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राहत पैकेज को किसानों के लिए मायूसी भरा बताते हुए किसान संगठन ने कहा- आत्मनिर्भरता नहीं, आत्महत्या बढ़ेगी

राहत पैकेज को किसानों के लिए मायूसी भरा बताते हुए किसान संगठन ने कहा- आत्मनिर्भरता नहीं, आत्महत्या बढ़ेगी

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख के आर्थिक पैकेज की दूसरी किस्त के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि ये गरीबों और किसानों के लिए हैं। लेकिन किसान संगठनों ने इसे निराशाजनक बताया है। भारतीय किसान यूनियन ने कहा कि सरकार को घोषणाओं से किसान आत्मनिर्भर नहीं बल्कि आत्महत्या की तरफ रूख करेगा। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ राकेश टिकैत ने कहा कि जल्द एक और किसान आंदोलन का आगाज होगा।

भारतीय किसान यूनियन ने वित्त मंत्री द्वारा किसानों के लिए घोषित आर्थिक पैकेज पर सवाल उठाते हुए कहा कि कृषि ऋण को तीन माह के आगे बढ़ाने एवं नए किसान क्रेडिट कार्ड से लोन दिए जाने के अलावा नया क्या है? हमारे नीति निर्धारकों को यह बात कब समझ में आएगी कि अगर हमारे कृषि, कृषि उद्योगों के लिए अनुकूल माहौल होता तो उन्हें ऋण की आवश्यकता कहां थी। बैंक उन्हें ऋण देने में इतना नहीं हिचक रहे होते। बैंकों के पहले से ही यह राशि पड़ी है। पर नया ऋण लेकर कोई भी जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है।"

राकेश टिकैत ने अपने बयान में आगे कहा कि भारत एक गहरे आथिक संकट के जाल में फंसा है। यह आर्थिक संकट का जाल कोरोना की ही देन नहीं है, बल्कि कोरोना पूर्व का है। कोरोना संकट ने इसमें आग में घी का काम किया है। भारत में नोटबन्दी और जीएसटी से तबाह हुई अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार द्वारा कुछ समय तक 'मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, स्मार्ट सिटी, सांसद ग्राम, विदेशी निवेश, पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था जैसे जुमलों से ढकने की कोशिश की गई। पर पिछले वित्तीय वर्ष के तीसरी तिमाही के आंकड़े आने तक खुद मोदी सरकार मान चुकी थी कि हमारी विकास दर अब 4.5 प्रतिशत पर रहेगी। कृषि की विकास दर 2.7 पर सिमट चुकी है।"

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ग्रामीण भारत के बाजारों में मांग का भारी अभाव पैदा हो गया है, देश के आम आमदनी की क्रय शक्ति में काफी गिरावट आई है। किसान नेता ने कहा कि "तब तमाम अर्थशास्त्रियों, विपक्षी दलों, ट्रेड यूनियन से लेकर किसान संगठनों ने सरकार से मांग की थी कि देश में अगर लिक्विडिटी (तरलता) को बढ़ाना है तो आम लोगों के हाथ में पैसा देना होगा। लेकिन वित्त मन्त्री निर्मला की घोषणाओं में कहीं भी किसानों,मजदूरों की मांगों को स्थान मिलता नहीं दिखा। मार्च-अप्रैल के वेतन बिना ही भूख से लड़ते-मरते मजदूरों का बड़ा हिस्सा अपने गांवों की ओर लौट रहा है। केंद्र व राज्य सरकारों की पूर्ण उपेक्षा से इतनी अमानवीय तकलीफों को झेल कर जो मजदूर गांव लौटे हैं, उनका बड़ा हिस्सा सामाजिक आर्थिक सुरक्षा की गारंटी के बिना जल्दी वापसी नहीं करेगा, जिससे कई राज्यो की खेती प्रभावित होगी"

राकेश टिकैत ने कहा कि कोरोना संकट ने बाजार में मांग का और भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। जीवन के लिए बहुत जरूरी वस्तुओं को छोड़ बाकी उत्पादों की मांग तब तक नहीं बढ़ेगी, जब तक देश के 80 करोड़ मजदूरों-गरीबों-किसानों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ जाती। ऐसे में बैंक ऋण का झुनझुना स्थिति में सुधार नही लाया जा सकता। किसानों को सरकार से बड़ी निराशा मिली है।

उन्होंने आगे कहा कि सरकार की घोषणाओं से किसान आत्मनिर्भरता की नहीं आत्महत्या की तरफ रुख करेगा। जिस आत्मनिर्भरता की बात सरकार कर रही है उसको हासिल करना खेती के बिना हासिल करना कठिन ही नही असंभव है। किसान बेमौसम मार पहले से ही झेल रहे है। किसानों के नुकसान की भरपाई व ऋण माफी हेतु भारतीय किसान यूनियन जल्द ही रणनीति तय कर बड़े आंदोलन का आगाज करेगी।"

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