'मैनिफैस्टो फॉर चेंज' चिंताशील नागरिकों के एजेंडे में किसान

देश के एक बहुत बड़े जागरूक समूह ने देश की बेहतरी के लिए एक एजेंडा या खाका पेश किया है। इस समूह में विभिन्न क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियां शामिल हैं। यहां यह याद दिलाना भी ठीक रहेगा कि कुछ समय पहले ही गाँव कनेक्शन के संवाद स्तंभ में भी एक सुझाव रखा गया था।

मैनिफैस्टो फॉर चेंज चिंताशील नागरिकों के एजेंडे में किसान

सन 2019 कई तरह से खास है। देश के पांच साल के भविष्य के लिहाज़ से तो बहुत ही खास है। दो महीने बाद ही चुनाव होने हैं। राजनीतिक दल अपना अपना एजेंडा बनाने में लगे हैं, लेकिन इसी बीच एक नई बात यह दिखी है कि देश का प्रबुद्ध और चिंताशील समाज भी सक्रिय दिख रहा है।

इसका सुबूत यह है कि इसी हफ़्ते देश के एक बहुत बड़े जागरूक समूह ने देश की बेहतरी के लिए एक एजेंडा या खाका पेश किया है। इस समूह में विभिन्न क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियां शामिल हैं। यहां यह याद दिलाना भी ठीक रहेगा कि कुछ समय पहले ही गाँव कनेक्शन के संवाद स्तंभ में एक सुझाव रखा गया था। सुझाव यह था कि देश के बदहाल किसानों के पक्ष में देश के कुछ लब्ध प्रतिष्ठित लोगों को उठना पड़ेगा।

खुशी की बात है कि देश के जागरूक और लब्ध प्रतिष्ठित समूह ने देश की बेहतरी के लिए सुझाए गए इस दस्तावेज में किसानों के पक्ष में वैसी ही शिद्दत से कोशिश की है।

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में धान की रोपाई के लिए जाती महिला किसान। फोटो- अरविंद शुक्लाछत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में धान की रोपाई के लिए जाती महिला किसान। फोटो- अरविंद शुक्ला

क्या है यह एजेंडा या कार्यक्रम या मैनिफैस्टो

देश के 27 महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सहमति से जारी प्रस्तावित यह कार्यक्रम देश की गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए सुझावों की सूची जैसा है। इस दस्तावेज़ का मुख्य मकसद भी आसानी से समझ में आ रहा है। वह ये कि एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों की बेहतरी के लिए ऐसा क्या किया जाए? जिससे एक आदर्श लोकतांत्रिक देश बनता हो।

सुझावों के इस दस्तावेज में देश के सामने आन खड़ी हुई आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक और राजनीतिक क्षेत्र की बड़ी- बड़ी समस्याओं का समाधान सुझाया गया है। इस दस्तावेज में इतना भर नहीं है कि क्या किया जाए? बल्कि लगे हाथ वे तरीके भी बताए गए हैं कि यह काम कैसे किया जाए। यहां तक कि अपने सुझाए कार्यक्रम को लागू करने के लिए जरूरी संसाधन जुटाने के सुझाव भी इस दस्तावेज में हैं। प्रबंधन प्रौद्योगिकी के नजरिए से किसी भी परियोजना के लिए जरूरी संसाधनों का आकलन सबसे बड़ी शर्त मानी जाती है।

क्या नाम है इस दस्तावेज का?

दस्तावेज का नाम है 'मैनिफैस्टो फॉर चेंज' यानी बदलाव का कार्यक्रम। साथ में यह मकसद भी जोड़ा गया है कि अपने देश का आदर्श गणतंत्र रूप फिर से कैसे हासिल किया जाए। अंग्रेजी में इसे 'रीक्लेमिंग द रिपब्लिक' कहा गया है। इस दस्तावेज़ में क्या सुझाव हैं इसकी चर्चा करने के पहले यह देखना भी जरूरी है कि कार्यक्रम पेश करने वाले इस समूह के सदस्यों की अकादमिक, पेशेवर और सामाजिक हैसियत क्या है?

