जलवायु प​रिवर्तन का लद्दाख की खेती पर पड़ता असर और ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ते लोग

लद्दाख के लगभग 90 फीसदी किसान सिंचाई के लिए बर्फ से पिघले पानी पर निर्भर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस इलाके में पानी की कमी की बड़ी वजह मूलत: जलवायु परिवर्तन या क्लाइमेट चेंज है। पिछले 4 दशकों में लद्दाख का औसत तापमान 3 डिग्री बढ़ चुका है।

जलवायु प​रिवर्तन का लद्दाख की खेती पर पड़ता असर और ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ते लोग

हृदयेश जोशी

लद्दाख की नुब्रा घाटी के हुंदर गांव के रहने वाले 65 साल के किसान टी नामग्याल लद्दाख में लगातार होती पानी की किल्लत के साक्षी हैं। वह कहते हैं, 'पिछले कुछ दशकों में बर्फबारी काफी हद तक कम हुई है और अब नदियों और झरनों में बहुत कम पानी बचा है।'

लद्दाख में अपने खेत में किसान टी नामग्याल

नामग्याल ने बताया, 'पहले इस इलाके में बहुत ज्यादा बर्फ गिरती थी। 20—30 साल पहले खारदुंगला दर्रा छह महीनों के लिए बंद हो जाया करता था। इसलिए अगर कोई कार यहां से लेह जाती तो वह वहीं फंस जाती थी। यहां की गाड़ियां वहां फंसकर रह जाती थीं और वहां की गाड़ियां यहां खड़ी हो जाती थीं।

पानी की समस्या का खेती पर दुष्प्रभाव केवल इसी क्षेत्र तक सीमित नहीं है। नामग्याल का कहना है कि इस क्षेत्र के सभी गांवों को एक ही समस्या से जूझना पड़ता है। खारदुंग गांव में जोकि हुंदर से लगभग सौ किलोमीटर दूर है 45 साल के नुरबू भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं। वह बताते हैं कि न केवल पानी की आपूर्ति कम हो गई बल्कि वह अब और भी कम दिनों के लिए उपलब्ध रहता है। मतलब, पानी भी कम और पानी मिलने वाले दिन भी कम।

अपने खेतों में खड़े नुरबू पहाड़ों की तरफ इशारा करके कहते हैं, 'आप वहां देख रहे हैं? पहले वे सभी पहाड़ बर्फ से ढंके रहते थे। पर अब वहां बर्फ नहीं है, सभी ग्लेशियर भी पिघल चुके हैं।' यह किसान उदास मन से कहता है, 'इन झरनों में भी पानी कम हो चुका है और ये अक्सर सूख जाते हैं। हमें डर है कि आने वाले दिनों में समस्या और बढ़ेगी।'

आंकड़े भी चिंताजनक हैं। 2013 से 2017 के बीच सालाना बारिश में 50 से 80 फीसदी की कमी आई है। 2016 में इतनी कम बारिश हुई कि रिकॉर्ड बन गया।

नुब्रा घाटी के पहाड़ अब सूखे और बंजर हो चुके हैं

लद्दाख एक सर्द रेगिस्तान है, यहां का सूखा वातावरण खेती को और मुश्किल बना देता है। लद्दाख के लगभग 90 फीसदी किसान सिंचाई के लिए बर्फ से पिघले पानी पर निर्भर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस इलाके में पानी की कमी की बड़ी वजह मूलत: जलवायु परिवर्तन या क्लाइमेट चेंज है। पिछले 4 दशकों में लद्दाख का औसत तापमान 3 डिग्री बढ़ चुका है। इससे इन ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ कम पड़ी है पर तेजी से पिघली है।

पश्चिमी हिमालय में ग्लेशियरों की चादर में लगभग 20 फीसदी की कमी आई है। कुछ ग्लेशियर तो लुप्त होने की कगार पर हैं। एक्सपर्ट कहते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से इतनी ऊंचाई पर बारिश का पैटर्न प्रभावित हुआ है।

नतीजा— नुरबू और नामग्याल जैसे किसानों की फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पिछले कुछ बरसों में कई फसलों का उत्पादन 30 से 50 फीसदी तक कम हुआ है। पानी न मिल पाने की वजह से आलू, जौ, शलजम, मूली और मटर की फसलों को नुकसान उठाना पड़ा है।

