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पहले कर्फ्यू और अब लॉकडाउन, जम्मू-कश्मीर के सेब, केसर और चेरी किसानों का क्या होगा?

लॉकडाउन की वजह से देशभर के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जम्मू-कश्मीर के किसानों की बात करें तो उन्हें अगस्त 2019 से लगातार नुकसान हो रहा है। पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में लगभग कई महीने तक कर्फ्यू जैसे हालात थे, उससे भारी नुकसान हुआ और अब लॉकडाउन।

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   2 April 2020 2:15 PM GMT

"सेब के पेड़ों के बीच ही बड़ा हुआ हूं। जब से जानने लायक हुआ, तब से यही काम कर रहा हूं। हमारी कई पीढ़ियां इसी में खप गईं। नुकसान तो पिछले साल से ही हो रहा है, क्या करें, कुछ और कर भी तो नहीं सकते। हमारी किस्मत में यही सब लिखा है," जम्मू कश्मीर के जिला कुपवाड़ा में रहने वाले इम्तियाज यारू (55) कहते हैं।

लॉकडाउन की वजह से देशभर के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जम्मू-कश्मीर के किसानों की बात करें तो उन्हें अगस्त 2019 से लगातार नुकसान हो रहा है। पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में लगभग कई महीने तक कर्फ्यू जैसे हालात थे। फिर जब सक कुछ सामान्य होने लगा तो नवंबर में भारी बर्फबारी से प्रदेश के किसानों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा और अब लॉकडाउन उनकी परेशानियों को और बढ़ा रहा है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की सात सदस्यीय टीम जम्मू-कश्मीर गई थी जिसने 16 नवंबर 2019 को अपनी रिपोर्ट में बताया था कि प्रदेश में पांच अगस्त के बाद से लगे कर्फ्यू और भारी बर्फबारी से बागबानी किसानों को कम से कम 7000-8000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, हालांकि प्रदेश कृषि विभाग की ओर से नुकसान का कुल आंकलन 3,500 करोड़ रुपए का था। कृषि विभाग के अनुसार जम्मू-कश्मीर के बागबानी सेक्टर का सालाना कारोबार लगभग 10,000 करोड़ रुपए का है।

कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए देश में 25 मार्च से 21 दिनों का लॉकडाउन लगा दिया गया है। लॉकडाउन का मतलब है कि इस दौरान आपातकालीन / आवश्‍यक सेवाओं को छोड़कर सभी सेवाओं पर रोक लगा दी जाती है। लॉकडाउन की स्थिति में किसी भी शख्स को जीवन जीने के लिए बुनियादी और आवश्यक चीजों को लेने के लिए ही बाहर निकलने की इजाजत होती है।

सेब के पेड़ों में फूल लगने शुरू हो गये हैं, उन्हें अब दवा छिड़काव की जरूरत है।

इम्तियाज कुपवाड़ा के तहसील लंगेत, गांव कोहारू के रहने वाले हैं और उनके पास 15 केनाल के क्षेत्र में सेब के पेड़ हैं। एक केनाल में औसतन 13 से 14 पेड़ होते हैं। वह कहते हैं, "सेब का सीजन तो नवंबर में ही खत्म हो जाता है। नवंबर में हम बाद वाले सेब को तोड़ते हैं जिन्हें कोल्ड स्टोरेज में रख देते हैं। उसे हम मार्च के आखिरी दिनों में निकालते हैं और देश के दूसरे हिस्सों में बेचते हैं। व्यापारी यहां भी आते हैं। इस समय बेचने से फायदा यह होता है कि हमें कीमत अच्छी मिल जाती है, लेकिन हमारी उम्मीद अब टूटने लगी है।"

"मैं 25 मार्च को 1,193 पेटी सेब (एक पेटी में 15 से 20 किलो सेब होते हैं) लेकर सिलीगुड़ी जा रहा था लेकिन मुझे लखनऊ में रोक दिया गया। वापस आके मैंने सेब को दोबारा से कोल्ड स्टोरेज में रख दिया। हमारे कमाने का सीजन यही होता है, लेकिन लॉकडाउन की वजह से कुछ नहीं मिल रहा। सीजन में भी कर्फ्यू लगा था। तब यहां के लोकल बाजार में ए ग्रेड सेब की कीमत 300 रुपए प्रति पेटी मिल रही थी जबकि दिल्ली में यही सेब 900-1000 रुपए प्रति पेटी के हिसाब से बेचते थे।" वह आगे कहते हैं।

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जम्मू-कश्मीर के सेब किसानों की समस्या बस यही तक नहीं है। लॉकडाउन होने की वजह से वे अगले सीजन को लेकर भी परेशान हैं। इस समय सेब के पेड़ में फूल आने शुरू हो जाते हैं। ऐसे में दवाओं का छिड़काव किया जाना बहुत जरूरी है, लेकिन दुकानों पर कीटनाशक नहीं मिल रहे हैं।

