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दिल्ली तक पहुंचा देश भर के किसानों का गुस्सा

दिल्ली तक पहुंचा देश भर के किसानों का गुस्साआत्महत्या कर चुके किसानों के परिजन उनकी तस्वीरें लेकर पहुंचे । (सभी फोटो- अभिषेक वर्मा)

गांव कनेक्शन टीम

नई दिल्ली। दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में सर्दी दस्तक दे चुकी है, लेकिन सोमवार को संसद भवन के बाहर का माहौल काफी गर्म था। शीतकालीन सत्र शुरू होने में कुछ समय बाकी है लेकिन संसद मार्ग पर महिलाओं ने अपनी संसद चलाई, जिसमें भारतभर की महिला किसान शामिल हुईं। संपूर्ण कर्जमाफी और फसल का डेढ़ गुना मूल्य इनकी मुख्य मांगे रहीं।

संसद मार्ग पर खुले आसमान के नीचे शुरू हुई इस संसद में सिर्फ महिलाएं बोलीं। सदन की शुरुआत करते हुए महाराष्ट्र में बीड़ जिले की रहने वाली पूजा मोरे (24 वर्ष) ने कहा, ये सरकार बदलने नहीं व्यवस्था बदलने की लड़ाई है। दिल्ली में बैठी सरकार हमारी नहीं पाकिस्तान की सरकार लगती है। क्योंकि हमारे नासिक में प्याज को खरीदार नहीं मिल रहे और सरकार पाकिस्तान से प्याज महंगा रही है। मेरी पंचायत मे करीब 150 विधवा महिलाएं हैं जिनके पति किसान थे और जान दे चुके हैं, महाराष्ट्र में ऐसी महिलाओं की संख्या 50 हजार होगी।”

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“किसान की मौत के बाद पूरा परिवार रोता, पत्नी और उसके बच्चे। लेकिन हम नहीं चाहते आगे भी ये महिलाएं आए, इसलिए हमारी जैसी हजारों महिलाएं सड़क पर उतरी हैं ताकि वो अपनी लड़ाई लड़ सकें। किसान पिता और भाई के लिए लाभकारी मूल्य ले सकें, कर्ज से मुक्त पा पाएं।’ पूजा आगे कहती हैं।

इस सदन की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर ने कहा, “आज जो महिलाएं आईं हैं, वे भाषा से अलग हैं, कपड़े और पहनावा अलग है, झंड़े अलग-अलग रंग के हैं लेकिन उनका दर्द एक जैसा है। इसलिए सब बिना भाषा के ये भाव समझ रहे हैं, जो आगे की लड़ाई में हमें संबल देंगे।”

तेंलगाना की कविता के पति कपास की खेती करते थे, कर्जा इतना बढ़ गया उन्होंने मौत को गले लगा लिया। कविता की बातों को अनुवादित करते हुए मेधा पाटेकर की सहयोगी ने बताया, “इनके (कविता) के पति पर काफी कर्ज हो गया था, साहूकार और बैंक दोनों दवाब बना रहे थे, एक दिन उन्होंने खेत में खोदे गए गड्ढ़े में कूदकर जान दे दी।’

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संसद भवन पर पहुंची ज्यादातर महिलाओं के हाथ में कुछ तस्वीरें थी, जिनके नीचे उनका नाम और मौत की तिथि लिखी थी। भाषाई तौर पर यहां भी मराठी, कन्नड़ और तेलगू थी, लेकिन उनके चेहरे के भाव शून्य थे। कुछ महिलाओं ने बताया उनके पति और बेटे ने कब जान दी तो कईयों ने बस इशारे से कहा, उन्होंने जिसकी तस्वीर हाथ में ले रखी है, अब वो दुनिया में नहीं हैं।

मेधा पाटकर।

किसान मुक्ति संसद का आयोजन करने वाली अखिल भारतीय किसान आंदोलन समन्यवय समिति से समन्यक और मध्यप्रदेश के बड़े किसान नेता डॉ. सुनीलम ने कहा, आज लगभग हर पार्टी किसान विरोधी, उसकी नीतियों में कहीं किसान नहीं है। आज की भीड़ हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा है। इस संसद में जो दो बिल पास होने हैं- संपूर्ण कंर्ज मुक्ति और दूसरा फसलों का डेढ़ गुना लाभकारी दाम। हम इन्हें लेकर जनता के बीच जाएंगे, नेताओँ और पार्टियों पर दवाब बनाएंगे, क्योंकि हमारा देश संसदीय व्यवस्था पर चलता है तो हम उसी व्यवस्थआ में जाकर ये दो कानून बनवाएंगे।’

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डॉ. सुनीलम जब गांव कनेक्शन से खास बात कर रहे थे। इंडिया गेट की तरफ बने मंच पर बने विशाल मंच के नीचे कर्नाटक के संथूर की रहने वाली पार्वती अपनी टूटी-फूटी हिंदी में अपनी समस्याएं गिना रही थीं। मक्का, चना और प्याज की खेती करने वाली इस महिला ने कहा, सरकार ने वादा किया था कि वो स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।’

आल इंडिया किसान सभा के कार्यकर्ता भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ''दो बिल यंहा पास हुए उसके लिए बाधइ लेकिन अब हमें अपने लिए और सर्कार दोनों के लिए टाइम तय करना होगा, ताकि तय टाइम में ये पूरा हो। किसान अब बंटने न पाएं।''

