किसान ने की आत्‍महत्‍या, बेटे ने कहा- नोटबंदी से कर्ज में डूब गए थे मेरे पिता

कन्‍नौज के सियरमऊ गांव के रहने वाले किसान सुभाष चन्‍द्र कर्ज के बोझ से दबे हुए थे। नोटबंदी के बाद से ही उन्‍होंने भारी कर्ज लिया, जिसे वो चुका नहीं पा रहे थे।

Ajay MishraAjay Mishra   12 Dec 2018 1:42 PM GMT

किसान ने की आत्‍महत्‍या, बेटे ने कहा- नोटबंदी से कर्ज में डूब गए थे मेरे पिता

लखनऊ। किसानों की आत्‍महत्‍या का सिलसिला खत्‍म होने का नाम नहीं ले रहा। कन्‍नौज के सियरमऊ गांव के रहने वाले एक किसान ने खेत में फांसी लगाकर जान दे दी। उसके बेटे की तहरीर के मुताबिक, उसके पिता नोटबंदी की वजह से कर्ज में डूब गए और फिर आर्थ‍िक तंगी से उबर नहीं पाए, जिस कारण उन्‍होंने आत्‍महत्‍या कर ली।

जानकारी के मुताबिक, कन्‍नौज के सियरमऊ गांव के रहने वाले किसान सुभाष चन्‍द्र कर्ज के बोझ से दबे हुए थे। नोटबंदी के बाद से ही उन्‍होंने भारी कर्ज लिया, जिसे वो चुका नहीं पा रहे थे। ऐसे में आर्थ‍िक तंगी और फिर कर्ज देने वालों के दबाव के आगे वो टूट गए और आत्‍महत्‍या का रास्‍ता चुन लिया।

कोतवाल को दी गई तहरीर। कोतवाल को दी गई तहरीर।

सुभाष चन्‍द्र के बेटे अमित कुमार का कहना है कि उनके पिता ने खेत में लगे पेड़ पर फांसी का फंदा लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली। जब उन्‍हें इस बात की जानकारी हुई तो वो आनन फानन में खेत में पहुंचे फिर गांव वालों की मदद से उनके शव को फंदे से नीचे उतारा।

अमित कुमार ने पुलिस को दी तहरीर में बताया है कि उनके पिता का लगभग 22 लाख रुपए नोटबंदी और अन्‍य कारणों से बर्बाद हो गया। इसके बाद वो आर्थ‍िक तंगी से उबर नहीं पाए। मेरे पिता ने लिली कोल्‍ड स्‍टोरेज हजरतपुर और जसोदा कोल्‍ड स्‍टोरेज में लगभग 1500 कट्टी आलू भंण्‍डारित किया था। लेकिन आलू की कीमत कम होने पर कोल्‍ड स्‍टोरेज के मालिकों ने उसे फिकवा दिया। इससे भी वो सदमे में थे। फिलहाल पुलिस इस मामले में जांच कर रही है।

बात दें, पिछले महीने ही ऐसी खबर आई थी कि कृषि मंत्रालय ने माना है कि नोटबंदी के फैसले से किसानों को नुकसान हुआ था। अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' ने ये रिपोर्ट प्रकाशि‍त की थी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कृषि मंत्रालय ने वित्त मामलों पर बनी संसद की स्थायी समिति को भेजी रिपोर्ट में यह माना है कि नोटबंदी से किसानों को नुकसान हुआ था। हालांकि इस रिपोर्ट का केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने खंडन किया है। उनके मुताबिक, 'यह वास्तविक तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है।'

द हिंदू की रिपोर्ट में कहा गया था कि कृषि मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि नोटबंदी जब लागू हुई तब किसान या तो अपनी खरीफ की पैदावार बेच रहे थे या फिर रबी फसलों की बुआई कर रहे थे। ऐसे में किसानों को नकदी की जरूरत थी, लेकिन नकदी की किल्लत की वजह से लाखों किसान बीज और खाद नहीं खरीद सके, इससे उनका नुकसान हुआ। कृषि मंत्रालय ने नोटबंदी के असर पर एक रिपोर्ट भी संसदीय समिति को सौंपी है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया था कि मंत्रालय ने बताया कि नोटबंदी की वजह से राष्ट्रीय बीज निगम के लगभग 1 लाख 38 हजार कुंतल गेहूं के बीज नहीं बिक पाए थे। हालांकि, सरकार ने गेहूं के बीज खरीदने के लिए 1000 और 500 रुपए के पुराने नोटों के इस्तेमाल की छूट दी थी, लेकिन इसके बाद भी बीज की बिक्री में कोई खास तेजी नहीं हुई। ऐसा इस लिए भी था कि व्‍यापक तौर पर ये संदेश फैल गया था कि पुराने नोट बंद हो गए हैं।

इस रिपोर्ट का खंडन करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने एक ट्वीट किया। उन्‍होंने लिखा कि, ''कुछ मीडिया चैनलों एवं समाचार पत्रों द्वारा यह खबर चलाई जा रही है कि कृषि विभाग ने यह माना है कि किसानों पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा था और किसान कैश की किल्लत के कारण बीज नहीं खरीद पाए थे। यह वास्तविक तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है। वास्तविक तथ्य ये हैं।''

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