इस बारे में इम्तियाज कहते हैं, "अभी पिछले सीजन का माल वैसे ही रखा है, लेकिन अब हमें अगले सीजन की तैयारी भी करनी है। सेब के फूल आने शुरू हो गये हैं, अभी कम से कम दो छिड़काव करने होते हैं, लेकिन हमारे पास दवाएं ही नहीं हैं। पास की जिस दुकान से मैं दवाएं लेता हूं उनका माल दिल्ली से आता है, अब कब आयेगा पता नहीं, कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये और हम इस साल भी घाटे में ही रहें।"

सेब पर जम्मू-कश्मीर सरकार की रिपोर्ट। वर्ष २०१७-१८ के अनुसार

जम्मू-कश्मीर कृषि विभाग के अनुसार देश का लगभग 67 फीसदी सेब का उत्पादन (170 कुंतल सालाना) जम्मू-कश्मीर में होता है और यह लगभग 33 लाख लोगों की रोजी-रोटी का मुख्य साधन भी है। वर्ष 2016-2017 में सेब के निर्यात से सरकार को लगभग 6,500 करोड़ रुपए की कमाई भी हुई थी। जम्मू-कश्मीर में होने वाली कुल बागबानी में सेब की हिस्सेदारी 48 फीसदी है।

अपने सेब के बगीचे में किसान तनवीर डार।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ जम्मू-कश्मीर के महासचिव तनवीर अहमद डार जो खुद सेब किसान हैं वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "नवंबर में बहुत ज्यादा बर्फबारी हुई थी जिससे सेब के 25 से 30 फीसदी पेड़ टूट गये। उससे पहले पूरे राज्य में लॉकडाउन था ही। फोन तक बंद थे जिस कारण हमारे बहुत से ऑर्डर भी कैंसिल हो गये। कोल्ड स्टोरेज की कमी है तो पूरा माल स्टोर भी नहीं कर पाये थे। कौड़ियों के भाव में सेब बिक गये थे और अब जब कुछ कमाई होनी थी तब लॉकडाउन लग गया। लोगों की हिफाजत के लिए ये अच्छा फैसला है लेकिन किसानों के बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए।"

"दिल्ली की मंडी में जिस सेब की कीमत इस समय 150-160 रुपए किलो है वही सेब वहां के व्यापारी सीजन में हमसे 50-60 रुपए में खरीदते हैं। अब वे आम ग्राहकों से ज्यादा पैसे ले रहे हैं क्योंकि उनके पास कोल्ड स्टोर हैं। हालात कैसे भी रहे हों लेकिन हमें किसी भी सीजन में इतना नुकसान नहीं हुआ था। यह समय सेब को तैयार करने का है, लेकिन बाजार में दवाएं ही नहीं है। इसका असर आने वाली फसल पर दिखेगा, उत्पादन गिरना तय मानिये," डार आगे कहते हैं।

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सेब के अलावा जम्मू-कश्मीर में केसर, बेर और चेरी किसान भी लॉकडाउन की वजह से परेशानी झेल रहे हैं। केसर की खेती अप्रैल के आखिरी सप्ताह से शुरू हो जाती है, जिसकी तैयारी मार्च के आखिरी दिनों से शुरू हो जाती है।

श्रीनगर से लगभग 15 किमी दूर पंपोर के केसर किसान जुनैद रेगो (28) वैसे तो पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन अपने पुश्तैनी काम को बढ़ा रहे हैं। जुनैदी अपने घर में पांचवी पीढ़ी के केसर किसान हैं, लेकिन वे अब बेहद निराश हैं।

केसर के पेड़।

जुनैद कहते हैं, "वर्ष 2007 में हम एक ग्राम केसर (लच्छा किस्म) 250 रुपए में बेचते थे, अब यही कीमत 120 रुपए प्रति ग्राम तक आ गई है जबकि मोगारा किस्म के केसर की कीमत 400 से 150 रुपए प्रति ग्राम पर आ गई है। इस दौरान उत्पादन भी घटा है। मेरे 10 केनाल में दो वर्ष से पहले तक दो किलो तक केसर की पैदावार हो जाती थी, लेकिन अब यह घटकर 50 से 60 ग्राम हो गया है। हम इससे जूझे ही रहे थे और पहले कर्फ्यू और अब लॉकडाउन।"

