तो क्या चुनावी मुद्दा और राजनीति का केंद्र बनेंगे किसान ?

पूरे देश में संपूर्ण कर्ज़माफी, लागत का डेढ़ गुना मूल्य, सब्जी-फल की एमएसपी और बुजुर्ग किसानों को पेंशन देने की मांग को लेकर 130 किसान संगठन ने मिलकर किया गांव बंद।

तो क्या चुनावी मुद्दा और राजनीति का केंद्र बनेंगे किसान ?फोटो: प्रभु बी डॉस/ क्रिएटिव कॉमन

लखनऊ। किसानों का सब्र टूट गया है, सरकार की नीतियों के विरोध में कई राज्यों में किसान हड़ताल पर चले गए हैं। किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने, पूरे देश के किसानों का पूरा कर्ज़ा माफ करने और किसानों को पेंशन देने की मांग रह रहे हैं। अपनी-अपनी मांगों को लेकर पूरे देश में 300 से ज्यादा संगठनों ने अपने-अपने तरीकों से मोर्चा खोल रखा है।

एक जून से 10 जून तक 'गाँव बंद' के दौरान किसानों संगठनों ने राष्ट्रीय किसान संघ की अगुवाई में अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए हड़ताल करते हुए शहरों को दूध, सब्जी और अनाज की सप्लाई रोक दी है। लाभकारी मूल्य समेत कई मांगों को लेकर पिछले वर्ष भी मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से आंदोलन शुरु हुआ था। मंदसौर में पुलिस की गोली से 6 किसानों की मौत के बाद विवाद बढ़ गया था। मंदसौर कांड के बाद बनी अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति से जुड़े 193 किसान संगठनों के साथ देशभर के किसान मांगों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में हैं। समिति ने 6 जून को पूरे देश में किसान स्मृति दिवस मनाने का ऐलान किया है।

लेकिन सरकार की मुसीबत राष्ट्रीय किसान संघ की अगुवाई में भारतीय किसान यूनियन, आम किसान यूनियन, किसान मजदूर संघ समेत 130 संगठनों ने मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब समेत 7 राज्यों में हड़ताल कर रखी है। मंदसौर कांड और किसानों के मुद्दे पर सियासत भी तेज हो गई है। मंदसौर कांड की बरसी के दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी मंदसौर में कांग्रेस की रैली कर रहे हैं। तो शिवराज सिंह चौहान और उनके मंत्री लगातार किसानों के बीच पहुंच रहे हैं। आंदोलन का सबसे ज्यादा असर, मध्य प्रदेश और पंजाब और हरियाणा में हो सकता है। आंदोलन से लोगों को दिक्कत न हो और जरुरी चीजों की कमी न होने पाए इसके लिए सरकारों ने पूरी तैयारी की बात की है। मध्य प्रदेश में सैकड़ों किसानों आंदोलन में शामिल न होने के बांड भरवाए गए हैं, दूध की आपूर्ति रोकन पर एस्मा तक की धमकी दी है। कई राज्यों में पुलिस की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं।

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आंदोलन के पहले दिन राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा ने कहा "हमारे साथ 130 से ज्यादा किसान संगठन हैं। यह अब देशव्यापी आंदोलन बन गया है। हमने इसे गाँव बंद का नाम दिया है। किसानों ने देशव्यापी आंदोलन के तहत एक से दस जून तक शहरों में सामान न बेचने का ऐलान किया है।हम शहरों तक नहीं जाएंगे क्योंकि हम लोगों के सामान्य जीवन को प्रभावित नहीं करना चाहते हैं। लेकिन सरकार किसान संगठनों से बात न करके भ्रम फैला रही है।"वहीं पंजाब के फरीदकोट में आंदोलन के पहले दिन किसानों ने अपनी सब्जियां, फल और दूध को सड़क पर फेंक दिया है, जबकि किसानों का कहना था वे शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन करेंगे। सब्जियों और दूध को गरीब लोगों में बांट देंगे। कुछ लोगों ने सब्जियों और दूध को सड़क पर फेंके जाने की निंदा की है। दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन ने किसान आंदोलन के मद्देनजर ग्रामीण इलाकों से शहरी क्षेत्रों में आने वाले दूध विक्रेताओं, सब्जी विक्रेताओं पर खास नजर रखी है। जगह-जगह पुलिस बल की तैनाती की गई है। अर्ध सैनिक बलों की कंपनियां भी सुरक्षा के लिए बुलाई गई हैं। किसानों के इतनी लंबी हड़ताल की वजह से लोगों की मुश्‍किलें बढ़ सकती हैं।



