'जीरो बजट, जैविक खेती किसान ने कर तो ली लेकिन वो उसे बेचेगा कहां?'

आम बजट में क्या अच्छा था और क्या नहीं? जीरो बजट खेती दिला पाएगी किसानों को मुनाफा? पढ़िए आम बजट पर किसान, कृषि जानकार और विशेषज्ञों की राय

Arvind ShuklaArvind Shukla   6 July 2019 10:37 AM GMT

लखनऊ/नई दिल्ली। क्या आम बजट किसानों की आमदनी दुगुनी करने में मदद करेगा?, किसानों के लिए कुछ भी नहीं है?, क्या जीरो बजट खेती को लेकर किसान उत्सुक हैं? जीरो बजट खेती जिसमें लागत कम आती है, बाजार से किसानों को कुछ लाना नहीं होता है। इस खेती के केंद्र में गाय होती है। इसे शून्य लागत खेती भी कहा जाता है। लेकिन कृषि जानकार इस पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जीरो बजट खेती को बढ़ावा देना अच्छी बात है लेकिन सरकार इसके लिए पहले बाजार, किसानों को दूसरी सहूलियतें देनी चाहिए थी। आम बजट में किसानों को लेकर पढ़िए क्या बोले, किसान, कृषि जानकार और कृषि विशेषज्ञ

जीरो बजट खेती ठीक है लेकिन किसानों को बाजार भी मिले

जैविक खेती करने में किसानों को कोई समस्या नहीं है। लेकिन मार्केट दिलाना होगा। एक जिले में एक जैविक बाजार होना चाहिए। अगर किसान थोड़े से खेत में कुछ उगाता है तो वो बेच भी लेगा। लेकिन हम जैसे किसान अगर एक दो एकड़ खेत में लौकी या शिमला मिर्च लगा लें तो उसे बचेंगे कहां? दूसरा किसान गाय के मूत्र और गोबर से खाद बना लेते हैं। वेस्ट डीकंपोजर का भी प्रयोग करते हैं। लेकिन जब फसल पकने को होती है, उस वक्त जो उसमें रोग लगते हैं, उसके लिए जैविक कीटनाशक नहीं मिलते। सरकार को उसकी व्यवस्था करानी होगी।-नंदू पांडेय, किसान, सीतापुर, यूपी


एमएसपी में 3 से 5 फीसदी बढ़ोतरी और डीजल 5 रुपए महंगा, आमदनी कैसे बढ़ेगी?

बजट से पहले सरकार ने जो खरीफ की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया था, उससे ही निराशा थी, धान पर 65 रुपए, कपास पर 100 रुपए कुंतल की बढ़ोतरी की थी, जबकि बजट के बाद डीजल 5 रुपए लीटर तक महंगा हो गया। फसल की कीमत में 3 से 5 फीसदी बढ़ोतरी हुई, ऐसे कैसे किसान की आमदनी बढ़ेगी

दूसरा रेन फेड खेती, यानि बारिश आधारित खेती के लिए, सूखे के बजट में कुछ भी नहीं। ये सबका साथ, सबका विकास की बात करते हैं, लेकिन हमें लगता है ये किसान के साथ विश्वासाघात है। पिछले साल किसानों ने तूर का उत्पादन बढ़ाया, चना और तूर के किसानों को अच्छे रेट मिलने लगे थे, लेकिन कुछ महंगाई आती ही राम विलास पासवान जी ने इंपोर्ट कर लिया, जिससे रेट एक हजार रुपए प्रति कुंतल तक कम हो गए। ये पॉलिसी गलत है। आप किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात करते हो लेकिन फसलों की कीमतों में अगर 3 से 5 फीसदी की बढ़ोतरी होगी तो आमदनी कहां बढ़ेगी। -विजय जवांघिया, कृषि जानकार, पुणे, महाराष्ट्र


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पारंपरागत खेती का बजट 25 करोड़, फर्टिलाइजर सब्सिडी 9900 करोड़ बढ़ाना मंशा पर सवाल उठाता है

