खेत छोड़ क्यों बार-बार सड़क पर उतरने को मजबूर हैं किसान ?

खेत छोड़ क्यों बार-बार सड़क पर उतरने को मजबूर हैं किसान ?ये गुस्सा क्यों ?

महाराष्ट्र में जब 35 हजार से ज्यादा किसानों ने मुंबई की तरफ कूच किया तो हजारों लोगों ने इसे मोदी विरोधी साजिश बताया। अपनी मांगों मनवाने के बाद ये किसान अपने घर पहुंच भी नहीं पाए थे कि यूपी, हरियाणा, पंजाब समेत कई राज्यों के हजारों किसानों ने दिल्ली में संसद मार्ग पर डेरा डाल दिया। 2017 की तरह ये साल भी किसानों की नाराजगी को लेकर चर्चा में है।

लेकिन ये किसान अपने खेत-खलिहान घर द्वार छोड़ कर बार-बार सड़कों पर उतरते क्यों हैं? इसका उत्तर देने से पहले आपको उसी महाराष्ट्र ले चलते हैं, जहां 12 मार्च को किसानों ने सरकार को घुटनों पर ला दिया। महाराष्ट्र के अहमदनगर मंडी में एक किसान 50 किलो बैंगन बेचता है। उसे इसके 75 रुपए मिलते हैं। इसमें से 60 रुपए उसके किराए में खर्च हो जाते हैं तो 10 रुपए वो मजदूरी देता है। ये किसान जब घर पहुंचता है तो उसकी जेब में सिर्फ 5 रुपए थे।

इस किसान का घाटा, लागत, मेहनत, मजदूरी का हिसाब लगाने से पहले अहमदनगर से करीब 700 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के रायपुर के एक और किसान का दर्द समझिए। रायसेनपुर के कुटनासिर गांव के किसान होशियार सिंह ने पिछले दिनों अपना एक ट्राली (करीब 100 कैरेट) टमाटर एक तालाब में फेंक दिया। उनके भतीजे ने वीडियो बना लिया, वरना दुनिया को इसकी शायद ख़बर भी नहीं होती। ये दो घटनाएं सिर्फ बानगी हैं, ऐसा ही दर्द देश के हजारों किसानों का है।

हजारों की संख्या में महाराष्ट्र विधानसभा घेरने निकले किसान।

किसानों की ये नाराजगी सिर्फ सड़कों पर नहीं, मतदान कक्षों में भी नजर आने लगी है। गुजरात विधानसभा चुनावों में ग्रामीण इलाकों में भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ी। राजस्थान और मध्य प्रदेश के उपचुनावों के बाद यूपी की दो लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर में भी ग्रामीण मतदाता का वोट निर्णायक बना।

आजादी के बाद दूसरा मौका है, जब किसान राजनीति के केंद्र में हैं। 1989 में बनी किसानों की एकता टूट गई थी, जो मंदसौर कांड के बाद राष्ट्रीय स्तर पर फिर देखने को मिली है। किसान आंदोलन अब ज्यादा प्रभावी लग रहा है।
अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, ग्रामीण और कृषि मामले

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ग्रामीण मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, “फूलपुर ग्रामीण इलाका है, यहां सपा-बसपा गठबंधन के अलावा जिस बात की चर्चा नहीं हो रही है, वो है किसान मतदाता।” साल 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान, कर्नाटक और मिजोरम में चुनाव होने बाकी हैं। इनमें से तीन राज्यों में भाजपा लगातार सत्ता में है। मध्य प्रदेश, राजस्थान के साथ छत्तीसगढ़ में लगातार किसान आंदोलन कर रहे हैं।

साल 2018 में भाजपा की शुरुआत अच्छी रही है, त्रिपुरा और मेघालय में पार्टी की सरकार बनी है, लेकिन वहां की जीत राजनीतिक विश्लेषक अलग मायनों में देखते हैं, भाजपा की बड़ी लड़ाई मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य होंगे क्योंकि इसके अगले साल यानि 2019 में लोकसभा चुनाव हैं।

ये सरकार किसान विरोधी, नीरव और माल्या जैसे लोगों की समर्थक है। मोदी सरकार के खिलाफ किसानों ने अपना गुस्सा दिखाया है।
अशोक धावले, अध्यक्ष, अखिल भारतीय किसान सभा