वहीं, गांव बंद में एमपी के प्रमुख संगठन ' आम किसान यूनियन' के प्रमुख केदार सिरोही का कहना है, "किसान एकजुट हैं, वे अपना विरोध जारी रखे हुए हैं। 'गाँव बंद' आंदोलन का असर साफ नजर आ रहा है। सरकार की हर संभव कोशिश है, इस आंदोलन को असफल करने की, लेकिन किसान किसी भी सूरत में सरकार के आगे झुकने को तैयार नहीं है।" एमपी के हौसंगाबाद के रहने वाले युवा किसान तालिब ने फोन पर गाँव कनेक्शन को बताया, "किसान शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं। जब तक सरकार हमारी मांगें नहीं मान लेती हम 10 दिनों तक गाँव बंद आंदोलन जारी रखेंगे। हम अपनी सब्जियों, दूध और फलों को शहर की मंडियों में नहीं ले जाएंगे।" केदार सिरोही आगे कहते हैं," सरकार किसानों को डराना चाहती है, लेकिन वो ये नहीं समझ रही कि जिनता डराओगे डर उतना ही खत्म हो जाएगा। सरकार चाहे लाठी खरीदे या तोप। दूसरी बात लोकतांत्रिक देश में किसान को इतना तो अधिकार है कि वो अपना सामान कहां बेचे, जब किसान शहर जाएंगे ही नहीं तो कार्रवाई किस पर होगी। सरकार ने पुलिस, कृषि और राजस्व विभाग, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों तक को आंदोलन के खिलाफ लगा दिया है, लेकिन किसानों की आवाज अब थमेगी नहीं।"

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कृषि अर्थशास्‍त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक, "80 फीसदी किसान बैंक लोन न चुका पाने की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं। सरकार किसानों की कर्ज माफी के लिए जो बजट देती है, उसका ज्‍यादातर हिस्‍सा कृषि कारोबार से जुड़े व्‍यापारियों को मिलता है, न कि किसानों को। सरकार किसानों के अच्छे दिन की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ देखने को नहीं मिल रहा है। यह पहली बार नहीं है जब किसान आंदोलन कर रहे हैं।" इसी बीच बीते साल छह जून मंदसौर कांड के बाद बनी किसान संघर्ष समन्वय समिति ने भी 6 जून को पूरे देश में किसान स्मृति दिवस मनाने का ऐलान किया है। किसान संघर्ष समिति समेत 193 किसान संगठनों ने किसानों की संपूर्ण कर्जा मुक्ति और लाभकारी मूल्य की गारंटी के मुद्दे को लेकर बीते साल मंदसौर (ग्राम बूढ़ा) किसान मुक्ति यात्रा शुरू की थी। शहीदों की स्मृति में भोपाल में 4 जून को मशाल जुलूस निकाला जाएगा, और 5 जून की शाम को मंदसौर के ग्राम बूढ़ा में आमसभा होगी, जबकि 6 जून को मल्हारगढ़ तहसील के चिल्लोद पिपलिया ग्राम में शहीद किसान कन्हैया लाल पाटीदार की मूर्ति के समक्ष दिनभर का सामूहिक उपवास एवं श्रद्धांजलि कार्यक्रम किया जाएगा, जिसमें अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के सभी प्रमुख नेतागण भाग लेंगे।