"कर्फ्यू उस समय लगा जब हम केसर बेचने की तैयारी की रहे थे, लेकिन हमारा केसर धरा ही रह गया। बाजार में ईरान से सस्ता केसर आया और जब सब कुछ ठीक हो गया तब हमारे केसर की कीमत कम हो गई। हमें लेगा इस सीजन में सब कुछ ठीक हो जायेगा लेकिन अभी से दिक्कत हो रही है। 10 केनाल खेत में 10 दिन के लिए कम से कम 12 मजदूर रोज चाहिए काम करने के लिए, लेकिन मजदूर मिल ही नहीं रहे हैं। कुछ मजदूर बाहर चले गये और जो हैं भी तो वे दूसरे जिलों में हैं। मुझे खेत तैयार कराने हैं, लेकिन यह कैसे होगा पता नहीं। सब कुछ ठीक भी होगा तब तक हक पिछड़ जाएंगे। देर से बुआई हुई तो अनुकूल मौसम नहीं मिलेगा जिससे पैदावार कम हो जायेगी। वैसे भी हमारा उत्पादन 80 फीसदी तक कम हो गया है।" जुनैद आगे कहते हैं।

वर्ष 2019 में भारत ने ईरान से एक अरब रुपए से ज्यादा का केसर आयात किया था। Source- Trade Promotion council of India

लाल सोना के नाम से मशहूर केसर की खेती मई में शुरू होती है और अक्टूबर तक फसल पककर तैयार हो जाती है, लेकिन खेती से पहले केसर के खेत को तैयार करना होता है। भारत में लगभग 5,000 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है। जम्मू-कश्मीर कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में औसतन 17 मिट्रिक टन (170 कुंतल) केसर की पैदावार हर साल होती है। 160,000 फूलों से लगभग एक किलो केसर निकलता है और प्रदेश के 16,000 किसान परिवार इसकी खेती से जुड़े हुए हैं।

पंपोर जिला सबसे बड़ा उत्पादक जिला है इसीलिए इसे सिटी ऑफ केसर भी कहा जाता है। प्रदेश में इस समय लगभग 3,700 हेक्टेयर क्षेत्र में केसर की खेती हो रही और इससे लगभग 32,000 किसान जुड़े हुए हैं। हिमाचल प्रदेश केसर की खेती करने वाला देश का दूसरा राज्य है।

नवंबर २०१९ में हुई बर्फबारी से खराब हुई चेरी की फसल।

"पिछले साल पांच अगस्त के बाद हमें बहुत नुकसान हुआ था। जो चेरी का बॉक्स 100 रुपए में बिकता था वह 30-40 रुपए में बेचना पड़ा था। हमें मुश्किल से एक बॉक्स में 20-25 रुपए मिला। कम से कम तीन लाख रुपए का नुकसान हुआा था। इस बार तो लग रहा कि पैदावार कम होगी। पेड़ों में फूल आने शुरू हो गये हैं। एक हफ्ते से ऑयल स्प्रे ढूंढ रहा हूं, मिल ही नहीं रहा।" श्रीनगर, बारामुला में रहने वाले किसान रियाज भट्ट कहते हैं।

रियाज (42) 21 केनाल में चेरी की खेती करते हैं। उनका बगीचा गुलमर्ग से सटा हुआ जिस कारण मौसम अच्छी रहती है जो चेरी की खेती लिए अच्छा माना जाता है। रियाज कहते हैं कि जुलाई-अगस्त तक फल तोड़ने लायक हो जाता है, 21 केनाल में 6,000 बॉक्स चेरी निकलता है। चेरी के बॉक्स एक और दो किलो के होते हैं। जम्मू-कश्मीर चेरी उत्पादन में मामले में देश में सबसे आगे है। यहां लगभग 2,713 हेक्टेयर जमीन पर चेरी की खेती होती है।

चेरी पैक करते रियाज। तस्वीर नवंबर २०१९ की है।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ जम्मू-कश्मीर के राष्ट्रीय सचिव डार जहूर एक दूसरी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं। वे कहते हैं, "किसानों को अगली खेती करने के लिए पैसे चाहिए, जो उनके पास नहीं हैं। हमारे यहां के बैंक नहीं खुल रहे हैं, कहीं खुले भी हैं तो वहां कैश नहीं है। बीज की दुकानें तो खुली हैं लेकन किसानों के पास पैसे ही नहीं हैं। इस समस्या को लेकर हम अधिकारियों से लगातार शिकायत भी कर रहे हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।"

जम्मू-कश्मीर कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश की कुल आबादी के लगभग 25 फीसदी लोग फलों की खेती और उससे संबंधित कारोबार से जुड़े हुए हैं, जबकि 60 फीसदी आबादी खेती से जुड़ी हुई है।

प्रदेश के कृषि निदेशक अल्ताफ ऐजाज अंद्राबी गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "खेती का अपना पूरा सिस्टम होता है। इसे दूसरी चीजों से मतलब नहीं होता। जम्मू-कश्मीर के किसान फलों की खेती से जुड़े हुए हैं जो मौसम आधारित होती है। अब इस समय सेब, चेरी और केसर के किसानों को दवाएं चाहिए, लेकिन वह नहीं मिल पा रहा। समय पर छिड़काव नहीं होगा तो उसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा। और इसका सीधा असर देश पर पड़ेगा क्योंकि सेब, केसर और चेरी के उत्पादन में जम्मू-कश्मीर नंबर एक पर है।"

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