गांव का एजेंडा: प्रिय गिरिराज सिंह जी, सुनिए क्या कह रहा है देश का पशुपालक

गांव का एजेंडा: प्रिय गिरिराज सिंह जी, सुनिए क्या कह रहा है देश का पशुपालक

खेती-किसानी से लेकर पशुओं को पालने तक किसानों को क्या आ रही हैं समस्याएं? क्या है उन समस्याओं का हल? इस स्पेशल सीरीज में गाँव कनेक्शन केन्द्र की नई मोदी सरकार के सामने उठा रहा है गाँवों के उन मुद्दों को जिनसे देश की एक तिहाई आबादी हर रोज जूझती है।

Diti Bajpai

Diti Bajpai   7 Jun 2019 8:28 AM GMT

खेती-किसानी से लेकर पशुओं को पालने तक किसानों को क्या समस्याएं आ रही हैं ? क्या है उन समस्याओं का हल ? इस स्पेशल सीरीज में गाँव कनेक्शन केन्द्र की नई मोदी सरकार के सामने उठा रहा है गाँवों के उन मुद्दों को जिनसे देश की एक तिहाई आबादी हर रोज जूझती है।

प्रिय गिरिराज सिंह जी (पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री, भारत सरकार)

इन ग्रामीण पशुपालकों की सुनिए...

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आमदनी में पशुओं का योगदान अहम है, लेकिन लचर सरकारी तंत्र और संसाधानों की उपलब्धता न होने से गाँवों से पशु कम होते जा रहे हैं, छोटे किसानों के लिए भी पशुपालन घाटे का साैदा बनता जा रहा है। ये कुछ समस्याएं हैं, जिनके समाधान से पशुधन सेक्टर में बड़ा बदलाव आ सकता है।

इन समस्याओं पर ध्यान दीजिए सरकार.....

1. जर्जर पशुचिकित्सालय एवं पशु डाक्टरों की कमी

ग्रामीण क्षेत्रों में बने पशु अस्पतालों की हालत बहुत ही खराब है। डॉक्टरों-कर्मचारियों की कमी और दवाइयों की उपलब्धता न होने से आए दिन ग्रामीणों को जूझना पड़ता है।

मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के नागदा जंक्शन के पास रहने वाले अशोक सिसोदिया ने फोन पर बताया, "हमारे यहां 403 ग्राम पंचायतें हैं। हर चार से पांच गाँवों पर एक पशु अस्पताल बना हुआ है पर इन अस्पतालों की स्थिति काफी बदतर है। बिल्डिंग जर्जर होने से डॉक्टर आते नहीं और न दवाएं उपलब्ध हैं। सरकारी अस्पताल होने के बावजूद पशुपालकों को मजबूरी में प्राइवेट इलाज कराना पड़ता है।"

अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहा, "गाँव में जब भी कोई पशु बीमार होता है तो कोई ऐसा नंबर नहीं है, जिससे तुरंत डॉक्टर घर पर ही पहुंच कर पशु का इलाज कर सकें। प्राइवेट डॉक्टर मिलता है तो महंगी दवाएं लिखता है। एक तो दूध के दाम नहीं मिल रहे ऊपर पशुओं को दवाइयों का खर्च भी बढ़ रहा है। सरकार को ऐसी सुविधा देनी चाहिए घर पर ही पशुओं को इलाज मिल सके।"


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वर्ष 2017 में सांसद हुकम देव नारायण यादव की अध्यक्षता में कृषि संबंधी समिति ने एक रिपोर्ट पेश की थी। रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में लगभग एक लाख पंद्रह हजार पशुचिकित्सकों की जरूरत है, और वर्तमान में 60 से 70 हजार ही पशुचिकित्सक उपलब्ध हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि सही समय पर उपचार और दवाई न मिलने से बड़ी संख्या में मवेशियों की मौत हो जाती है। इससे सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान गरीब, छोटे और सीमांत किसानों को होता है।

अगर देश के विकास में इस सेक्टर के योगदान की बात करें तो वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि देश के जीडीपी में लाइवस्टॉक सेक्टर का कुल योगदान 4 फीसदी है। जबकि एग्रीकल्चर जीडीपी में इसका योगदान 26 फीसदी है। वर्ष 2004-05 में आई वर्ल्ड बैंक की ही एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के लाइवस्टॉक सेक्टर का कुल कारोबार 20075 बिलियन का था। वहीं 2015 में डाउन टू अर्थ ने अपनी रिपोर्ट इसे 3,40,500 करोड़ रुपए बताया था।

ग्रामीण अर्थव्यस्था से जुड़े इतने बड़े क्षेत्र को सुधार कर किसानों की आय दोगुनी करना आसानी से संभव होगा।

19वीं पशुगणना के मुताबिक देश में कुल 51.2 करोड़ (गाय-भैंस, भेड़, बकरी, सुअर, घोड़े, टट्टू, खच्चर, गधे, ऊंट, मिथुन और याक) पशु हैं, जिनसे गरीब छोटे और सीमांत किसानों की जीविका जुड़ी हुई है।