महाराष्ट्र और राजस्थान के बाद किसान सभा ने यूपी में जोरदार प्रदर्शन किया। लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान में आयोजित किसान प्रतिरोध रैली को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र में किसान लांग मार्च के अगुवा और अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धावले ने कहा, “मोदी और योगी सरकार के खिलाफ जनता ने अपना गुस्सा दिखा दिया है। ये सरकारें किसान विरोधी है और नीरव मोदी और माल्या जैसे लोगों की समर्थक हैं।“ रैली में किसानों ने अपनी लड़ाई को गांव-गांव तक ले जाने की बात की।

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यही हाल रहा तो 2019 में भाजपा को इससे नुकसान होगा। किसानों के लिए भलाई के लिए जरूरी है, 15-18 बड़े मंत्रालयों को मिलाकर एक कमेटी बने। 25 साल के लिए राष्ट्रीय कृषि नीति बनाई जाए।
राकेश टिकैत, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय किसान यूनियन

दिल्ली में किसान महापंचायत के बाद उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को किसानों की तरफ से मांगपत्र देने वाले भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता और उपाध्यक्ष राकेश टिकैत कहते हैं, “पिछले कुछ दिनों में हुए चुनावों में किसान अहम फैक्टर रहे हैं। यही हाल रहा तो 2019 में भाजपा को इससे नुकसान होगा।“ लेकिन वो इस हार-जीत में किसान का भला नहीं देखते हैं, आगे कहते हैं, “सिर्फ सरकारें बदलने से क्या होगा, जब तक किसानों के लिए नीतियां नहीं बनेंगी। किसानों के लिए भलाई के लिए जरुरी है, 15-18 बड़े मंत्रालयों को मिलाकर एक कमेटी बने। 25 साल के लिए राष्ट्रीय कृषि नीति बनाई जाए, जो किसानों के लिए काम करे।”

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महाराष्ट्र के किसान पैदल मार्च में बड़ी संख्या में किसान महिलाएं भी हुईं शामिल।

पिछली कई सरकारों की अपेक्षा मोदी सरकार ने किसानों के लिए बहुत काम किए हैं। आप बजट आवंटन देखिए। फसल बीमा योजना, कितनी शानदार योजना है, लेकिन बाकी तमाम योजनाओं की तरह वो सही से जमीन पर उतर नहीं पा रही। अधिकारी और कर्मचारियों का रवैया इसमें बड़ा अड़ंगा है।
नरेश सिरोही, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, बीजेपी किसान मोर्चा

देश के कई हिस्सों के किसानों में नाराजगी है, इसे मानते हुए भाजपा के किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही फोन पर बताते हैं, “किसानों के सहनशीलता की हद पार हो गई है। सरकारी नीतियों के चलते लगातार समस्याओं से जूझ रहा किसान अब सड़कों पर उतरने को मजबूर है। उसके खेत छोटे (जोत कम) होते जा रहे हैं। खेती की लागत बढ़ती जा रही है।“

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तो क्या केंद्र सरकार ने काम नहीं किया

तो क्या केंद्र सरकार ने काम नहीं किया। इस पर वो अपनी सरकार की नीतियों का बचाव करते हुए कहते हैं, “पिछली कई सरकारों की अपेक्षा मोदी सरकार ने किसानों के लिए बहुत काम किए हैं। आप बजट आवंटन देखिए। फसल बीमा योजना, कितनी शानदार योजना है, लेकिन बाकी तमाम योजनाओं की तरह वो सही से जमीन पर उतर नहीं पा रही। समस्या योजनाओं में नहीं, उनके इम्पलीमेंटेशन (लागू) करने में है। अधिकारी और कर्मचारियों का रवैया इसमें बड़ा अड़ंगा है।“

