झारखंड में किसानों ने कहा, खरीफ धान सूखे की चपेट में, गेहूं बोने के लिए हाथ में कुछ नहीं बचा

इस साल झारखंड के 24 में से 22 जिलों में सूखा की समस्या इतनी विकट रही कि लाखों किसान आर्थिक तंगी के चलते अपने खेतों में अगली फसल की बुवाई नहीं कर पा रहे है। वे अपने खाने की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के खाद्य राशन पर निर्भर हैं और इस उम्मीद में हैं कि उनके मुआवजे के दावों का जल्द से जल्द निपटारा कर दिया जाएगा। पलामू जिले से एक ग्राउंड रिपोर्ट-

Ashwini K ShuklaAshwini K Shukla   21 Nov 2022 8:28 AM GMT

झारखंड में किसानों ने कहा, खरीफ धान सूखे की चपेट में, गेहूं बोने के लिए हाथ में कुछ नहीं बचा

35 साल के राजलाल भुइया के पास कोई जमीन नहीं है और वह हर साल बटिया (बंटाई पर खेती) पर जमीन लेते हैं। बंटाई पर जमीन लेने का मतलब आपसी बातचीत के आधार पर काश्तकार और जमींदार दोनों खर्च का आधा-आधा खर्च उठाते हैं और फसल का आधा- आधा हिस्सा बांट लेते हैं। सभी फोटो: अश्विनी शुक्ला

सुकरी (पलामू), झारखंड। पलामू जिले के सुकरी गाँव की देवंती कुंवर अपने परिवार में अकेले कमानी वाली हैं। उनके पति की तीन साल पहले मौत हो गई थी। तब से उन्होंने अपने चार बच्चों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी है। अगर इस साल झारखंड में खरीफ (मानसून) का सूखा नहीं होता देवंती रबी की गेहूं की फसल के लिए जमीन तैयार करने के लिए जोतना शुरू कर देती। लेकिन उनका खेत, जो उनके परिवार का भरण-पोषण करता था, खाली पड़ा है। उनके चार बच्चे हैं और ये सभी अपने दो हेक्टेयर में फैले खेतों में उगने वाली फसल पर निर्भर हैं।

उन्होंने कहा, "अगर अच्छी बारिश होती, तो मेरी धान की फसल इस समय तक पक जाती और मैं फसल बेचकर तीस से चालीस हजार रुपये कमा लेती। लेकिन इस बार मेरे खेतों में चावल का एक भी दाना नहीं उगा।" 45 साल की किसान ने गाँव कनेक्शन को बताया, "मैं कर्ज में डूबी हूं, मुश्किल से रोजाना के खाने खर्चे का भार उठा पा रही हूं। आप मुझे बताएं कि मैं अब गेहूं कैसे बोऊंगी?"

देवंती कुंवर के अनुसार, हाल ही में उन्होंने अपनी एक बेटी की शादी की थी, जिसके चलते उन पर 60,000 रुपये का कर्ज है। उन्होंने कहा, "कर्ज चुकाने और अगली फसल के लिए खेत तैयार करने की मेरी सभी योजनाएं बेकार हो गई हैं।"

देवंती झारखंड के गाँवों के उन सैकड़ों-हजारों किसानों में से हैं, जो अपनी आजीविका के लिए खेतों से होने वाली फसल पर निर्भर है। और फिलहाल मानसून के मौसम में सूखे से धान की फसल तबाह हो जाने के बाद से परेशान हैं।

पलामू जिले के सुकरी गाँव की देवंती कुंवर अपने परिवार में अकेले कमानी वाली हैं।

पिछले महीने 29 अक्टूबर को मुख्यमंत्री (सीएम) हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) की बैठक में राज्य के 24 में से 22 जिलों के कुल 226 ब्लॉकों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया था। यह निर्णय राज्य में कम मानसून के मौसम (जून से सितंबर) की बारिश के कारण लिया गया। राज्य के किसान अब सूखे की घोषणा और सूखा राहत की मांग कर रहे हैं।

29 अक्टूबर को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में सीएम सोरेन को यह घोषणा करते हुए उद्धृत किया गया था कि इन 226 ब्लॉकों में रहने वाले सूखा प्रभावित परिवारों को वित्तीय मुआवजे के रूप में 3,500 रुपये दिए जाएंगे। बयान में कहा गया है कि मुआवजे से तीन लाख से अधिक किसानों को लाभ होने की उम्मीद है।

