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राजस्थान में हर घंटे पांच बच्चों की मौत का दोषी कौन ?

कोटा के जेके लोन अस्पताल में हुईं एक साल में करीब 965 बच्चों की मौतों को रोकने के साथ-साथ हर साल राजस्थान में होने वाली करीब 45,145 नवजात शिशुओं की मौतों को भी रोकना होगा

Manish MishraManish Mishra   4 Jan 2020 8:15 AM GMT

  • बड़े अस्पतालों की दुर्दशा के साथ-साथ प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को दुरुस्त करने की जरूरत
  • भारत में कुपोषण, उचित इलाज और देख-रेख के अभाव में करीब 8 लाख नवजात शिशुओं की मौत हर साल हो जाती है।

कोटा के अस्पताल में पिछले वर्ष 963 बच्चों की मौतों से मचे हंगामे के बीच ही एक सवाल उठता है कि राज्य में हर घंटे पांच बच्चों की मौतों का कौन जिम्मेदार है?

कोटा के जेके लोन अस्पताल में हुईं इन 963 मौतों के अलावा पूरे राजस्थान में हर साल 44,000 बच्चे दम तोड़ देते हैं, जिसके लिए कुपोषण और लचर सरकारी स्वास्थ्य तंत्र जिम्मेदार है।

दक्षिण राजस्थान के कई जिलों में नवजात बच्चों की होने वाली मौतों पर अध्ययन करने वाले डॉ. शरद अयंगर इसे पूरी व्यवस्था की खामी मानते हैं।

डॉ. अयंगर की संस्था ने 14,145 जन्म लेने वाले बच्चों का अध्ययन किया, जो 14 अलग-अलग संस्थानों में पैदा हुए थे। इनमें 28 दिन में मरने वाले बच्चे 30.1 प्रतिशत थे।


इनमें भी सबसे अधिक मरने वाले वो बच्चे थे जिनका वजन 2 किलो से कम था। ऐसे बच्चों की मरने वाली संख्या प्रति एक हजार बच्चों के जन्म पर 180 पाई गई।

"बच्चा अगर कुपोषित है और 28 दिन में मृत्यु हो रही है तो इसका मतलब उसकी माँ कुपोषित है। दो किलो के बच्चे को सर्दी के मौसम में बचा पाना काफी मुश्किल हो जाता है। ये काफी संवेदनशील होते हैं," डॉ. अयंगर कहते हैं।

डॉ. अयंगर ने अपने अध्ययन में पाया कि कुल नवजात बच्चों की मौतों में 50 प्रतिशत सिर्फ वह थे जिनका वजन 2 किलो से कम था।

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान के अनुसार राजस्थान की जनसंख्या हर साल 12,00,000 बढ़ जाती है, इसमें से 45,600 बच्चों की मौत हर साल होती है।

भारत की जनगणना पर आधारित वर्ष 2019 की एसआरएस रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में शिशु मृत्यु दर 38 (प्रति एक हजार जन्मों पर 38 शिशुओं की मौत) दर्ज की गई।

कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौतों और अव्यवस्थाओं के बारे में अधीक्षक सुरेश दुलारा ने 'गांव कनेक्शन' से फोन पर कहा, "बच्चे गंभीर बीमार होने पर रेफर होकर यहां आते हैं, ये मेडिकल कॉलेज का अस्पताल है, इसलिए हम सभी मरीजों को रखते हैं लेकिन बीमारी की वजह से बच नहीं पाते। ठंडक में हाइपोथर्मिया के मामले बढ़ जाते हैं, नवजातों की इसलिए मौतें ज्यादा होती हैं।"

डॉ. दुलारा ने आगे कहा, "हमारे पास बहुत ज़्यादा काम का दबाव है। जितने हमारे पास संसाधन हैं, उससे ज़्यादा भी मरीज़ आते हैं।"

