गांव कनेक्शन सर्वे: आधे से ज्यादा किसान चाहते हैं एमएसपी पर बने कानून, 33% किसानों को डर- नये कृषि कानूनों से MSP व्यवस्था खत्म हो जायेगी

गांव कनेक्शन के सर्वे 'द इंडियन फार्मर परसेप्शन ऑफ न्यू एग्री बिल्स' के अनुसार आधे से ज्यादा किसान चाहते हैं कि MSP पर कानून बने। किसानों के एक बड़े वर्ग को डर है कि नये कृषि कानूनों के बाद सरकार एमएसपी की व्यवस्था ही खत्म कर देगी।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   21 Oct 2020 11:15 AM GMT

"14 अक्टूबर को 290 कुंतल मक्का लेकर मंडी गया था। मंडी बंद थी। मंडी के व्यापारी बाहर ही थे। उन्हें मैंने 870 रुपए के हिसाब से मक्का बेच दिया। अब सरकार का रेट देखें तो मुझे हर कुंतल पर 980 रुपए का नुकसान हुआ।" मध्य प्रदेश जिला सिवनी के जैतपुरा कलां गांव में रहने वाले युवा किसान रोहित बघेल (25) बताते हैं।

रोहित ने इस साल कुल 26 एकड़ में मक्का लगाया था। वे कहते हैं कि मंडी में तो मक्के की कीमत यही लगभग 700 रुपए प्रति कुंतल है, जबकि केंद्र सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,850 रुपए प्रति कुंतल घोषित किया है। इस हिसाब से देखेंगे तो रोहित को लगभग तीन लाख रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। मतलब सरकार ने फसल की कीमत तय तो की है, लेकिन किसानों से उस दर पर खरीदी नहीं हुई। शायद यही कारण है कि देशभर के किसान हाल ही में बने कृषि कानूनों में एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाने की वकालत कर रहे हैं।

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन के सर्वे में शामिल आधे से ज्यादा 59% किसानों ने कहा है कि एमएसपी पर अनिवार्य कानून बनना चाहिये। जबकि 39% किसानों को डर है कि नए कृषि कानून आने के बाद भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार फसलें खरीदना बंद कर देगी और एमएसपी व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी।

किसान और विपक्ष के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने सदन में तीनों कृषि बिल कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 आवश्यक वस्तु अधिनियम 2020 को पास करा लिया। इसके बाद 27 सितंबर 2020 को देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद तीनों कृषि बिल कानून बनकर लागू हो गए। कृषि सुधार के लिए लागू इन कानूनों का कई राज्यों में विरोध जारी है, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार किसानों को ये समझाने कि कोशिश में है कि बिल उनके हित में हैं और इससे कृषि का भविष्य बदल जाएगा।

देश का हर दूसरा किसान कृषि कानूनों के विरोध में: गांव कनेक्शन सर्वे

इन सबके बीच गांव कनेक्शन के रूरल इनसाइट विंग ने देश के 16 राज्यों के 53 जिलों में 5,022 किसानों के बीच रैपिड सर्वे कराया। रैपिड सर्वे में मार्जिंन ऑफ एरर 5 फीसदी है। तीन अक्टूबर से 9 अक्टूबर 2020 के बीच हुए इस फेस टू फेस सर्वे में किसानों से कृषि कानूनों, मंडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि अध्यादेशों के प्रभाव, किसानों आशंकाओं, उनके पास जोत, फसल उगाने से लेकर केंद्र सरकार और राज्यों सरकार के फैसलों से लेकर कृषि से आमदनी और भविष्य के फैसलों आदि को लेकर सवाल किए गए।

सर्वे से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट The Rural Report-2: THE INDIAN FARMER'S PERCEPTION OF THE NEW AGRI LAWS गांव कनेक्शन की इनसाइट वेबसाइट www.ruraldata.in पर पढ़ सकते हैं।