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उत्तर प्रदेश के एटा जिले के निधौलीकलां ब्लॉक के ओरनी गाँव में रहने वाले राजवीर (60 वर्ष) ने कहा, "पशुचिकित्सालय तो बना लेकिन कोई सुविधा नहीं है। न कोई डॉक्टर आते हैं और न कोई फार्मासिस्ट। जब पशु बीमार होता है तो प्राइवेट डॉक्टर को फोन कर लेते हैं, वो घर भी आ जाते हैं, लेकिन पैसे ज्यादा देने होते हैं।''

राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार देश में 5000 पशुओं पर एक पशुचिकित्सालय स्थापित होना चाहिए लेकिन यह मानक कुछ राज्यों में ही होगा। देश के ज्यादातर इस मानक पर खरे नहीं उतरते हैं। भारत में पशुओं की सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश है जहां पर 21 हजार पशुओं पर एक ही पशु चिकित्सालय उपलब्ध है। ऐसे में पशुओं के इलाज के पशुपालकों को दूर-दूर जाना पड़ता है। पशुचिकित्सक और पशु अस्पतालों के अभाव में उनकी मृत्यु भी हो जाती है।

गाँव कनेक्शन को झारखंड से फोन पर पशुओं का इलाज करने वाले बबलू ने बताया, "अस्पतालों में जो मुख्य दवाएं उपलब्ध होनी चाहिए उनकी भी कमी रहती है। अस्पतालों में पशुओं के लिए एंटीपायेरिक एंड एनलजेसिक्स (दर्द व बुखार के लिए), एंटीबायोटिक्स, डीवार्मर, वैक्सीन उपलब्ध होना चाहिए लेकिन ज्यादातर अस्पतालों में इनमें से कोई उपलब्ध ही नहीं होगी।

2. इलाज के लिए समय पर उपलब्ध नहीं होते पशु डॉक्टर

एक तरफ जहां पशुपालक सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों की सुविधाएं न मिलने से परेशान हैं तो वहीं अस्पतालों के पशु चिकित्सक भी अपनी बात रखते हैं। समय पर पशुपालकों तक न पहुंच पाने का कारण बताते हुए लखनऊ जिले के बीकेटी ब्लॉक के महिगवां गाँव के पशुचिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेंद्र कुमार अपनी समस्या रखते हैं, "पूरे साल में तीन महीने ही अस्पताल में रह पाते हैं। साल में दो बार पशुओं का टीकाकरण करना होता है। इसके अलावा गाँवों में शौचालय बनवाने में, कोटा सत्यापन, स्वच्छता अभियान में ड्यूटी, मिड-डे मील चेक करना जैसे कई अन्य कार्यो में ड्यूटी लगवा दी जाती है। ऐसे में सभी पशुओं का इलाज कर पाना संभव नहीं है।"

हरियाणा राज्य के पंचकुला जिले के पशुचिकित्सा संघ के अध्यक्ष डॉ चिरतन काडियन कहते हैं, "पशुचिकित्सकों के ऊपर जो चिकित्सा के अलावा जो अन्य काम उनको हटाना चाहिए। मोबाइल वेटनरी वैन की शुरुआत की जानी चाहिए साथ ही सस्ते दामों में पशुपालकों को दवाएं उपलब्ध हों।

3. जिले स्तर पर मल्टी स्पेशियलिटी पशु अस्पताल नहीं

जानवरों को बेहतर इलाज मिल सके, इसके लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान (आईवीआरआई) ने बरेली जिले में उत्तर भारत का यह पहला मल्टी स्पेशलियटी अस्पताल तैयार करवाया है। इस अस्पताल में बड़े और छोटे जानवरों के लिए अलग-अलग ऑपरेशन थिएटर, माइनर ओटी, प्रसव कक्ष, एक्सरे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, जांच प्रयोगशाला, एंडोस्कोपी, डायलिसिस यूनिट और सेमिनार रूम उपलब्ध है। साथ ही इस अस्पताल में आईसीयू की भी सुविधा है।

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आईवीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक एवं मल्टी स्पेशलियटी अस्पताल के प्रभारी डॉ. अमर पाल बताते हैं, "हमारे यहां कई राज्यों से लोग अपने पशुओं को लेकर आते हैं लेकिन जिनके पास पैसे का अभाव का वो किसान मजबूर है। अगर जिले स्तर पर मल्टी स्पेशलियटी अस्पताल बने तो जांच के लिए किसानों को भटकना नहीं पड़ेगा और गरीब छोटे किसानों को लाभ मिलेगा।"

3. पशुमित्रों पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं

पशुपालकों को सरकारी या प्राइवेट डॉक्टर न मिलने के कारण ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर पशुपालक अपने पशुओं का इलाज पशुमित्र से करा लेते हैं। पशुचिकित्सा का पर्याप्त ज्ञान न होने के कारण पशुमित्र गलत इलाज कर देते हैं, जिससे पशुपालक को आर्थिक नुकसान भी हो जाता है। भारतीय पशुचिकित्सा परिपषद के एक्ट 1984 में यह लिखा हुआ है कि पशुमित्र केवल प्रारम्भिक चिकित्सा कर सकते हैं।

