किसान आंदोलन के 100 दिन: गर्मी से निपटने के लिए ट्रालियां बनीं झोपड़ी, खुद की कराई बोरिंग, कचरा ग्राउंड पर बनी किसान हवेली

दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों के धरने के 100 दिन हो गए हैं। कई राज्यों के किसान 26 नवंबर से अपने ट्रैक्टर-ट्राली और राशन के साथ यहां डेरा डाले हैं। किसानों के मुताबिक वो खुले आसमान के नीचे सर्दियां काटने के बाद गर्मियां झेलकर भी लंबी लड़ाई को तैयार है, देखिए क्या हैं उनकी तैयारियां

shivangi saxenashivangi saxena   6 March 2021 7:34 AM GMT

किसान आंदोलन के 100 दिन: गर्मी से निपटने के लिए ट्रालियां बनीं झोपड़ी, खुद की कराई बोरिंग, कचरा ग्राउंड पर बनी किसान हवेलीगर्मियों से निपटने के लिए दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर बैठे किसानों ने कुछ ऐसे तैयारियां की हैं। सभी फोटो- शिवांगी सक्सेना

नई दिल्ली। कड़ाके की सर्दी और ठंड में बारिश झेलने के बाद आंदोलनकारी किसान अब गर्मियों को भी झेलने को तैयार हैं। कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर किसान 100 दिन से धरने पर बैठे हैं।

दिल्ली एनसीआर में सर्दी और गर्मी दोनों ज्यादा होती हैं ऐसे में सड़क पर तंबू, तिरपाल और प्लास्टिक की पन्नियों के टेंट में बैठे किसानों ने अपने लिए इंतजाम करना शुरु कर दिए हैं। प्लास्टिक की सीट को हटाकर वहां बांस और पूस के छप्पर बनाए जा रहे हैं। जिन ट्रालियों पर मोटे तिरपाल और प्लास्टिक लगी थी उन्हें भी हाटकर झोपड़ी जैसा बनाया जा रहा है, ताकि गर्मी के दौरान अंदर रहा जा सके। गर्मियों में तारकोल की सड़क तपने लगती है, ऐसे में टिकरी बॉर्डर पर मंच के सामने फोम के सैकड़ों गद्दे लगाए गए हैं। गाजीपुर बॉर्डर, सिंधु और शाहजहांपुर बॉर्डर पर भी किसान टेंट मजबूत करने के साथ ही उनमें छोटे-छोटे पंखे, कूलर ला रहे हैं।

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गर्मी से बचने के लिए टिकरी बॉर्डर पर इस तरह से बांस की झोपड़ियां बनाई जा रही है। फोटो- शिवांगी सक्सेना

कुलदीप सिंह (24 वर्ष ) अपने 30 अन्य साथियों के साथ पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब से टिकरी बॉर्डर पहुंचे हैं और ट्रालियों को बांस की झोपड़ियों मे तब्दील कर रहे हैं। कुलदीप बताते हैं कि वो इस ट्राली को एक कमरे की झोपड़ी मे बदल देंगे। "हम ट्राली को बांस और लकड़ी की बल्लियों से ढक देंगे। इस से धूप अंदर नहीं जाएगी और कमरा ठंडा रहेगा। इस ट्राली के अंदर फ्रिज, कूलर या पंखा और इन्वर्टर रहेगा," कुलदीप बताते है।

कुलदीप और उनके साथी इस तरह की पांच-छः ट्रॉलियां तैयार कर रहे हैं। इस तरह की ट्राली को बनाने में करीब 20 हजार रुपए तक का खर्च और दो दिन लग जाते हैं। इस पैसे के लिए किसानों ने गांव और शहरों में जाकर चंदा जमा किया है। गाजीपुर बॉर्डर पर बैठे कई किसानों के लिए उनके गांवों से लोगों ने चंदे लगाकर कूलर भिजवाए हैं।