नुब्रा में दिसकिट गांव के पास रहने वाली औरतें बताती हैं अब जानवरों के लिए चारा तक उगाना मुश्किल हो गया है। 55 साल की अमीना कहती हैं, 'खेती बहुत कठिन हो गई है, पर हम लोग पशुपालन पर भी निर्भर हैं। लेकिन अब घास न तो पहले की तरह मोटी होती है और न ही उतनी ऊंची। इसने हमारी दिक्कतें और बढ़ा दी हैं।

लद्दाख के खेतों की एक झलक

दिल्ली स्थित द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट टेरी की डॉ. विभा धवन कहती हैं, 'यह समस्या अकेले लद्दाख की नहीं है। लेकिन लद्दाख जैसे ऊंचाई पर स्थित इलाके अपने भूगोल और शुष्क जलवायु की वजह से ज्यादा मुसीबतें उठा रहे हैं। दुनिया भर में और भारत में पानी की किल्लत बड़ी समस्याएं पैदा करने वाली है। हमारे पास ग्लेशियर हैं पर दुर्भाग्य से वे पिघल रहे हैं, अभी तो लगता है कि हमारे पास बहुत पानी है पर असल में पानी के स्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं।'

सूखे के खिलाफ पलटवार:

नीचे लेह में सिविल इंजीनियर और कृषि विशेषज्ञ छ्वांग नोरफैल कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर इस समस्या से जूझने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी तकनीक बहुत सरल है— सर्दियों में पानी के धारा की दिशा बदलकर उसकी गति को धीमा कर दिया जाए ताकि वह कम तापमान की वजह से जम जाए। इसके लिए नोरफैल ने एक अनोखा तरीका अपनाया है वह जल धारा के बहाव की दिशा में पत्थरों की मदद से छोटे—छोटे बंधे जैसे बना देते हैं जिसकी वजह से ढलान के साथ—साथ उथले गड्ढे बन जाते हैं। बर्फ के रूप में जल संरक्षण के इस मौलिक तरीके से कृत्रिम ग्लेशियरों का निर्माण होता है। वसंत के समय यह बर्फ पिघलने लगती है और खेतों की सिंचाइ के लिए पानी उपलब्ध हो जाता है। लद्दाख के अलग—अलग गांवों में बहुत से किसानों ने इस तरीके को अपनाया है।


ऐसे दिखते हैं कृत्रिम ग्लेशियर

अपनी इस तकनीक के बारे में नोरफैल बताते हैं, 'मेरी यह तकनीक बहुत सरल है। इसमें बस सर्दियों के दौरान पानी की धारा की गति को धीमा करना होता है। इससे खेती के लिए पानी तो मिल ही जाता है इसके अलावा भी कृत्रिम ग्लेशियर के कई फायदे हैं। यह भूजल के रीचार्ज का बहुत अच्छा साधन है, लद्दाख में भूजल भंडारों को रीचार्ज करना बहुत जरूरी है क्योंकि टूरिज्म बढ़ रहा है और लोग भी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए भूजल का इस्तेमाल करने लगे हैं।'

जल संरक्षण का एक और तरीका है जो लद्दाख की परंपरा में शामिल है। बहुत से घरों में शुष्क शौचालयों का इस्तेमाल किया जाता है इससे उनमें पानी का इस्तेमाल बहुत कम हो जाता है।

इसमें मानव अपशिष्ट को मिट्टी से ढंक दिया जाता है इससे इसे खाद बनने में मदद मिलती है, बाद में इसका इस्तेमाल खेतों में किया जाता है।

अपने घर पर नोरफैल हमें इसे समझाते हैं। वह एक छोटे कमरे में बना हुआ शुष्क शौचालय दिखाते हुए बताते हैं, 'इसे इस्तेमाल करने के बाद हम फावड़े से इस गड्ढे में इसके ऊपर मिट्टी डाल देते हैं। हर बार शौचालय के इस्तेमाल के बाद हम सभी ऐसा ही करते हैं और एक साल बाद हम यह टैंक खाली करके उसकी सफाई करते हैं। इसके बाद हम इसे एक और साल के लिए दूसरे गड्ढे में डाल देते हैं और इस तरह यह हमारे खेतों के लिए बढ़िया खाद बन जाती है। यह पूरी तरह से जैविक है और हम इस प्रक्रिया में पानी की भी बचत कर लेते हैं।