इसके साथ ही वो विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को भी भारत के किसानों की राह में अड़ंगा मानते हैं, आगे कहते हैं, “अपने किसानों को भारी सब्सिडी देने वाले अमेरिका समेत कई विकसित देश अपना सस्ता माल हमारे यहां भेजते हैं। लागत उनके यहां भी ज्यादा है, लेकिन वो खेती पर बहुत अलग तरह से छूट देते हैं। भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सामने सख्त रवैया अपनाया है, उन्हें या तो अपने यहां भी छूट घटानी होगी या सस्ता माल यहां भेजना बंद करना होगा, लेकिन इस पर अभी फैसला नहीं हो पाया है।”

केंद्र हों या राज्य सरकारें, इनकी नीतियां किसानों के लिए नहीं हैं। भाजपा को चुनावों में नुकसान हो रहा है और आगे भी होगा क्योंकि भाजपा ने कई झूठे वादे किए।
राजू शेट्टी, सांसद और किसान नेता, स्वाभिमानी शेतकारी संगठन

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फिर समस्या का हल क्या है

फिर समस्या का हल क्या है, इस सवाल के जवाब में नरेश सिरोही आगे कहते हैं, “प्रोडक्शन से ज्यादा प्रोसेसिंग पर ध्यान देना होगा। किसान को प्राफिट (मुनाफे) में शेयर (हिस्सेदारी) चाहिए। ग्रामीण भारत अपने आप में बहुत बड़ा बाजार है। हमें ये देखना होगा कि किसान के खेत और शहर के बीच जो रेट का अंतर है, वो प्राफिट अभी कारोबारी और कंपनियां खा रही हैं, उसमें किसान को हिस्सेदार बनाना होगा।”

आजादी के बाद ये दूसरा मौका है, जब किसान राजनीति के केंद्र में हैं। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह अपने लेख में लिखते हैं, “1989 में किसानों की जो एकता बनी थी, वो टूट गई थी। लेकिन मंदसौर कांड के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नई एकजुटता का दौर देखने को मिल रहा है। किसान आंदोलन अब ज्यादा प्रभावी और फैले हुए नजर आ रहे हैं, शायद यही वजह रही कि 180 किलोमीटर दूर से मुंबई पहुंचे किसानों के सैलाब को देखकर फडणवीस सरकार ने उनकी सभी मांगें मानने का लिखित आश्वासन दिया।”

लागत न मिलने पर अपनी उपज फेंकने को मजबूर हुआ मध्य प्रदेश का किसान होशियार सिंह।

… और किसानों के आंदोलन ने राष्ट्रीय रूप ले लिया

साल 2017 में एक जून को महाराष्ट्र के अहमदाबाद में शुरू हुए किसानों के आंदोलन ने मंदसौर कांड के बाद राष्ट्रीय रूप ले लिया। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति में किसान संगठनों का कुनबा बढ़कर 192 हो गया है। नवंबर में दिल्ली में किसान मुक्ति संसद का आयोजन करने वाली ये समिति देशभर में 500 किसान मुक्ति सम्मेलनों का आयोजन करवा रही है। जहां संगठन से जुड़े नेता भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर वादाखिलाफी और कॉरपोरेट जगत से मिले होने का आरोप लगाते हैं।

पिछले दिनों लखनऊ में हुए सम्मेलन में भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के डॉ. सुनीलम ने कहा, “खुद प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों की आमदनी बढ़ाने की बात की, 2022 तक दोगुनी करने का वादा किया, लेकिन वर्तमान समय में आमदनी बढ़ना तो दूर किसान को लगातार घाटा हो रहा है। किसानों ने लागत पर डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य मांगा तो देश में तय एमएसपी तक में फसलों की खरीद नहीं हो पा रही है।”

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किसानों के नाम पर एनडीए साथ छोड़ने वाले महाराष्ट्र में स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ‘गांव कनेक्शन’ से फोन पर बातचीत में कहते हैं, “केंद्र हों या राज्य सरकारें, इनकी नीतियां किसानों के लिए नहीं हैं। भाजपा को चुनावों में नुकसान हो रहा है और आगे भी होगा क्योंकि भाजपा ने कई झूठे वादे किए। किसानों को समस्याओं को दूर करने का वादा किया, लेकिन वैसा हुआ कुछ नहीं।’ एक तरह जहां किसान संघर्ष समिति के किसान सम्मेलन जारी हैं, तो 23 मार्च से गांधी वादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली में आंदोलन करने जा रहे हैं।

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