बैंक का नोटिस : वसूलीनामा यानि कर्ज़दार किसानों की आत्महत्या का बुलावा 

बैंक का नोटिस : वसूलीनामा यानि कर्ज़दार किसानों की आत्महत्या का बुलावा कर्ज़ के बोझ से परेशान एक दिन अशोक ने खेत में बनी कोठरी में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

हाल ही में यूपी के सीतापुर जिले में कर्ज की अदायगी न होने पर ट्रैक्टर वापस लेने आए लोगों पर किसान को उसी ट्रैक्टर से कुचलकर मार डालने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। कर्ज की वसूली भी किसानों के लिए मौत के पैगाम की तरह है। किसान कर्ज़ वसूली की चिठ्ठी आने को सामाजिक अपमान मानते हैं और इससे बचने के लिए अपनी ज़िंदगी ख़त्म कर लेते हैं...

बाराबंकी/कानपुर। घर पर बैंक से आई नोटिस ने अशोक सिंह को पूरी तरह से तोड़ दिया था। अब वो न तो रात में खाने के बाद रेडियो सुनते थे और न ही अपने पोते और पोतियों के साथ हंसी-मज़ाक करते थे। लगातार बढ़ते जा रहे कर्ज़ के बोझ से परेशान होकर एक दिन अशोक ने अपने खेत में बनी कोठरी में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

लखनऊ शहर से 60 किमी. पूर्व दिशा में बाराबंकी जिले के सोनिकपुर गाँव में अशोक सिंह का परिवार आज भी इस घटना को भुला नहीं पा रहा है। दो सयानी बेटियों की शादी की चिंता अशोक को अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। इसी बीच जुलाई 2016 में बैंक से आए नोटिस ने उन पर गहरा मानसिक असर डाला था। अशोक सिंह के बेटे विजय सिंह (31 वर्ष) ने बताया, ''जब से बैंक का नोटिस आया था, तब से पिता जी परेशान थे, किसी से ज़्यादा बोलते नहीं थे। हर रोज़ की तरह रात में खाना खाने के बाद पिता जी खेत में बनी कोठी में सोने चले गए। सुबह के दस बजे तक जब वो घर नहीं पहुंचे, तो हम उन्हें देखने खेत पर गए थे, जहां कमरे में वो फंदे से लटके हुए थे।''

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वसूली की चिट्टी को मानते हैं सामाजिक अपमान

ग्रामीण क्षेत्रों में किसी के घर पर सरकारी नोटिस आना या तहसील से कर्ज़ वसूली की चिठ्ठी आने को लोग सामाजिक अपमान मानते हैं। प्रदेश में किसानों व ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में तेज़ी से बढ़ रहे अवसाद पर अध्य्यन कर रहे मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पांडेय बताते हैं, ''भारतीय किसान आज भी खेती किसानी को बिज़नेस की तरह नहीं मानते हैं, खेती के कामों में उनकी भावुकता जुड़ी होती है। बैंक से लोन लेते वक्त किसान यह सोचता है कि वह इसे आसानी से चुका देगा, लेकिन घरेलू ज़िम्मेदारी और कभी-कभार फसल बर्बाद हो जाने के कारण किसान कर्ज़ चुका नहीं पाते हैं और मानसिक तनाव का शिकार बन जाते हैं।''

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट यह बताती है कि वर्ष 2015 में 3,000 से अधिक किसानों ने बैंकों से ऋण लेने और फिर दिवालिया होने पर गहरे अवसाद के कारण आत्महत्या कर ली। इसमें से करीब 2,474 किसानों ने लघु ऋणदायी संस्थाओं से लोन लिया था।

दिया जा रहा कर्ज़माफी का लाभ

प्रदेश में ऋणमाफी भुगतान का मुद्दा इस समय सुर्खियों में है, मौजूदा समय में कर्ज़माफी की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए बांदा जिले में इलाहाबाद ग्रामीण बैंक के क्षेत्रीय अधिकारी (पीओ) शशांक तिवारी बताते हैं, ''इस समय प्रदेश में सक्रिय खाता धारकों को कर्ज़माफी का लाभ दिया जा रहा है। यह प्रकिया पूरी होने के बाद ही मृतक व आस्थाई खातों को भी कर्ज़ माफी का लाभ दिया जाएगा।''

किसान अशोक सिंह ने अपने गाँव के पास ही बैंक आफॅ इंडिया, शाखा मनकपुर से 1.8 लाख रुपए का फसली ऋण लिया था। इसके अलावा उन्होंने हैदरगढ़ के भूमि विकास बैंक से वर्ष 2007 में 70 हज़ार रुपए का कर्ज़ लिया था। यह लोनराशि तय समय सीमा पर न अदा कर पाने से लगातार बढ़ती गई और उनपर ढाई लाख का कर्ज़ चढ़ गया।