बजट में जीरो बजट खेती पर जोर दिया गया है। लेकिन परंपरागत कृषि विकास योजना का बजट 300 से बढ़ाकर सिर्फ 325 करोड़ किया गया है। यानि मात्र 25 करोड़ रुपए जबकि केमिकल फर्टिलाइजर पर सब्सिडी आवंटन 9900 करोड़ बढ़ाया गया है। अगर सरकार सच में जीरो बजट खेती को बढ़ाने की मंशा है तो इसका बजट भी बढ़ाना चाहिए था। ऐसे तो सिर्फ किसानों को बेवकूफ बनाया जा रहा है लेकिन किसान बजट की चालाकियां समझने लगा है। -रमनदीप सिंह मान, कृषि विशेषज्ञ, दिल्ली

किसानों को बाजार पर निर्भरता कम करनी होगी

कृषि की मूल समस्या है, किसान की बाजार पर निर्भरता। वो खाद, बीज, डीजल सब बाजार से खरीदता है। किसानों ने बीज पर निर्भरता खो दी है। देश में अलग-अलग हिस्सों में जलवायु के अनुकूल बीज थे, लेकिन अब हाइब्रिड हैं वो एक बार उगते हैं और काफी महंगे मिलते हैं। इसी तरह बहुत सारी खादे और कीटनाशक किसान खुद पर उगा सकते हैं। किसान को बीज उत्पादन करना होगा, किसान को किसान क्लब, एफपीओ और एसएसची के माध्यम से उन्हें बेचना होगा।

हमारे पास देसी गोबर की खाद, नाडेप, जैव उर्वरक, पीएसबी, जिंक बैक्टीरिया आदि हम लोग अपने घर पर जैविक विधि से कर रहे हैं। लागत उसमें आधी हो जाएगी लेकिन इसके लिए किसानों को प्रोत्साहन देने की किसानों को जागरुक करने की।-डॉ. डीएस श्रीवास्तव, फसल सुरक्षा वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र

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बिजली गांव तक पहुंच गई है लेकिन लोड भी तो बढ़ाइए

बिजली और छुट्टा जानवर किसान की समस्या हैं। सरकार कह रही है 18 घंटे बिजली दे रहे हैं। ये सच है कि लाखों गांव बिजली से जुड़ भी गए हैं लोकिन बिजली की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। रोज ट्रांसफार्मर फुंकते हैं। सब स्टेशन पर लोड़ ज्यादा हो गया है। हमें बिल देने में कोई समस्या नहीं है। सरकार को चाहिए कम से कम 12-18 घंटे किसानों को बिजली दे।- नंदू, किसान,यूपी

किसान की जो एमएसपी तय करें, कम से कम वो तो दिलाइए

हमें नहीं कहते सरकार हर बजट में कोई बड़ी घोषणा करे, नई योजना लाए लेकिन जो पहले की हैं उन्हें पूरी करें। सरकार ने इस बार 65 रुपए धान की कीमत बढ़ाई चलो हम कहते हैं ये भी ठीक है लेकिन कम से कम सरकार ने जो कीमत तय की है, उस पर किसानों की फसल खरीदी जानी चाहिए। किसान को मंडी में आज भी रेट नहीं मिलते हैं।-अशोक शुक्ला, बिसवां, सीतापुर, यूपी

छुट्टा जानवर बड़ा सिरदर्द

छुट्टा जानवर और बकरी की समस्या हैं। बकरी पालकों को दंड का प्रावधान दिया जाए क्योंकि उनकी वजह से आम किसानो को बहुत नुकसान होता है। आमदनी बढ़ाने के लिए फसलों की इनसे होने वाली बर्बादी भी रोकनी होगी।- मो. हदी, किसान, यूपी


जब एमजॉन गोबर की कंडी बेच सकता है तो किसान अपने उत्पाद क्यों नहीं

जब ऐमजॉन गोबर की कंडी बेच सकता है। तो किसान अपने उत्पादन ऑनलाइन क्यों नहीं बेच सकता। किसान पहले सिर्फ उत्पादक और अन्नदाता था, अब उसे 50 फीसदी किसान और 50 फीसदी विक्रेता बनना होगा। वो एफपीओ, किसान क्लब आदि के माध्यम से अपनी चीजें बेचकर अपना मुनाफा बढ़ा सकते हैं। सरकार ने बजट में 10 हजार और एफपीओ बनाने की बात की है जो अच्छा फैसला है।- आनंद सिंह, प्रधान वैज्ञानिक केवीके