अभी तक सूखा राहत नहीं, किसानों की शिकायत

गाँव कनेक्शन ने पलामू जिले के मेदिनीनगर और चैनपुर ब्लॉक में सूखे की वजह से प्रभावित हुए कुछ ग्रामीणों से सूखा राहत और मुआवजे के बारे में पूछा था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें अभी तक कुछ नहीं दिया गया है।

मेदिनीनगर प्रखंड के चियांकी गाँव के 64 वर्षीय किसान सूरजमल सिंह ने कहा कि अभी तक सरकार की ओर से कोई सहयोग नहीं मिला है। सिंह ने करीब दो हेक्टेयर में धान और डेढ़ हेक्टेयर में मक्के की बुवाई की थी। उन्होंने कहा, "पूरा धान बर्बाद हो गया, मैं सिर्फ थोड़ी सी मक्के की कटाई कर पाया हूं।"

उनके परिवार में खाने वाले सात लोग हैं। उनका संबंध चेरो जनजाति से हैं जिसे अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया है। उन्होंने कहा, "मैंने बीज और खाद पर तकरीबन 10,000 रुपये खर्च किए थे। लेकिन सब चला गया। अब मेरे पास अगली गेहूं की फसल बोने का न तो साहस है और न ही कोई जरिया"

64 वर्षीय किसान ने कहा, "पिछले साल आलू बेचकर मैंने 40,000 रुपये कमाए थे, लेकिन इस साल जमीन इतनी सूखी है कि हम जमीन की जुताई तक नहीं कर पाए हैं।"

सुकरी गाँव के 43 वर्षीय किसान लाल बहादुर महतो दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं। लेकिन उन्हें आज लगातार चौथे दिन काम नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि उनके पास लगभग एक हेक्टेयर जमीन है जिस पर उन्होंने इस साल धान की खेती की थी। लेकिन फसल खराब हो गई। उन्हें इससे 11,000 रुपये का नुकसान हुआ है।

साहिबगंज जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के सीनियर साइंटिस्ट अमृत कुमार झा ने किसानों की अगले फसल चक्र में खेती न कर पाने की पुष्टि की।

उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया, "झारखंड में कुछ बारिश हुई थी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। इस साल कम मानसूनी बारिश रबी की फसल को प्रभावित करने वाली है। लेकिन इसका असर कितना होगा, अभी हम अभी यह नहीं कह सकते हैं।"

रबी की फसल अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर के महीनों में बोई जाती है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में 11 नवंबर तक सिर्फ 600 हेक्टेयर गेहूं की बुवाई हुई है, जबकि राज्य में आधिकारिक तौर पर 209,000 हेक्टेयर गेहूं का रकबा है।

फसल विविधीकरण और बीज वितरण

राज्य में संकटग्रस्त किसानों को राहत देने के लिए किए गए उपायों के बारे में पूछे जाने पर, पलामू के जिला कृषि अधिकारी दिनेश कुमार मांझी ने गाँव कनेक्शन को बताया कि प्रशासन फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है जिससे किसानों को फायदा मिल सकेगा।

अधिकारी ने कहा, "हम जानते हैं कि उन्हें नुकसान हुआ है। हम फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं और रियायती दरों पर बीज भी बांट कर रहे हैं। हम गेहूं, मटर, लाल दाल (मसूर दाल), और छोले (चना) के बीज 90 प्रतिशत की छूट पर दे रहे हैं, जबकि तोरी और सरसों के बीज मुफ्त में बांटे जा रहे हैं।"

लेकिन पलामू जिले के ग्रामीण इलाकों में कई किसानों ने बताया कि उन्हें बीज नहीं मिले हैं। किसान मजदूरी का काम ढूंढने और अपने परिवार का पेट पालने को लेकर खासा परेशान हैं।

उदाहरण के लिए देवंती के परिवार का गुजारा सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले राशन से चल रहा है। उन्हें हर महीने 10 किलोग्राम सब्सिडी वाला चावल मिलता है।

चार बच्चों की मां देवंती पहले अपने सुकरी गाँव से लगभग तीन किलोमीटर दूर एक पत्थर की चक्की में मजदूरी के लिए जाया करती थी। लेकिन खराब सेहत के चलते अब उसके लिए इतना शारीरिक श्रम कर पाना संभव नहीं है।