कोटा के जेके लोन अस्पताल प्रशासन ने पिछले छह साल में भर्ती होने वाले मरीजों और होने वाली बच्चों की मौतों के आंकड़े जारी करते हुए कहा है कि लगातार बच्चों की मौतें कम हुई हैं। वर्ष 2014 में जहां 1198 मौतें हुई थीं, तो वर्ष 2019 में ये आंकड़ा 963 पर आ गया है।


राजस्थान में जन स्वास्थ्य अभियान पर काम करने वाले और चित्तौड़गढ़ निवासी डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने फोन पर कहा, "अधिकतर बच्चे बड़े अस्पतालों में आकर मर रहे हैं। पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। ये बच्चे उन गरीबों के हैं जो निजी अस्पतालों में नहीं जा सकते और दोड़ते भागते सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हैं।"

सरकारी अस्पतालों में गरीबों के बच्चों की मौतों को कुपोषण के नजिरए से देखना ज्यादा जरूरी है। क्यूंकि अगर मां कुपोषित होती है तो कम वजन का बच्चा पैदा होने से उसकी मृत्यु की संभावना और बढ़ जाती है।

"अगर किसी बच्चे का वजन 2 किलो से कम है और उसकी मौत 28 दिन के अंदर होती है तो इसका साफ कारण है कि उसकी मां भी कुपोषित थी," डॉ. अयंगर ने समझाया।

पूरे विश्व में बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए कार्य करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल कुल 8,02,000 नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है।

कोटा का जेके लोन अस्पताल, या पूरे राजस्थान में होने वाली हजारों नवजात शिशुओं की मौतों को कैसे रोका जा सकता है ? इस बारे में राजस्थान के कुछ जिलों में नवजात बच्चों की मौतों पर किए गए अध्ययन के आधार पर डॉ. अयंगर कहते हैं, "अगर आप एक जिला अस्पताल को सुधारोगे और दूर दराज के अस्पताल में होने वाली डिलिवरी को अगर डाक्टरों ने ढंग से नहीं संभाला और मरने की हालत में बड़े अस्पताल को रेफर किया जाता रहा, तो इन बच्चों को कोई नहीं बचा पाएगा।"


कोटा के जेके लोन अस्पताल द्वारा जारी एक रिपोर्ट को देखें तो पिछले पांच वर्षों में अगस्त से लेकर नवंबर तक बच्चों की मौतें सबसे अधिक हुईं। पिछले पांच सालों में हर साल, हर महीने नवजात बच्चों की मौतों का आंकड़ा सौ के आसपास रहा।

डॉक्टर की सलाह-ऐसे रोकी जा सकती हैं बच्चों को मौतें

कोटा समेत पूरे राजस्थान में होने वाली बच्चों की मौतों के पीछे के कारणों और उन्हें बचाने के उपायों के लिए डॉ. अयंगर निम्न उपाय समझाते हैं-

1. गर्भवती महिलाओं की देखभाल हो और उन्हें भत्ता दिया जाए ताकि ये महिलाएं मजदूरी करने के लिए न जाएं और अपने खानपान पर ध्यान दे सकें।

2. अगर बच्चा कमजोर पैदा होता है तो उसकी देखलाल के लिए जिले में कई सेंटर खोले जाएं। भर्ती करने की सुविधा ब्लॉक स्तर पर हो।

3. प्रसव के 48 घंटे बाद सभी को घर भेज देते हैं, और ये दो किलो का बच्चा या तो घर में मर जाएगा या अस्पताल में मर जाएगा। ठंड के मौसम में इन दो किलो के बच्चों को गर्म रखना पड़ता है। इसके लिए भर्ती की सुविधा ब्लॉक स्तर पर हो।

4. आंगनबाड़ी को मजबूत करते हुए आशा बहुओं द्वारा घर-घर जाकर नवजात की देखभाल सुनिश्चित हो। इसका एक मॉनिटरिंग सिंस्टम हो।

5. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मजबूत किया जाए वहां पर प्रशिक्षित डॉक्टरों की हर समय मौजूदगी के साथ-साथ भर्ती और नवजात की देखभाल की सुविधा हो।

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