सभी सदस्य देश के जाने-पहचाने नाम

सभी सदस्यों के कृतित्व का ज्यादा जिक्र करना बहुत जरूरी इसलिए नहीं है क्योंकि इनमें एक भी ऐसा नाम नहीं है जिसे मीडिया के जरिए पहले सुना या पढ़ा न गया हो। मसलन 20वें भारतीय लॉ कमीशन के पूर्व अध्यक्ष और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह इस विशेष समूह के चेयरमैन हैं। राजनयिक और प्रसिद्ध लेखक गोपाल गांधी, विदूषी और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय, ग्रामीण पत्रकारिता करने वाले और मेगसेसे अवार्ड से सम्मानित पी. साईंनाथ, राजनीतिक विश्लेषक और आजकल किसानों के लिए काफी सोच-समझ नीतियों के बारे में बात कर रहे योगेंद्र यादव, देश के मशहूर वकील प्रशांत भूषण इस दस्तावेज के निर्माताओं में शामिल हैं। समूह के दूसरे सदस्यों में निखिल डे, विपुल मुदगल, प्रभात पटनायक, दीपक नैयर जैसे बड़े नाम भी हैं।

इस दस्तावेज में है क्या?

इस दस्तावेज में देश में इस साल बनने वाली सरकार के लिए 19 सुझाव हैं। ये सुझाव कल्याणकारी राज्य के लक्षणों की बहाली और लोकतांत्रिक नियमन से लेकर वित्तीय सुधार जैसे मुद्दों पर हैं। इन सुझावों में न्यायिक सुधार, चुनाव सुधार खासतौर पर चुनावी खर्च पर नियंत्रण के तरीके, मीडिया की स्वतंत्रता बहाल करने वाले महत्वपूर्ण सुझाव हैं।

इसी के साथ गरीबों और आम नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उपाय, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा का विस्तार और देश में आज की सबसे बड़ी चिंता रोज़गार के सृजन के संभावित क्षेत्र, पर्यावरण, महिला सशक्तीकरण, भेदभाव के विरूद्ध प्रभावी कानून, पुलिस सुधार, न्यायिक सुधार के लिए व्यवस्थित और व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं। आज की सबसे बड़ी जरूरत यानि वित्तीय रणनीति और संसाधन जुटाने के लिए कर व्यवस्था में बदलाव के लिए कई उपाय भी इस दस्तावेज़ में हैं।

प्रस्तावित कार्यक्रम लागू करने के खर्च का हिसाब

एक सौ 35 करोड़ आबादी और 32 करोड़ हेक्टेअर क्षेत्रफल वाले अपने इतने बड़े देश के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए? इस पर आमतौर पर आम राय बन ही जाती है। आसानी से सबकी समझ में आ जाता है कि कमजोर और वंचित तबके कौन से हैं। किसान और दूसरे कमजोर वर्गों के लिए क्या-क्या योजनाएं होनी चाहिए इसे लेकर भी किसी को भी ज्यादा दुविधा होती नहीं है।

लेकिन इन कामों के लिए जितने संसाधनों की जरूरत होती है वह पैसा कहां से जुटाया जाए? इसी बात को तय करने में दिक्कत आती है। हाल में आए देश के अंतरिम बजट में भी शाश्वत प्रश्न यही रहा कि सरकार ने जनता के लिए थोड़ा बहुत जितना भी देने का इरादा बनाया उसके लिए पैसे का प्रबंध कहां से किया जाए, यानी बिना आमदनी बढाए या बिना वित्तीय घाटा बढ़ाए वह पैसा आएगा कहां से? सामान्य अनुभव है कि खर्च की हैसियत न होने का तर्क देकर यह सोचा भी नहीं जा पाता कि देश के लिए क्या करना जरूरी है।

लेकिन समयसिद्ध, जागरूक और चिंताशील नागरिकों के इस मेनिफैस्टो में लगता है कि संसाधनों के प्रबंधन के मुद्दे पर सबसे ज्यादा सोचा गया। मसलन इस दस्तावेज में दिए गए सभी सुधारों सुझावों को अमल में लाने के लिए खर्च का हिसाब लगाया गया है। यह खर्चा सकल घरेलू उत्पाद का दस फीसद बैठता है। इसमें जीडीपी का पांच फीसद सिर्फ रोजगार पैदा करने, खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च करने की बात कही गई है।

आधी से ज्यादा आबादी यानी किसानों के लिए क्या खास है?