समिति के संयोजक डॉ. वीएस सिंह बताते हैं, "हम लोगों ने राष्ट्रपति से मिलकर किसानों के दो बिलों को पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी। अगर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दिसंबर 2003 को गन्ना किसानों के संकट और मंदरवा (बस्ती जिले में) 3 किसानों की मौत को लेकर दिसंबर 2003 में संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है, और जीएसटी के लिए मध्य रात्रि में सत्र बुलाया जा सकता है, तब कृषि संकट से निपटने, किसानों की आत्महत्या पर अंकुश लगाने के लिए संसद का विशेष सत्र क्यों नहीं बुलाया जा सकता?" उन्होंने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति समिति द्वारा उठाये गये मुद्दों का समर्थन करेंगे। हम अपनी पूरी ताकत लगाकर दोनों बिलों को लेकर राष्ट्रव्यापी मुहिम छेड़ेंगे। जब ये बिल संसद में चर्चा के लिए लाए जाएंगे दोनों सदनों में 21 राजनैतिक दलों के द्वारा अवश्य समर्थन किया जाएगा। इस समिति में वी.एम. सिंह, राजू शेट्टी, हन्नान मौला, अतुल अंजान, प्रेम सिंह गहलावत, जगमोहन सिंह, योगेंद्र यादव, अविक साहा और डॉ. सुनीलम शामिल हैं।

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इमरजेंसी नंबर किया जारी, मिलेगा दूध और फल

राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के प्रवक्ता भगवान दास मीना से गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, "गाँव बंद आंदोलन देश के कई राज्यों में चल रहा है। सरकार से हमारी मांग की है कि वे हमारी मांगों को मान ले नहीं तो हमारा दस दिन तक आंदोलन चलता रहेगा। इस दौरान किसान अपने दूध, फल और सब्जियों को मंडी तक नहीं ले जाएगा। दूध खराब न हो इसलिए किसान दूध का घी बना रहे हैं।" उन्होंने कहा, "इसके साथ ही हम लोगों ने एक इमरजेंसी नंबर जारी किया है, जिस पर जरुरतमंद लोग फोन करके दूध, सब्जियां और फल ले सकते हैं। खासकर मरीजों और बच्चों का ध्यान रखा जाएगा। किसी को तकलीफ न हो इसका पूरा ध्यान है। हम लोगों को आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से होगा।"


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किसानों से भरवाए गए बांड

करीब 55 हजार गाँव वाले मध्य प्रदेश में गाँव बंद को लेकर सियासत गर्माई हुई है। सरकार ने पुलिस कर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दी हैं तो सैकड़ों किसानों से 20-20 हजार रुपए के बांड भरवाए गए हैं कि वो गाँव बंद के दौरान शामिल नहीं होंगे। इसके साथ ही पुलिस विभाग में हजारों लाठियां मंगवाने और दूध न देने पर ऐस्मा लगाने की बात भी सुर्खियों में है। किसान संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।

किसानों की मांगें जायज

सरकार किसानों की बात न करके आंदोलन को लेकर भ्रम फैलाने में लगी है। सवाल यह नहीं है कि यह आंदोलन किसका है, सवाल यह है कि किसानों की मांगें तो जायज हैं। सरकार को किसानों की मांगों को मानना चाहिए।

शिवकुमार शर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ

कारोबारी किसान की अहमियत

इन 10 दिनों में न तो किसान गाँव से कुछ बाहर भेजेंगे, न ही बाजार से खुद खरीदेंगे। गाँव बंद स्वावलंबन को बढ़ावा देगा और गाँव का बाजार विकसित होगा। अभी तक बड़ी कंपनियां गाँव के अरबों रुपए के बाजार को तवज्जो नहीं देती हैं, लेकिन इस बंद से वो भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समझ जाएंगे। कारोबारी किसान की अहमियत समझेंगे।

- केदार सिरोही, प्रमुख, आम किसान यूनियन

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