नदियों को लिंक करके निकाला जा सकता है बाढ़-सूखे का समाधान: गजेंद्र सिंह शेखावत

Ranvijay SinghRanvijay Singh   29 Nov 2019 7:20 AM GMT

नदियों को लिंक करके निकाला जा सकता है बाढ़-सूखे का समाधान: गजेंद्र सिंह शेखावतकेंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत। फोटो- फाइल

केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि बाढ़ और सूखे का स्थाई समाधान नदियों को लिंक करके निकाला जा सकता है। बशर्ते सभी राज्य इस दिशा में अपनी सहमति प्रदान करें। उन्‍होंने यह बात गुरुवार को लोकसभा में नदियों को लिंक करने की परियोजनाओं पर चर्चा के दौरान कही।

मध्य प्रदेश के सतना से सांसद गणेश सिंह ने प्रश्न किया था कि नदियों को लिंक करने की 14 परियोजनाओं में से दो मध्य प्रदेश में हैं। केन-बेतवा और पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से जुड़ी हुई है। इन दोनों परियोजनाओं का काम कब से शुरू होगा और इस पर कितनी धनराशि खर्च होगी?

इस सवाल के जवाब में गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि ''मैं सदस्य का धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने इतने गंभीर विषय पर प्रश्न किया। नदी के लिंक को चिह्नित करना, डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाना और फिर संवैधानिक स्वीकृति जैसे वाइल्ड लाइफ, फोरेस्ट आदि से ली जाती है। क्‍योंकि पानी राज्यों का विषय है, ऐसे में राज्यों की स्वीकृति के बिना एक कदम भी नहीं बढ़ाया जा सकता। जिन दो लिंक्स का सदस्य ने जिक्र किया है, वो नदियां मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पड़ती हैं। अभी जल बंटवारे को लेकर इन राज्यों में सहमति नहीं बनी है। जैसे ही सहमति बनेगी, हम निश्चित रूप से काम शुरू करा देंगे।''

देश के 18% भू-भाग में बाढ़, 13% में सूखा हर साल

गजेंद्र सिंह शेखावत ने आगे कहा, ''देश के 18 प्रतिशत भू-भाग में हर साल बाढ़ आती है और 13 प्रतिशत भू-भाग में सूखा पड़ता है। स्थाई समाधान नदियों को लिंक करके प्राप्त किया जा सकता है।'' उन्होंने कहा कि ''मैं सदस्यों से अनुरोध करता हूं कि वो अपने-अपने राज्यों में सरकारों से आग्रह करें और हम सब खुले दिल से साथ बैठकर बात करें तो समाधान निकल आएगा।''

केन नदी मध्य प्रदेश स्थित कैमूर की पहाड़ी से निकलती है और 427 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद उत्तर प्रदेश के बांदा में यमुना में मिल जाती है। वहीं बेतवा मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलती है और 576 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में यमुना में मिल जाती है।

नदियों को जोड़ने की योजना ब्रिटिश काल में ही शुरू हुई थी। उस वक्‍त सिंचाई की व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिये इस योजना को लाया गया था। हालांकि ब्रिटिश काल में इस योजना का उद्देश्‍य ज्यादा-से-ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना था। उस वक्‍त फसलों पर लगान की दर फाफी ऊंची थी ऐसे में अगर सिंचाई के लिए बेहतर पानी मिलता तो लगान अच्‍छे से वसूला जा सकता था।

इसी योजना के तहत ब्रिटिश शासन द्वारा गंगा नदी पर नहर का निर्माण कराया गया था, जिसका भारत के तत्कालीन राजा- महाराजाओं और समाज के अग्रणी लोगों ने पुरजोर विरोध किया था। इस विरोध के तहत 1916 में हरिद्वार में एक सभा का भी आयोजन किया गया था।

ब्रिटिश काल के बाद इस योजना को 1982 में तत्कालीन सरकार के द्वारा फिर से पुनर्जीवित किया गया। इसी वर्ष नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी का गठन किया गया। इसे नदियों को जोड़ने की योजना तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया। फिर कई वर्षों तक यह मामला ठंडे बस्ते में रहा और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे आगे बढ़ाया। हालांकि बाद के वर्षों में यह परियोजना कुछ आगे नहीं बढ़ पाई। अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इस परियोजना पर पुनः काम शुरू किया है। इसका जिम्मा राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण को सौंपा है। प्राधिकरण की मॉनिटरिंग का जिम्मा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री को सौंपा गया है।


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