टिकरी बॉर्डर पर पानी की सप्लाई के लिए बोरवैल किया गया है। किसानों ने बॉर्डर पर लगे खम्बों से बिजली ली है। गर्मी से बचने के लिए फ्रिज और एसी लगा दिया गया है। कुलवीर मनिया (30 वर्ष ) संगरूर जिले के मानिया गाँव के रहने वाले हैं और गाँव मे कनक (गेहूं), धान की खेती करते हैं। एक हफ्ते पहले वो अपने साथ एक ट्राली ले आए हैं जिसमे एसी Air Conditioner लगा हुआ है। वो बताते हैं कि ऐसी और भी ट्रॉलियां तैयार होकर उनके गाँव से टिकरी बॉर्डर के लिए रवाना हो गई हैं। इसके आगे कुलवीर अपना प्लान भी बताते हैं, "हम इस क्षेत्र को टेंट लगाकर ढक देंगे और पिलर पर एसी लगाएंगे ताकि ठंडी हवा बाहर न जाए और बुज़ुर्गों के लिए गर्मियों मे परेशानी न हों। "

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दिल्ली की सीमाओं पर गर्मी से निपटने के लिए कुछ किसानों ने अपनी ट्रालियों में एसी लगवाई हैं। एसी और कूलर का इंतजाम चंदा लगाकर किया जा रहा है। फोटो- शिवांगी सक्सेना

टिकरी बॉर्डर पर ज्यादातर किसान दिल्ली-रोहतक हाईवे पर बनी मेट्रो रेल लाइन की नीचे और पिलर पर अपने टेंट लगाए हुए हैं ऐसे में बहुत सारे किसानों को थोड़ी गाजीपुर और सिंधु की तरह सीधे सूरज का सामना कम करना पड़ता है।

टिकरी बॉर्डर पर जगह-जगह बाउंड्री बनाकर गार्डन का निर्माण किया गया है। इन गार्डन मे तरह-तरह के पौधे लगाए गए हैं और बैठने का स्थान है। टिकरी बॉर्डर पर तैयार की जा रही 'किसान हवेली' सबके आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस हवेली को उस जगह बनाया जा रहा है जहाँ पहले कूड़ा फेकने का मैदान हुआ करता था। इसका निर्माण घोलिया, मोगा से आए गुरसेवक सिंह (40 वर्ष ) कर रहे हैं। मैदान में 15 -20 टेंट लगे हैं। इन टेंट को ज़मीन से चार इंच की ऊंचाई पर बनाया गया है ताकि इनमे पानी न घुस पाए। इसे एक गाँव की तरह लुक दिया गया है। टेंट के अलावा एक छोटा सा गार्डन और ट्रैक्टर के लिए पार्किंग बनाई गई है। तरह- तरह के पौधों से इसे सजाया गया है। छोटे पत्थरों से रोड बनाई गई है। इसका मकसद है कि अगर ज़मीन गीली हो जाती है या पानी भर जाता है तो किसान पत्थर से बनी इस रोड पर चलकर टेंट तक पहुँच सकते हैं।

दिल्ली-हरियाणा के टिकरी बॉर्डर पर कचरा ग्राउंड को समतल कर किसानों ने किसान हवेली बना दी है। यहां टेंट और सुंदर बगीची (गार्डन) भी लगाया जा रहा है। फोटो शिवांगी

गाँव कनेक्शन से हुई बातचीत में इसके करताधर्ता गुरसेवक बताते हैं, "इस तरह का कुछ बनाना कभी तय नहीं था। समय के साथ ज़रूरतें बदल जाती हैं। दिसंबर मे जब हम यहाँ आये थे तब पिण्ड के लोगों के लिए टेंट लगाए थे। फिर लंगर सेवा शुरू की। ऐसे ही करते करते कूड़े से भरा मैदान साफ़ करने की सोची और फिर 'किसान हवेली' जैसा कुछ तैयार करने का ख्याल आया। इसके लिए कोई आर्किटेक्ट को नहीं बुलाया गया है। किसानों ने अपने दिमाग और मेहनत से इसे बनाया है। "

वो आगे बताते हैं कि वो इसे शौक के लिए नहीं बना रहे, "हम कम से कम पैसों मे इसका निर्माण कर रहे हैं। हमारे पास जितना पैसा है उसको बचाकर चलना है। ये हम अपने शौक के लिए नहीं बना रहे। हमारी मजबूरी है," इसी मैदान मे गुरुसेवक और उनके साथी गुरसंत सिंह, गुरशरण सिंह और गुरबिंदर सिंह एक स्टोरेज टैंक का निर्माण भी कर रहे हैं जिसका मक़सद पानी बचाना है। "इस स्टोरेज टैंक मे पानी का इस्तेमाल पौधों को पानी देने आदि कामों के लिए किया जाएगा। पानी कम है और हम पानी को बचाकर चलेंगे। "

