इसका प्रबन्ध उन्हें करना है। इस मद में सभी सरकारी विभाग एवं स्थानीय स्वशासन की इकाइयाँ करोड़ों रुपयों का खर्चा प्रतिवर्ष दिखाती हैं तो जनता को उसका परिणाम देखने परखने का हक है। ये संस्थाएँ लोगों की भागीदारी से जल भण्डारण के लिये उपयुक्त व्यवस्था जैसे- कुएँ, तालाब, बाँध का निर्माण कराएँ एवं उनके रख-रखाव का ध्यान रखे। नदियों में गंदे नालों का पानी न जाने दें उन्हें शुद्ध रखने के सभी उपचार करें। उन्हें गंदा होने से बचाएँ, व्यर्थ में पानी खराब होने के कारकों को दूर करें। पेड़ लगाने और उनकी सुरक्षा करने से हरियाली बढ़ेगी जिससे भूमि में पानी को रोकने में मदद मिलेगी। जल प्रकृति की देन है हमें इसका संग्रहण भी करना है, संयोजन भी करना है। इस पर हर व्यक्ति का बराबर का अधिकार है। चाहे वह किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र या पार्टी का हो।

फसल उत्पादन में भी जल संरक्षण है जरूरी

भारत में इस समय जल उपलब्धता 2000 घनमीटर प्रति व्यक्ति है, जो कि अगले 20 वर्षों में घटकर 1400-1500 घनमीटर रह जाएगी। जल उपलब्धता में कमी आ जाने से पीने से लेकर कृषि में सिंचाई तक के लिए उपलब्धता पर संकट आ जाएगा। और देश में खाद्यान्न संकट की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए बिना विलंब हमें जागरूक होकर कृषि में ऐसी व्यवस्था तथा सिंचाई पद्धति अपनाना होगा जिससे "प्रत्येक बूंद में अधिक फसल"के स्लोगन को सार्थक सिद्ध कर पाएँ।


धान, मक्का, कपास, सब्जियों सहित गन्ना की खेती में भी सिंचाई जल का प्रयोग अधिक मात्र में होता है। वैज्ञानिक शोध के उपरांत कुछ ऐसी सिंचाई तकनीक विकसित की गई है जिसे अपनाकर सिंचाई जल में 30-50% तक बचत करते हुए खेती से अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। सिंचाई विधियाँ जैसे फव्वारा सिंचाई,बूंद-बूंद सिंचाई,नालियाँ बनाकर सिंचाई, एकांतर नाली सिंचाई को अपनाकर बहुमूल्य सिंचाई जल को संरक्षित किया जा सकता है। अन्य उन्नत कृषि पद्धति जैसे लेजर द्वारा भूमि का समतलीकरण,फसल चक्र,भूजल रिचार्ज, सह फ़सली खेती,खर-पतवार नियंत्रण,जैविक खादों का प्रयोग,उद्यानिकी, फसलों को आवश्यकतानुसार पानी देना इत्यादि को अपनाकर सिंचाई जल के उपयोग मात्र में कमी लाई जा सकती है।

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