4. टीकाकरण की हो व्यवस्था

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालक अभी भी अपने पशुओं को टीकाकरण नहीं कराते हैं, सही तरीके से जानकारी न होने के अभाव में टीकाकरण की अहमियत के बारे में जागरुक न होने से इस ओर ध्यान नहीं देते।

मवेशियों को गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार करोड़ों का बजट खर्च करती है, लेकिन अभी भी खुरपका-मुंहपका, गलाघोटू जैसी बीमारी पर नियंत्रण नहीं किया जा सका है। लखनऊ के बीकेटी ब्लॉक के पशुचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश बताते हैं, "पूरे साल टीकाकरण अभियान चलता रहता है, जिसमें सरकारी खर्चा होता है और सही तरह से क्रियान्वयन नहीं होता। ऐसे में संयुक्त टीका लगना चाहिए इसमें खर्च के साथ श्रम शक्ति की समस्या नहीं आएगी।"

दूसरे करोड़ों रूपये खर्च करके गाँवों में पहुंची वैक्सीन की कोल्ड चेन दुरुस्त करने के लिए आइस लाइनर(बर्फ रखने का डिब्बा) देना चाहिए, इससे वैक्सीन खराब नहीं होगी और दूर दराज के गाँव में वैक्सीन को ले जाकर लगाया जा सकेगा।

गाँवों में टीके लगाने के बाद उनकी निगरानी न होने से पता ही नहीं चल पाता कि कब टीका लगाया गया। इसके लिए एक व्यवस्था नहीं होती। टीकाकरण समय पर न होकर लेटलतीफ चलता रहता है।

हाल ही में पूर्व केंद्रीय राज्य कृषि मंत्री कृष्णा राज ने पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हरियाणा में खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) और गलाघोटू (एचएस) के संयुक्त टीके को लगाने की अनुमति दी थी। अगर पूरे देश में गंभीर बीमारियों के संयुक्त टीके लगें तो किसान को भी फायदा होगा और सरकार का खर्च भी बचेगा। टीका लगने से पशुओं में औसत 15 किलो प्रतिदिन के हिसाब से साल में चार बार में 60 किलो दूध का नुकसान होता है। इससे 30 किलो दूध किसान का बच सकेगा।

सरकार को गाँव कनेक्शन के सुझाव:-

1. पशुओं के इलाज के लिए घर-घर जाएं मोबाइल वैन: अगर किसानों के घर पहुंच कर मोबाइल वैन से इलाज किया जाए तो पशुओं को जल्द ही इलाज मिल सकता है।

उदाहरण के तौर पर झारखंड के रांची जिले में रहने वाले बबलू सूंडी पिछले कई वर्षों से मोबाइल वैन के जरिए घर-घर जाकर पशुओं का इलाज कर रहे हैं। बबलू बताते हैं, "अगर पशुपालक के घर पहुंच कर इलाज मिलेगा तो उसके नुकसान को रोका जा सकता है। गाँव तक गंभीर बीमारियों की वैक्सीन ही सही तरीके से पहुंचे तो पशुपालकों को दवाइयों पर कम खर्च होगा।"

सरकार को दवाइयों और घर-घर पशुओं के इलाज के लिए मोबाइन वैन चलानी चाहिए और इसकी मॉनीटरिंग भी हो।

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उत्तराखंड पशुपालन विभाग में डिप्टी डायरेक्टर डॉ. अमित बताते हैं, "पहाड़ी राज्यों में पशुचिकित्सक के लिए पशुओं का इलाज करना चुनौतियों से भरा होता है। अगर मोबाइल क्लीनिक की सुविधा हो तो डोर टू डोर पशुओं को इलाज मिल सकेगा और पशुपालकों को फायदा भी होगा।


2. तुरंत सहायता के लिए हो टोल फ्री नंबर : पशु पालक बीमार जानवरों का इलाज अगर तत्काल पा सकें तो बेहतर होगा। इसके लिए एक टोल फ्री नंबर जैसा चलाया जा सकता है।

इसके लिए तेलंगाना राज्य से सीखा जा सकता है, तेलंगाना में पशु संजीवनी योजना शुरू की गई थी, जिसमें पशुपालक टोल फ्री नंबर पर कॉल करके पशु की बीमारियों के लक्षण के बारे में बताते हैं और डॉक्टर उसे इलाज बताता है। गंभीर स्थिति होने पर डॉक्टर घर तक इलाज के लिए जाता है।

"पशुओं को इलाज देने के लिए तेलंगाना में पशु संजीवनी योजना शुरू की गई। यह बहुत अच्छी योजना थी जिसके बाद गुजरात, मध्य प्रदेश और अब हरियाणा में इस शुरू किया जाना है। इससे किसानों को फायदा मिल रहा है पूरे देश में इसको चलाना चाहिए," हरियाणा राज्य के पंचकुला जिले के पशुचिकित्सा संघ के अध्यक्ष डॉ चिरतन काडियन सुझाव देते हैं।

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