सर्वे में शामिल किसानों से जब पूछा गया कि क्या आपको लगता है कि एमएसपी प्रणाली को देश में एक अनिवार्य कानून बनाया जाना चाहिए? इसके जवाब में 59 फीसदी ने कहा 'हां' 16 फीसदी ने कहा ना और 25 फीसदी ने कहा कुछ कह नहीं सकते।

उत्तर-पश्चिम और पश्चिम क्षेत्र का हर चौथा, पांचवां शख़्स न्यूनतम समर्थन मूल्य को अनिवार्य नियम बनाने स्वागत करता है। बहुत ही कम अंतर पर 66% सीमान्त व छोटे किसान और 56% मध्यम व बड़े किसान भी इस पर सहमति जताते हैं। 37% छोटे और सीमान्त किसानों की तुलना में 46% मध्यम और उच्च वर्गीय किसान भी इस बात से सहमत हैं।


पंजाब-हरियाणा में किसानों का विरोध प्रदर्शन अभी भी चल रहा है। इसी बीच एमएसपी (MSP) से कम कीमत में खरीद पर तीन साल की सजा और कृषि उपज की जमाखोरी को रोकने के प्रावधानों के साथ पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह विधानसभा में केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ तीन संशोधन बिल पेश कर दिये हैं।

पंजाब में आए इन बिलों में से एक में मंडियों के बाहर किसानों से उपज खरीद में कोई टैक्स न वसूले जाने के प्रावधान को निष्प्रभावी बनाने के लिए पंजाब सरकार ने अपने बिल में कहा है कि राज्य में कोई भी व्यापारी और कंपनी किसानों से एमएसपी से कम कीमत पर धान और गेहूं नहीं खरीदेगा और उल्लंघन करने पर तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

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केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ विधानसभा में बिल पेश करने वाला पंजाब पहला राज्य बन गया है।

गाँव कनेक्शन ने अपने सर्वे में यह पता लगाने की कोशिश की कि छोटे, सीमान्त, मध्यम और उच्च वर्गीय किसानों में कौन सा वर्ग न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर, जिसे केंद्र सरकार तय करती है, पर अपनी फसल बेच पाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि ज़्यादातर मध्यम और उच्च वर्गीय किसान एमएसपी (MSP) पर निर्भर हैं। सर्वे में शामिल 63 फीसदी किसानों ने कहा कि वो अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचते हैं। इसमें 58% छोटे और सीमान्त किसानों की तुलना में 75% मध्यम और उच्च वर्गीय किसान शामिल हैं।

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क्षेत्रों की बात करें तो केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के 78% किसान अपनी फसल एमएसपी पर बेचते हैं। इसके बाद उत्तर-पश्चिम क्षेत्र पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में 75%, पश्चिमी क्षेत्र महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश में 71% और पूर्वोत्तर पूर्व क्षेत्र पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 66% किसान अपनी फसल एमएसपी पर बेचते हैं। पूर्वी क्षेत्र जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड में सबसे कम 26% किसान ही अपनी फसल एमएसपी पर बेचते हैं।

इसी सर्वे में हमने यह भी पता लगाने का प्रयास किया कि किसानों ने अपनी अंतिम फ़सल कहां बेची? सरकारी मंडी या कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी), या खुले बाज़ार में, निज़ी व्यापारी या राज्य सहकारी समितियों में?


इस सवाल के जवाब में 36% किसानों ने कहा कि वे अपनी फसल की बिक्री के लिए सरकारी मंडी/एपीएमसी को पसंदीदा माध्यम मानते हैं। पूर्वी -पश्चिम राज्य जैसे पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में 78% किसान सरकारी मंडी या एपीएमसी को वरीयता देते हैं। इसके बाद दूसरी वरीयता निजी व्यापारियों को दिया जाता है। 25.6% किसान निजी व्यापारियों को फसल बेचने का अपना पसंदीदा माध्यम मानते हैं, ख़ासकर पूर्वी क्षेत्र के 40% किसानों का माध्यम यही है। इसके बाद दक्षिणी क्षेत्र के 32% किसानों का यह लोकप्रिय माध्यम है। सबसे कम वरीयता निजी कंपनी या कॉर्पोरेशन को दिया जाता है, जो मात्र 2% है।