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गाँवों में ऋण न अदा कर पाने के कारण किसानों को सामाजिक अवहेलना का हिस्सा बनाए जाने पर डॉ. राकेश ने आगे बताया कि गाँव के किसी भी व्यक्ति के पास बड़ी राशि चुकाने का कोई नोटिस आता है तो लोग उस व्यक्ति को सहारा देने के बजाए वो यह सोचने लगते हैं कि वो व्यक्ति कहीं से इतना पैसा चोरी की होगी, जिसे अब पुलिस ने पकड़ लिया है। धीरे धीरे आस-पड़ोस में भी यह चर्चा का विषय बन जाता है। इससे किसानों को गहरा सदमा लगता है।

अशोक सिंह की तरह ही उनके गाँव से करीब 150 किमी. दूर दक्षिण दिशा में कानपुर जिले के गुरैयनपुर गाँव के किसान राजेंद्र कुमार निषाद ने मई 2017 में बैंक से आई नोटिस से परेशान होकर अपने खेत में जाकर बबूल के पेड़ पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

बैंक से आई नोटिस में यह लिखा था कि (अगर एक माह के भीतर बैंक को देय 1.9 लाख रुपए धनराशि जमा नहीं की गई, तो बिना किसी अदालती कार्रवाई के संबंधित भूमि नीलाम कर दी जाएगी) बैंक से आयी इस नोटिस की जानकारी पूरे गाँव में फैल गई। कर्ज़ में डूबे राजेंद्र ने जगहंसाई से बचने के लिए अपने आपको खत्म कर देना ही ठीक समझा।

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कानपुर जिले में यमुना नदी की तलहटी पर बसे गुरैयनपुर गाँव में किसान गेहूं और ज्वार जैसी फसलों की खेती करते हैं। समतल ज़मीन न होने के कारण किसानों के पास बड़े खेत नहीं हैं। पिता की मौत के बाद अरविंद कुमार निषाद (35 वर्ष) ने कर्ज़ चुकाने के लिए बैंक से एक वर्ष की मोहल्लत और मांगी है। अरविंद ने बताया, ''नोटिस आने के बाद बापू गुमसुम रहने लगे थे। न किसी से ज़्यादा बोलते थे और न ही घर पर ज़्यादा रहते थे।'' रोते हुए अरविंद ने आगे बताया, "घर की पूरी ज़िम्मेदारी अब हमारे ऊपर आ गई है। कभी सोचा नहीं था कि बापू अपने साथ ऐसा कर लेंगे।"

अरविंद निषाद

पंजाब के बननाला क्षेत्र में गाँव जग्गा रामतीरथ के किसान निर्भय सिंह ने बैंक के दबाव के कारण फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली थी। उन्होंने बैंको और गाँव के साहूकारों से 12 लाख रुपए का कर्ज़ा लिया था। वहीं कौहरयां गाँव के किसान कर्मजीत सिंह ने बैंक का छह लाख रुपए का कर्ज़ ना चुका पाने पर परेशान होकर अपने खेत में जाकर जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली। पिछले महीने में पंजाब राज्य में चार किसानों ने बैंक को तय समय कर्ज न अदा कर पाने के कारण बढ़ रहे मानसिक तनाव में आकर आत्महत्या ली थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में किसी के घर पर सरकारी नोटिस आना या तहसील से कर्ज़ वसूली की चिठ्ठी आने को लोग सामाजिक अपमान मानते हैं। बनारस के भारतीय हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ समाजशास्त्री दिनेश कुमार सिंह पिछले तीन वर्षों से लोगों के व्यवहार व समय के साथ-साथ हो रहे सामाजिक बदलावों पर शोध कर रहे हैं। दिनेश बताते हैं,'' बैंक किसानों को फसली ऋण एक फसल चक्र के हिसाब देते हैं, अगर उस फसल चक्र में किसान की फसल खराब हो जाती है, तो वह निर्धारित समय में बैंक में पैसा नहीं जमा करवा पाता है। इसकी वसूली के लिए बैंक किसानों को नोटिस, वसूलीनामा भिजवाता है।'' उन्होंने आगे बताया कि गाँव में आज भी लोग घर पर जवाबनामा या लीगल नोटिस के आने को सामाजिक बेइज्जती मानते हैं।

