नर्सरी का गढ़ बन रहा अमरोहा, विदेशों तक पौधे बेच मुनाफा कमा रहे किसान

कई गांवों के किसानों से परंपरागत खेती के साथ शुरू किया नर्सरी का कारोबार, हजारों ग्रमीणों को मिला रोजगार

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   6 Feb 2019 8:15 AM GMT

नर्सरी का गढ़ बन रहा अमरोहा, विदेशों तक पौधे बेच मुनाफा कमा रहे किसान

लखनऊ। अमरोहा के दर्जनभर गाँवों के किसान परंपरागत खेती छोड़ नर्सरी का कारोबार कर रहे हैं। नर्सरी के करोबार से क्षेत्र के करीब तीन हजार ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा है, जिससे पलायन रुक गया है। लोगों को गांव में ही साल पर रोजगार मुहैया हो रहा है। एक हजार नर्सरी में विकसित पौधे एनसीआर समेत कई राज्यों में सप्लाई हो रहे हैं।

नर्सरी का कारोबार करने वाले साहिल ने बताया, " हमारे यहां से तैयार पौधे एनसीआर समेत राजस्थान, पंजाब, मध्यमप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में सप्लाई होते हैं। लखनऊ स्थित जनेश्वर मिश्र पार्क में हमारे यहां से ही पौधे गए हैं। रीवर फ्रंट की खूबसूरती भी हमारे यहां की नर्सरी में तैयार पौधे बढ़ा रहे हैं। देश के बड़े-बड़े दफ्तरों, फार्म हाउस और पार्कों में अमरोहा से ही पौधे जाते हैं। कुछ बाहरी देशों से भी पौधे के ऑर्डर आ रहे हैं। हसनपुर से रोज कई ट्र्रक पौधे सप्लाई होते हैं। "

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तहसील हसनपुर क्षेत्र के सिहाली जागीर गाँव के नर्सरी कारोबारी शरद कुमार ने बताया, " मैं वर्ष 1993 से नर्सरी का कारोबार कर रहा हूं। इससे पहले में गेहं और गन्ने की खेती करता था, लेकिन मुनाफा ज्यादा नहीं होता था। हमारे गांव से शुरू हुआ नर्सरी का कारोबार सहसोली, मनौटा,सैमली, सैमला, आलमपुर, वसीकला, मछरई समेत दो दर्जन गाँवों में फैल गया है। यहाँ के दर्जनों किसान परम्परागत खेती के अलावा नर्सरी के कारोबार से जुड़ गए हैं।"

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नर्सरी के कारोबार से जुड़े सुहैल ने बताया, " सिहाली जागीर गांव के करीब 200 लोग नर्सरी का कारोबार करते हैं। ऐसे में हम लोगों को मजदूरों की जरुरत होती है। पास के गांवों से मजदूर मिल जाते हैं। मजदूरों को भी पूरे साल रोजगार मिल जाता है जिससे उनकी भी आर्थिक स्थिति बदल रही है। कुछ नर्सरी मालिक दिहाड़ी के हिसाब से मजदूरी कराते हैं। तो कुछ ठेके पर काम करा रहे हैं।"

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इन पौधों की नर्सरी लगती है, अगाला ओनिमा, अम्ब्रेला पाम, देफेनबेकिया, कैलैडियम,सुदर्शन, कोचिया, ब्राह्मी, नीबू घास, केवाच, मनी प्लांट, क्रोटन, फ़र्न, कोलिअस, तुलसी, एमरान्थास, कैकटस, केलेंदुला, गेंदा, गुलदाउदी, जेरेनियम, गुलाब, गुड़हल, कंटीली चंपा, बेला, खजूर।

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नर्सरी में मजदूरी करने वाले महावीर ने बताया, " पहले में दिल्ली में रहकर मजदूरी करता था। लेकिन पूरे साल काम नहीं मिलता था। जब खेत कटाई और बुआई का समय होता था वापस आना पड़ता था। ऐसे में बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता था। लेकिन मैं अब नर्सरी में काम करता हूं। मुझे यहां पूरे सालभर काम मिलता है। रोज शाम को पैसे मिल जाते हैं। मेरे परिवार के कई लोग और नर्सरी में काम करते हैं।"

इन गाँवों में विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधों की नर्सरी तैयार करके दिल्ली-एनसीआर सहित विभिन्न शहरों को भेजी जाती है। नर्सरी का कारोबार बारहमासी है। हर मौसम में पौधों की बिक्री चलती रहती है। मजदूरों को भी साल भर काम मिलता है।

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