स्वामीनाथन आयोग के सीटू फॉर्मूले से किसान की लागत पर 50 फीसद लाभ देने का सुझाव इस दस्तावेज़ में है। इसी के साथ किसानों के लिए एकमुश्त कर्ज माफी, राष्ट्रीय कर्ज राहत आयोग का सुझाव और आपदा प्रभावित फसलों के लिए प्रभावी राहत के नियम बनाने की बात भी इस दस्तावेज में खासतौर पर है। खेती के लिए जरूरी ट्रेक्टर, खाद, बीज जैसी चीजों के दाम घटाने के तरीकों, किसान योजनाओं से मिलने वाले लाभों को बटाईदारों, महिला किसान, भूमिहीन किसान, खेतिहार मजदूर, पशुपालकों आदि तक भी पहुंचाने पर इस कार्यक्रम में जोर दिया गया है।

क्या हो? से ज्यादा कैसे हो? पर जोर

चाहे राजनीतिक दलों के घोषणापत्र हों या चाहे विशेषज्ञों के सुझाव हों उनमें यह तो देख लिया जाता है कि समस्या क्या है? यह भी सोच लिया जाता है कि क्या करने की जरूरत है? लेकिन अब तक का अनुभव यह है कि वैसा करने का तरीका यानी रोडपैम क्या हो ? वह नक्शा नहीं सोचा जा पाता। यानी आमतौर पर सदिच्छा तो जताई जाती है लेकिन व्यावहारिक प्रकिया तय नहीं हो पाती।

लेकिन बुद्धिजीवी और समाज के लिए समर्पित इस समूह के दस्तावेज में कार्यक्रम को लागू करने के लिए उस प्रक्रिया का भी सुझाव है और जरूरी संसाधनों का आकलन भी है। यानी जो कुछ करना है उसके लिए पैसा कितना चाहिए और वह आ कहां से सकता है? उसका हिसाब भी इस दस्तावेज में है। संसाधन जुटाने के लिए इस समूह ने वित्तीय रणनीति में कई बड़े बदलाव के सुझाव पेश किए हैं। इन सिफारिशों में नए कर लगाकर राजस्व बढ़ाने का रास्ता सुझाया गया है।

मसलन 20 फीसद इनहैरिटेंस टैक्स, 10 करोड़ से ज्यादा आमदनी वालों पर वैल्थ टैक्स, कॉरपोरेट सोशल टैक्स, पर्यावरण क्षतिपूर्ति टैक्स जैसी सिफारिशें की गई हैं। इसके अलावा कई तर्कहीन कॉरपोरेट सब्सिडी हटा कर भी राजस्व बढ़ाने की बात की गई है। इन उपायों से देश की जीडीपी की तीन से पांच फीसद रकम जमा होने का हिसाब है। जीडीपी का पांच फीसद यानि करीब दस लाख करोड़ रुपए जुटाने की सिफारिश है। बेशक पहली नज़र में इतनी भारी रकम सरकार और सरकारी अर्थशास्त्रियों को हैसियत के बाहर की बात लग सकती है। लेकिन बहुत संभव है कि विशेषज्ञ लोग जब बारीकी से सोचने बैठेंगे तो इस पैसे के प्रबंधन का तरीका भी निकल सकता है। इसी विश्वास को बढाने में यह दस्तावेज बड़ी भूमिका निभा सकता है।


इस साल तीन लाख करोड़ तो हमने बढ़ाए ही

इस साल अंतरिम बजट पेश होते समय पता चला कि चुनावी साल में सरकार ने राजस्व बढ़ाने की कोई खास कोशिश किए बगैर ही तीन लाख करोड़ का राजस्व बढ़ाने का हिसाब लगा लिया। बजट का आकार पिछले साल के 24 लाख करोड़ से बढ़ाकर इस साल लगभग 27 लाख करोड़ कर लिया गया। और यह उस सूरत में कर लिया गया जबकि खाते पीते और अमीर तबके से ज्यादा टैक्स लेने की कोशिश भी नहीं की गई।

जबकि लोकतांत्रिक लक्ष्य यानी सबको समानता का स्तर सुनिश्चित करने के लिए तरीका एक ही होता है कि अमीरों से उनके मुनाफे का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा टैक्स के रूप में लिया जाए और उस पैसे को वंचित और गरीब तबके के कल्याण पर खर्च किया जाए। इस प्रस्तावित दस्तावेज का विश्लेषण अभी इस लिहाज से हुआ नहीं है लेकिन अगर विश्लेषण हो तो बात यही निकल कर आएगी कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में हम गरीबों, किसानों, बेरोजगारों, महिलाओं और कुपोषित बच्चों के कल्याण के लिए धन के रूप् में गुंजाइश नहीं बना पा रहे हैं। इस लिहाज़ से यह दस्तावेज़ नागरिकों के बीच बहस शुरू कराने का एक आधार बन सकता है।

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