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उत्तर प्रदेश में किसान आत्महत्याओं का लेखा जोखा रखने के लिए वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सभी जिलाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देशित किया कि किसी भी किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर मिलने पर तत्काल मौके पर जाकर आत्महत्या के वास्तविक कारणों की जानकारी हासिल करें। इसके अलावा किसानों को कर्ज़ के बोझ से बचाने के लिए योगी सरकार ने 36,000 करोड़ रुपए की कर्ज़माफी का ऐलान किया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर किसानों के परिवारों की दशा जस की तस ही बनी हुई है।

अपने पिता की मौत के बाद अरविंद ने किसी तरह रिश्तेदारों व पड़ोसियों की मदद से उनका अंतिम संस्कार करवाया। उनके पिता की मौत के बाद न तो तहसीलदार ने उनकी मदद की और न ही जिला प्रशासन ने। यहां तक की पिता की मृत्यु के बाद भी बैंक का दबाव खत्म नहीं हुआ।

एनसीआरबी 2015-16 के मुताबिक देश में किसान आत्महत्या के मामले साल 2015 में सबसे ज़्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में रहें, इसके बाद 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक दूसरे स्थान पर रहा। तेलंगाना में 1,400 किसानों ने आत्महत्या की। इसके बाद मध्य प्रदेश में 1,290 मामले, छत्तीसगढ़ में 954 मामले, आंध्र प्रदेश में 916 मामले, तमिलनाडु 606 मामले और उत्तर प्रदेश में 324 मामले सामने आए हैं।

भारत में कृषि व ग्रामीण आजीविका निर्माण पर काम रही संस्था डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी एसएन प्रसाद बताते हैं, ''सरकार ऋणमाफी की बात तो करती है, लेकिन ज़मीनी तौर पर किसान परेशान ही रहते हैं। कर्ज़माफी से सभी किसानों को बराबर लाभ मिल सके, इसके लिए सरकार को ऋणमाफी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना ज़रूरी है। किसानों को कर्ज़ लेने की नौबत ही न आए इसके लिए उन्हें खुद से जागरूक होना पड़ेगा।"

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"सरकार अगर जिलास्तर पर किसानों को मौसम संबंधी खेती, मिट्टी के अनुसार खेती, उन्नत बीज का चयन और स्थानीय भाषा में किसानों को कृषि सलाह दे, तो किसानों की कर्ज़ लेने की प्रवृत्ति अपने आप कम हो जाएगी।" उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया।

कर्ज़ वसूली के लिए बैंक अपनाते हैं कई तरीकें

एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में बुंदेलखंड के 3,500 किसानों ने आत्महत्या कर ली।

किसानों द्वारा समय पर फसली ऋण न चुकाने पर बैंक से होने वाली कार्यवाई के बारे में बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा जिले में इलाहाबाद ग्रामीण बैंक के क्षेत्रीय अधिकारी (पीओ) शशांक तिवारी बताते हैं, ''फसली ऋण को चुकाने के लिए बैंक किसानों को एक वर्ष का समय देता है। इसके बाद बैंक की तरफ से किसानों को नोटिस भेजकर यह सूचित किया जाता है कि आपके ऋण भुगतान का समय पूरा हो गया है। इसलिए एक महीने के भीतर अपनी लोनराशि जमा कर दें।'' उन्होंने आगे बताया कि नोटिस के बाद अगर किसान तय समय पर भुगतान नहीं करता है, तो बैंक किसान का ब्योरा तहसील में जमाकर देता हैं, फिर अपने स्तर पर तहसीलदार अमीन को किसान के घर भेजकर कर्ज़ वसूलता है।

प्रशासन की अनदेखी से महिला किसान परिवारों को नहीं मिल पाता इंसाफ

उत्तर प्रदेश में तेज़ी से बढ़ रही किसान आत्महत्याओं पर शोध कर रही संस्था एक्शन ऐड के अनुसार महिला किसानों व्दारा की गई आत्महत्याओं के बाद संबंधित परिवारों को सामाजिक व प्रशासनिक दबाव झेलना पड़ता है।शोध के अनुसार प्रदेश के बुंदेलखंड में आठ फीसदी ज़मीन का मलिकाना हक महिलाओं के पास है। क्योंकि महिलाओं के नाम पर ज़मीन का पट्टा नहीं होता है, इसलिए उन्हें किसान नहीं माना जाता है। लिहाजा उनकी आत्महत्याओं को किसानों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। किसान महिलाओं की आत्महत्याओं को प्रशासन गृह कलह का नाम दे देता है, जिससे पीड़ित परिवारों को इंसाफ नहीं मिल पाता है और सरकारी मुआवजे के लिए परिवार दर-बदर भटकता रहता है।

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