हालांकि, बहुत से लोगों का मानना है कि केवल व्यक्तिगत प्रयासों से यह समस्या नहीं सुलझने वाली। यहां राज्य और केंद्र सरकार की भूमिका बहुत अहम हो जाती है कि वह उचित नीतिगत उपायों को लागू करे और किसान जो प्रयास कर रहे हैं उनकी मदद के लिए संसाधन मुहैया कराए। तकनीकी में निवेश करना एक समझदारी भरा कदम हो सकता है, टपक सिंचाई जैसी सिंचार्इ् की सटीक पद्धतियां लद्दाख जैसे इलाके में पानी की काफी बचत कर सकती हैं।

शुष्क शौचालयों के इस्तेमाल से पानी की बहुत बचत हो जाती है

दूसरा पहलू:

ग्लोबल वॉर्मिंग का एक दूसरा पहलू भी है जिसे कुछ हद तक सकारात्मक कहा जा सकता है। अब लद्दाख में कुछ ऐसी फसलों और सब्जियों की भी खेती की जा सकती है जो पहले मुमकिन नहीं था। किसान आजकल यहां शिमला मिर्च, खीरे, गोभी, टमाटर, भिंडी और तरबूज तक उगा रहे हैं। हुंदर गांव के नामग्याल ठहाका लगाकर हंसते हैं और कहते हैं, 'तामपान में वृद्धि की वजह से यह संभव हुआ है। इससे पहले तो आप यह सब यहां उगाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।'

नुब्रा घाटी और लद्दाख के दूसरे इलाके के कई किसानों का भी यही मानना है। 44 साल के गुलाम कादिर कहते हैं,'पहले हमारे पास आलू, शलजम, मटर, मूली और कुछ और सब्जियां उगाने का सीमित विकल्प था। पर अब स्थिति बदल चुकी है।'

लेह में अपने बाग में तमाम फल और सब्जियां उगाने वाले छ्वांग नोरफैल कहते हैं, 'मौसम में बदलाव के बहुत से नुकसान हैं लेकिन एक अच्छी बात यह भी है कि हम यहां 40 से 50 तरह की सब्जियां और फल उगा सकते हैं। आपको पता है कि पहले फलों के पेड़ केवल लेह में ही उग सकते थे। पर अब हम लेह से 70 किलोमीटर उपर ये फल यहां भी उगा सकते हैं।'

तब इन ऊंचाई पर स्थित इलाकों के लिए ग्लोबल वॉर्मिंग अच्छी चीज है या बुरी खबर है?

कृत्रिम ग्ले​शियर बनाने वाले नोरफैल अपने बगीचे में

जानकारों का कहना है कि केवल तापमान में बढ़ोतरी की वजह से ही यह सकारात्मक बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है। इसके पीछे एक दूसरी वजह भी है। वैज्ञानिक नए किस्म के बीच विकसित कर रहे हैं, ऐसे बीज जो नए वातावरण में भी उग सकें। वैज्ञानिक और शोधकर्ता गेहूं की ऐसी प्रजाति विकसित कर रहे हैं जो गर्मी में भी उग सकती है। विभिन्न रिसर्च सेंटर ऐसी फसलें तैयार कर रहे हैं जो जलवायु परिवर्तन का सामना करने में सक्षम हों साथ ही ऐसी तकनीक भी विकसित की जा रही हैं जिनसे कम से कम पानी का खर्चा हो।

डॉ. धवन कहती हैं, 'जलवायु परिवर्तन का हर जगह एक ही जैसा असर नहीं होगा। भारत एक विशाल देश हैं जहां अलग—अलग कृषि—जलवायु क्षेत्र हैं। इसलिए किसी जगह पर इसका फायदा होगा और किसी जगह पर नुकसान। पर समग्रता में देखा जाए तो भारत को इससे नुकसान ही है।'

(ये रिपोर्ट पहली बार इंडिया क्लाइमेट डायलॉग में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई)

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