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दूसरों का ख्याल रखने वाली महिलाएं खुद हो रहीं बीमार

महिला स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही का नतीजा है कि भारत में मातृ-मृत्यु दर नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों से भी अधिक है

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   7 Jan 2020 5:45 AM GMT

दूसरों का ख्याल रखने वाली महिलाएं खुद हो रहीं बीमारतमाम कवायदों के बाद भी महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति चिंताजनक है। तस्वीर श्रावस्ती जिले के इकौना ब्लॉक के बलूहा गांव की है। (फोटो- नीतू सिंह, गांव कनेक्शन)

हांड़ कंपाती ठंड में तेज बुखार से कराहती पुष्पा देवी दबी आवाज में कहती हैं, "करीब दो महीने से बुखार है। एक हफ्ते से बिस्तर पर पड़ी हूं, जब दर्द बर्दाश्त नहीं कर पाई तो इनसे (पति) कहा कि मुझे अस्पताल में दिखा दो। अस्पताल तो ये ले नहीं गये दवाई का एक पत्ता लाकर जरुर थमा दिया। अब जब कभी बुखार और तेज दर्द होता है तो इसी दवाई को खा लेती हूं।"

पुष्पा देवी (29) उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोसाईंगंज ब्लॉक से लगभग 15 किमी दूर सलौली गाँव की रहने वाली हैं। उनके पति उनकी बीमारी को लेकर कितने गंभीर होंगे इसका अंदाजा आप उनकी बातों से लगा सकते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि देश में आज भी महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रमुखता नहीं दी जाती।

महिला स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही का नतीजा है कि भारत में मातृ-मृत्यु दर नेपाल, श्रीलंका जैसे कम विकसित देशों से भी अधिक है। वर्ष 2017 की ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 15 से 49 साल की उम्र सीमा में सबसे ज्यादा एनीमिक (खून की कमी ) महिलाएं भारत में ही हैं। भारत की स्थिति ज्यादा चिंताजनक इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने की जगह हम पीछे जा रहे हैं। वर्ष 2016 की रिपोर्ट के अनुसार यहां एनीमिक महिलाओं का प्रतिशत 48 था जो इस बार 51 हो गया है।

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देश में करीब ७०% सामान्य महिलाओं और 75 % गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है। (फोटो- गांव कनेक्शन)

मध्यप्रदेश के जाने-माने समाजसेवी और स्वास्थ्य मुद्दों पर काम करने वाले सचिन जैन बताते हैं, "ग्रामीण महिलाओं और लड़कियों को बीमारी की सबसे अधिक मार झेलनी पड़ती है। इन सबके पीछे गरीबी बहुत बड़ी वजह है। गरीब परिवारों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को पर्याप्त पौष्टिक भोजन कम मिलता है , जिस वह से उनका संपूर्ण विकास नहीं हो पाता है। वहीं महिलाओं को बिना किसी आराम के दिन रात परिवार के अन्य सदस्यों के लिए काम करना पड़ता है, फल स्वरूप दूसरे की सेहत का ख्याल रखने वाली महिला का ही स्वास्थ्य बदहाल हो जाता है। "

वैश्विक पोषण रिपोर्ट वर्ष 2017 के अनुसार महिलाओं को जरूरत अनुसार पोषण नहीं मिल पाता है, लिहाजा महिला के शरीर में पोषण तत्वों की कमी बढ़ती है। आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में करीब 70 प्रतिशत सामान्य महिलाओं और 75 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है। गर्भावस्था के दौरान केवल 37 प्रतिशत महिलाओं को उचित देखरेख मिल पाती है। पिछले कुछ समय से सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में प्रयास किए जा रहे हैं।

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पैरासीटामॉल का पत्ता दिखाते हुए पुष्पा बताती हैं, "गाँव से अस्पताल बहुत दूर है। अकेले तो जा नहीं सकते। ये सुबह ही खाना खाकर काम पर निकल जाते हैं और शाम को अंधेरा होने पर लौटते हैं। मैंने अस्पताल भी नहीं देखा है कि बच्चों को लकर चली जाऊं। अब इसी दवा को खाकर जिंदा हूं।"

मध्य प्रदेश के जनपद शहडोल के विकासखंड नवाबगंज की आशा कार्यकर्ता लालाबाई बताती हैं, "यहां की महिलाएं बीमार होने पर अस्पताल नहीं आतीं। एक तो घर से अस्पताल बहुत दूर है, दूसरे घर के पुरुष भी महिलाओं की सेहत को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं होते। जब बीमारी ज्यादा बढ़ जाती है तब जाकर अस्पताल लाते हैं। पुरुषों की तुलना में हमारे यहां महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है।"

भेदभाव के कारण भी महिलाएं कुपोषण की चपेट में आ जाती हैं। (फोटो- गांच कनेक्शन)

"ग्रामीण क्षेत्रों में तबियत खराब होने पर महिलाओं को सही से इलाज नहीं मिल पाता, क्योंकि सरकारी अस्पतालों में लगने वाला समय उनके पास नहीं होता और प्राइवेट डॉक्टर के पास जाने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते हैं। ऐसे में बीमार पड़ने पर समय से इलाज नहीं मिलने से रोग बढ़ता जाता है जो बाद में विकराल रूप ले लेता है। हम लोग उन्हें बीमारी को लेकर काफी जागरूक करते हैं, लेकिन वे हमारी बात मानने से मना कर देती हैं। "

डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ की स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. नीतू सिंह बताती हैं, "महिलाओं के साथ खान-पान का भेदभाव भी कुपोषण की एक बुनियादी वजह है। छोटे-छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में भी जन सामान्य को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सुविधाएं दी जा रही हैं बावजूद इसके आज भी अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में घर में ही प्रसव कराने का चलन है। तरक्की और विकास के बावजूद भी भारत में मातृ मृत्यु दर अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है।"

" गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों के बारे में सही जानकारी न होने तथा समय पर मेडिकल सुविधाओं के ना मिलने या फिर बिना डॉक्टर की मदद के प्रसव कराने के कारण भी मौतें हो जाती है। जच्चा और बच्चा की सेहत को लेकर आशा कार्यकर्ताओं का अहम रोल होता है लेकिन इनकी कमी से कई महिलाएं प्रसव पूर्व न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं।" डॉक्टर नीतू आगे कहती हैं।

छोटे-छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं, इसके बाद भी अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में घर में ही प्रसव कराने का चलन है। पारंपरिक सोच के कारण आज भी प्रसव के लिए अस्पताल से लोग कतराते हैं। तरक्की और विकास के बावजूद भी हमारे में देश में मातृ मृत्यु दर अन्य देशों की तुलना में अधिक है।

ग्रामीण महिलाओं को होने वाली बीमारियों में सबसे प्रमुख सांस की बीमारी है। किंग जार्ज मेडिकल चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ के रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत का कहना है, "क्लीनिकल डेमोग्रफिक एंड रेडियोलॉजिकल प्रोफाइल ऑफ स्मोकर एंड नॉन स्मोकर पेशेंट पर हुए शोध के अनुसार चूल्हे पर खाना बनाने वाली महिलाएं फेफड़े की गंभीर बीमारी की चपेट में आती हैं। इस वजह से महिलाएं सांस की बीमारी सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रेक्टिव डीजीज) की जद में आ रही हैं। सीओपीडी की जद में सबसे ज्यादा महिलाएं आती हैं। "

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