किसानों से जब यह पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि तीन नये कृषि विधेयक, भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को समाप्त कर देंगे तो 39% ने हां में जवाब दिया। उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में इस डर का प्रतिशत सबसे अधिक 65% पाया गया।


न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली के निकट भविष्य में समाप्त होने की चिंता उन किसानों को अधिक है जो इस मूल्य पर अपनी उपज बेचते हैं। 49% किसान इसी चिंता में हैं। 24% किसानों को इसकी कोई चिंता नहीं क्योंकि यह अपनी उपज की बिक्री के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर निर्भर नहीं हैं।


न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी फ़सल बेचने वाले 67% किसान एमएसपी को अनिवार्य नियम बनाने के पक्ष में हैं और 46% किसान इस नियम के खिलाफ हैं।

किसान क्यों चाहते हैं एमएसपी पर कानून बने, उसे आप उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर के ब्लॉक फूलबहेड़ के गांव अतकोहना सलारपुर राजेंद्र सिंह से भी समझ सकते हैं। वे गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मैंने कुछ दिनों पहले 1,400 रुपए प्रति कुंतल के हिसाब से 300 कुंतल धान पास के ही मिल को बेच दिया।"

मंडी में धान क्यों नहीं बेचा, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, "मंडी गया था। वहां धान की कीमत 1,100-1,200 रुपए प्रति कुंतल बड़ी मुश्किल से मिल रहा है। मिल से भी मुझे 1,400 रुपए इसलिए मिलेगा क्योंकि मैंने डेढ़ महीने की उधारी पर उन्हें उपज बेचा है। पिछले साल इसी धान (पीआर 113) का मुझे एक कुंतल का 1,560 रुपए मिला था।"

केंद्र सरकार ने धान की कीमत 1,868 और 1,888 रुपए प्रति कुंतल तय किया है।

सर्वे के कुछ और मुख्य तथ्य

  • 52% किसानों ने कहा कि वो कृषि कानूनों का विरोध करते हैं, लेकिन विरोध करने वाले किसानों में 36 %किसानों को कृषि बिलों की जानकारी नहीं थी
  • 35% किसानों ने नए कृषि बिलों का समर्थन किया, लेकिन इनमें से 18% नए बिलों को लेकर जागरूक नहीं थे 66% किसान नहीं चाहते कि उनका बच्चा भी किसान बने
  • 49% किसानों को एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) के बारे में कोई जानकारी नहीं
  • 51% किसानों ने कहा खेती फायदेमंद है
  • 25% किसानों ने कहा- तीनों कृषि कानून मोदी सरकार का सबसे बड़ा किसान विरोधी कदम
  • 25% किसानों ने कहा- देश में कर्ज़माफी न करना मोदी सरकार का सबसे बड़ा किसान विरोधी कदम
  • 32% किसानों की राय पीएम किसान निधि (साल के 6000 रुपए) को मोदी सरकार का सबसे बड़ा किसान हितैषी फैसला
  • 44% किसानों ने कृषि कानूनों के लागू करने के फैसले पर कहा कि मोदी सरकार किसान हितैषी है
  • 35% किसानों ने कृषि कानूनों को देखते हुए मोदी सरकार को किसान समर्थक बताया
  • 44% किसानों ने कहा मोदी सरकार बड़ी कंपनियों, एमएनसी, निजी व्यापारियों और व्यापारियों की समर्थक है
  • 46% किसानों ने कहा, कृषि बिलों से किसानों का शोषण करने वाली कंपनियों/निजी कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा

सर्वे से जुड़ी दूसरी खबरें यहां पढ़ें-

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