मुआवजे के रजिस्ट्रेशन में किसानों को हो रही परेशानी

सूखा मुआवजे के तौर पर मिल रही आर्थिक सहायता को पाने के लिए किसानों को झारखंड राज्य फसल राहत योजना (JRFRY) पोर्टल पर अपना नुकसान दर्ज करना पड़ता है। पोर्टल के अनुसार, अब तक 1,713,474 किसानों ने आवेदन किया है, जिनमें से 1,50,102 किसान पहले ही लाभान्वित हो चुके हैं।

हालांकि कई किसानों ने शिकायत की कि तकनीकी दिक्कतों के कारण वे पोर्टल पर पंजीकरण नहीं करा सके। सूत्रों ने गांव कनेक्शन को बताया कि मुआवजे के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया 15 अक्टूबर को बंद कर दी गई थी।

अपने मिट्टी के घर के बाहर एक ऊंचे चबूतरे पर बैठे सुकरी गाँव के 43 वर्षीय किसान लाल बहादुर महतो दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं। लेकिन उन्हें आज लगातार चौथे दिन काम नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि उनके पास लगभग एक हेक्टेयर जमीन है जिस पर उन्होंने इस साल धान की खेती की थी। लेकिन फसल खराब हो गई। उन्हें इससे 11,000 रुपये का नुकसान हुआ है।

महतो ने गाँव कनेक्शन को बताया, "मैंने सूखा राहत फॉर्म भरने के लिए प्रज्ञा केंद्र (गाँव में सामान्य सेवा केंद्र) पर गया था। लेकिन मेरा आवेदन खारिज कर दिया गया क्योंकि मेरे पास हाल की मालगुजारी रासीद (लैंड रेवेन्यू रसीद) नहीं थी।"

उन्होंने कहा, "मेरे पास 2016-2017 की भू-राजस्व रसीद है। मेरे गाँव में कई लोगों के पास नई भू-राजस्व रसीद नहीं है, इसलिए हम सूखा राहत के लिए आवेदन नहीं कर पाए हैं।"

पलामू के जिला सहकारिता अधिकारी अश्विनी कुमार ओझा ने गाँव कनेक्शन के साथ बातचीत में स्वीकार किया कि कई किसान मुआवजे से चूक गए हैं।

ओझा ने कहा, "देखिए अभी पोर्टल बंद है और कई किसान पंजीकरण नहीं करा पाए हैं। आगे क्या करना है, यह जानने के लिए हमें आगे के दिशा-निर्देशों का इंतजार करना होगा।"

भूमिहीन किसान सबसे ज्यादा प्रभावित

पलामू के चैनपुर प्रखंड के महुगवां गाँव के रहने वाले 35 साल के राजलाल भुइया के पास कोई जमीन नहीं है और वह हर साल बटिया (बंटाई पर खेती) पर जमीन लेते हैं। बंटाई पर जमीन लेने का मतलब आपसी बातचीत के आधार पर काश्तकार और जमींदार दोनों खर्च का आधा-आधा खर्च उठाते हैं और फसल का आधा- आधा हिस्सा बांट लेते हैं।

इस खरीफ सीजन में, भुइया ने आधा एकड़ जमीन पर धान की खेती की थी और उन्होंने बीज की खरीद में लगभग 5,000 रुपये खर्च किए थे।

उन्होंने कहा, "मैंने सब कुछ खो दिया, बीज अंकुरित भी नहीं हुए।"

अपनी बंटाई की जमीन को साबित करने के लिए किसी भी दस्तावेज के अभाव में, भुइया को नुकसान की भरपाई होने की बहुत कम उम्मीद है। उनके जैसे लाखों किसान भूमिहीन किसानों की कैटेगरी में आते हैं। इन्हें सूखा राहत योजना के दायरे में शामिल नहीं किया जाता है क्योंकि वे अपने नुकसान को साबित नहीं कर सकते।

महुगवां पंचायत की ग्राम प्रधान धनवंती देवी ने गाँव कनेक्शन को बताया, ''अगर जमीन का मालिक लिखित में देगा, तभी तो किसान को मुआवजा मिलेगा नहीं तो किस आधार पर उसे पैसा मिलेगा'' राजलाल भुइया और देवंती कुंवर जैसे सैकड़ों हजार किसानों के लिए आने वाला साल मुश्किल भरा है।

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