पंजाब में मानसा के रहने वाले हरविंदर सिंह (38 ) 27 नवंबर से आंदोलन मे शामिल हैं। गर्मियों से बचने के लिए उन्होंने टेंट लगा लिया है। इस टेंट के अंदर छत पर पंखा लटका दिया है और गद्दे बिछा दिए हैं। बाहर फ्रिज रखा है जिसके अंदर दूध से भरा लोटा और पानी की बोतलें रखीं हैं। टेंट के आगे कुछ जगह बढ़ाकर बरामदा जैसा बनाया गया है।

बॉर्डर पर अभी कई लोगों के पास एसी, कूलर और फ्रिज नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने अपने-अपने रहने के स्थानों को टिनशेड और तिरपाल से ढक लिया है। कुछ लोगों ने लकड़ी की बल्लियों से झोपड़ियां तैयार करी हैं। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी बाँटी जा रही है। किसान अपने साथ मच्छर मारने की इलेक्ट्रिक मशीनें और क्रीम लेकर आए हैं।

गर्मी और लू से बचने के लिए केवल रहन-सहन ही नहीं बल्कि खान-पान में भी बदलाव किये जा रहे हैं। सुमित बडक 21 साल के हैं और रक्षा सेवाओं में प्रवेश के लिए परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। वह हाल ही में हरियाणा के रोहतक जिले के गुरौठी गांव से 20 दोस्तों के साथ प्रदर्शनकारियों को गन्ने का रस पिलाने के लिए पहुंचे। "हम रोहतक से तीन मशीनें लाए हैं। गर्मी का मौसम चल रहा है और हर दिन तापमान बढ़ रहा है। हम सभी किसानों को ताज़ा तैयार किया ठंडा रस पिलाएंगे," सुमित ने कहा। धरना स्थलों पर इसके अलावा शेक, ठंडा दूध और छांछ भी बांटी जा रही है।

पानी बचाने के लिए खोदे गए गड्डे।

गाजीपुर बॉर्डर पर ज्यादातर किसान पश्चिमी यूपी के हैं, वहां पर भारतीय किसान यूनियन ने बाकायदा एक कोल्हू लगा दिया है। राकेश टिकैत ने इसकी शुरुआत करते हुए कहा था कि किसान गन्ने का रस पीएंगे और लड़ाई लड़ेंगे।

किसानों का कहना है कि उन्होंने गर्मियों के लिए सभी तैयारियां कर ली हैं। धीरे- धीरे कर गाँव से कूलर, फ्रिज और अन्य आवश्यक सामान आना शुरू हो जाएगा। जब तक ये सरकार पारित तीन कृषि कानून वापस नहीं ले लेती किसान बॉर्डर खाली नहीं करेंगे। किसानों और सरकार के बीच अब तक 11 दौर की वार्ता हो चुकी है। लेकिन किसी मे भी कोई ठोस नतीजा निकलकर सामने नहीं आया है। जहाँ एक तरफ किसान चाहते हैं कि सरकार कानून रद्द करे वहीं सरकार ने बातचीत के जरिए संसोधन की बात करती है। किसान और सरकार के बीच आखिरी वार्ता 22 जनवरी को हुई थी। 26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड में हिंसा और विवाद के बीच दोबारा वार्ता आगे नहीं हुई। सरकार ने किसानों को डेढ साल तक कानून स्थगित रखने का प्रस्ताव किया था लेकिन किसानों ने साफ किया था कि उनकी लड़ाई तीनों कृषि कानूनों की वापसी की है।

यूपी में अमरोहा जिले के किसान गौरव चहल गाजीपुर बॉर्डर पर धरने पर हैं, उनके गांव के लोगों ने चंदा लगातार अपने साथियों के लिए कूलर का इंतजाम किया है। फोटो- अमित पांडेय।

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