नहर का पानी खेत तक पहुंचे या फिर ट्यूबवेल बने

हमारे यहां पानी की दिक्कत है। खड़ी फसलें सूख जाती हैं। डीजल इतना महंगा है, किसान की खर्च बढ़ जाता है। नहर का पानी हमारे खेतों तक पहुंचे या फिर इलाके में ट्यूबवेल बनवाया जाए।- मीरा यादव, महिला किसान

केला जैसी फसलों का भी हो फसल बीमा

केला जैसी फसलों को सरकार को तुरंत फसल बीमा के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। पिछले साल सितंबर में आए तूफान में मेरा एक एकड़ केला चौपाट हो गया। करीब एक लाख का खर्च आया था, तूफान में सब चौपट गया। धान गेहूं की अपेक्षा बागवानी की फसलों में ज्यादा लागत आती है। सूखा, ओले आदि गिरने पर बहुत नुकसान भी होता है। सरकार को इसे बीमा के अंतर्गत लाना चाहिए। -सर्वेस वर्मा, किसान, यूपी

जीरो बजट खेती के लिए संसाधन कहां से लाएंगे?

यह बजट स्थाई कृषि को लेकर फिसड्डी रहा है। अगर किसानों की आमदनी बढ़ानी है तो खेती के लिए अलग से बजट लाना होगा। जीरो बजट खेती का प्रावधान कर देने से उसके लिए जरूरी संसाधन कहाँ से आयेंगे? किसान पशुपालन से मुंह मोड़ रहा है। युवा खेती से कट चुके हैं। युवाओं के मुंह मोड़ने का कारण खेती का रोजगार पैदा करने में असफल हो जाना है इसका कारण सरकारी तंत्र द्वारा भ्रष्टाचार और योजनाओं का सही क्रियान्वयन न किया जाना है।- बृहस्पति पांडे, बस्ती, यूपी

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जीरो बजट खेती कम लागत में खेती करने का तरीका

जीरो बजट फार्मिंग में बिना कर्ज और केमिकल के खेती होती है। ये कम लागत में खेती करने का तरीका है। ये कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए एक कारगर खेती का तरीका है। कर्नाटक के कुछ किसानों ने इसे अपनाया है। दक्षिण बारत के कई राज्य इसको अपनाने के लिए तैयार हैं।- सिराज हुसैन, पूर्व कृषि सचिव- एक समाचार चैनल की चर्चा के दौरान

डीएपी-यूरिया की तरह फिक्स होने चाहिए कीटनाशकों के दाम

जैसे डीएपी यूरिया के रेट तय हैं। किसान के गेहूं धान के रेट तय हैं वैसी ही रासायनिक दवाओं, माइक्रोन्यूटेंट जैसे ऐसे प्रोडक्ट के भी रेट तय होने चाहिए जिनकी किसान लगातार खरीद करते है। दुकानदार किसानों को बहुत ठगते हैं। किसी भी दवा (पेस्टीसाइड) के पैकेट को उठाकर देखिए जो मन में आता है कंपनियां वो दाम लिखती हैं। सरकार इनके रेट तय करने चाहिए।अशोक, किसान, यूपी

छोटे और भूमिहीन किसानों के लिए जीरो बजट खेती समाधान नहीं

जीरो बजट खेती मतलब बिना कर्ज़ और लागत के खेती करना। कर्ज़ में डूबे देश के किसानों, भूमिहीन किसानों, छोटे किसानों के लिए ये समाधान नहीं है।-ज्योतिरादित्य सिंधिया, राष्ट्रीय महासचिव, कांग्रेस

जब लागत शून्य होगी तो एमएसपी डेढ़ गुना कैसे तय होगा?

"जीरो बजट" खेती भ्रामक है। अरे भाई किसान, जब आप की खेती की लागत ही जीरो है, जब आप की समूची खेती ही जीरो बजट की है तो फिर जो कुछ भी उत्पादन का मूल्य आपको मिल रहा है वह सब का सब फायदा ही फायदा तो है, चाहे फिर इसे आप डेढ़ गुना मान लें, चाहे दोगुना, चाहे 100 गुना। क्योंकि फसल की लागत तो भाई साहब आपकी जीरो है।-राजाराम त्रिपाठी, राष्ट्रीय समन्यवक, अखिल भारतीय किसान महासंघ, छत्तीसगढ़, अपने एक लेख पूरा लेख यहां पढ़ें-

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