किसान संघ के कार्यकर्ता राजा राम सिंह ने बताया, ''ये आन्दोलन साढ़े तीन लाख किसानों की आत्म्हत्या का आक्रोश है, कल तक कारपोरेट पीछे से सर्कार चालते थे अब वो फाँट फूट पर हैं, बहु रस्त्यीय कपनिया हावी हो रही हैं, और प्रधान सेवक सिर्फ बैठे-बैठे देख रहे हैं, सर्कार pdS सिस्टम ख़त्म करना चाहती है, मतलब अब किसानों के अनाज ख़रीदा ही नही जायेगा, ये होने नहीं देंगे।''

कोल्हापुर के किसान शिवा जी जोड़े ने बताया कि हमें भाव नही मिल रहे पूरे देश में सबसे कम गन्ने का रेट हमें दिया जा रहा, प्रदेश सरकार ने उन किसानों का कर्ज माफ किया जो इंटरेस्ट तक नही देते थे और हम लोग जो देते रहते थे उन्हें लाभ नही मिला, मेरे पर साढ़े तीन लाख का कर्जा है क्या करूँ ?

किसान नेता आसीष मित्तल कहते हैं कि ये किसान के दुर्भाग्य है की 3 रुपए किलो टमाटर हमसे ख़रीदा जाता है और टॉमैटो कैचप 86 रूपये में बेचा जाता है, ये मुनाफा दुसरे और लोग खा रहे हैं हमें यही बिचौलिये ख़त्म करने हैं।

महिला किसान संसद में करीब 454 महिला किसानों ने भाग लिया, जिसमें से ज्यादातर के घरों में कोई न कोई हादसा हुआ है। मेधा पाटेकर ने अपने संबोधन में कहा कि ज्यादातर विधानसभाओं और संसद में 33 फीसदी ही आरक्षण है लेकिन इस संसद में 100 फीसदी महिलाएं हैं। क्योंकि महिलाएं खेती और पशुपालन में सीधे तौर पर जुड़ी हैं इसलिए इनका दर्द सबके सामने आना जरूरी था। ये आंदोलन कल भी जारी रहेगा। सभी किसान रामलीला मैदान और लक्षमण मेला मैदान में रुकेंगे।

2 अक्टूबर 1989 के बाद भारत में किसानों के इतिहास में पहले बार ऐसा बड़ा मंच सजा था। राज्यसभा टीवी के वरिष्ट पत्रकार और किसानों के मुद्दे पर देशभर का भ्रमण करने वाले अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, “2 अक्टूबर को बोट क्लब पर महेंद्र सिंह टिकैत के आह्वान पर ऐसी भीड़ नजर आई थी। ये किसानों के अच्छी बात है कि उनकी आवाज इस तरह लोग मिलकर उठा रहे हैं, अगर इन संगठनों में एक जुटता कायम रही तो आने वाले दिनों में सरकारों को इनकी बातें मानने पर मजबूर होना पड़ेगा।”

एक दिन की इस किसान मुक्ति संसद में देशभर के 185 किसान संगठन शामिल हुए हैं। संगठन के समन्यवक और किसान नेता बीएम सिंह ने कहा, “ आज से पहले किसान हमेशा बंटा नजर आता था, हर प्रदेश के मुद्दे और समस्याएं अलग थी। मध्यप्रदेश में मंदसौर गोलीकांड के बाद हम लोग 22 राज्यों में गए, 10 हजार किलोमीटर का सफर किया, अलग-अलग संगठनों से बात करने के बाद ये तय हो गया था कि हर राज्य का किसान परेशान है, किसी को उसकी लागत का मूल्य नहीं मिल रहा, इसलिए ये दो मुद्द उठाए गए। अब हम उसी के साथ जाएंगे वर्ना आने वाले दिनों में सरकारों के इसके नतीजे भुगतने होंगे।

बीएम सिंह की तरह डॉ, सुनीलम आगे की लड़ाई का खाका रखते हैं, “देखिए कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। 2019 में लोकसभा चुनाव होंगे, किसान इन नेताओं को अपने गांवों में घुसने नहीं देंगे।” किसानों के मुद्दे पर एनडीए का साथ छोड़ने वाले महारष्ट्र के दिग्गज किसान नेता राज शेट्टी ने किसान संसद में फसल का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य और सभी किसानों (बड़ेछोटे बटाई दारों, पशुपालकों आदि को) कर्जमुक्त करने का बिल पेश किया।

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शेट्टी ने कहा- “क्योंकि मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने किसानों के वादे नहीं पूरे। जिन किसानों ने सरकार बनवाई, उनके साथ वादा खिलाफी हुई, इसलिए मैंने आपका साथ छोड़ा है। अब यही किसान अब इस सरकार को सबक सिखाएंगे।’

शेट्टी ने आगे कहा कि मुझे मन की बात नहीं, काम की बात चाहिए, प्याज, आलू, कपास, गन्ना, सोयाबीन का लाभकारी मूल्य चाहिए। आप ने भले ही लोकसभा में हमारी बात न मानी हो लेकिन हमारी संसद ने किसानों के मन की बात सुनी है। हम इस बिल को लेकर बाकी राजनीतिक दलों के पास जाएंगे, समर्थन मांगे। जो दल समर्थन नहीं देगा किसान उसे सबक सिखाएंगे।

(नई दिल्ली से- अरविंद शुक्ला, अश्वनी निगम, दिति वाजपेई की रिपोर्ट)

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