वर्ष 2017 में सैकड़ों घोड़ों, गधों की जान ले चुका ये है रोग  

Diti BajpaiDiti Bajpai   26 Oct 2017 7:38 PM GMT

वर्ष 2017 में सैकड़ों घोड़ों, गधों की जान ले चुका ये है रोग  19 वीं पशुगणना के अनुसार देशभर में करीब 11.8 लाख अश्व प्रजाति (घोड़ा, गधा, खच्चर) हैं।

लखनऊ। चार साल पहले अली हुसैन (36 वर्ष) ने अपने घर की रोजी रोटी चलाने के लिए एक खच्चर खरीदा था लेकिन ग्लैंडर्स बीमारी के चलते आज से पंद्रह दिन पहले उसे मार दिया गया। आज अली इधर-उधर मजदूरी करके अपने परिवार का खर्चा चला रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के टिपरिया खीरी गाँव के निवासी अली बताते हैं, पैसे जोड़कर पचास हजार में एक खच्चर खरीदा था। भट्ठे में काम करके अच्छी कमाई हो जाती थी। एक महीने पहले उसके गले में गांठ पड़ने लगी जब ज्यादा हो गई तो उसको अस्पताल ले गए। डॅाक्टर साहब ने खून की जांच के लिए बाहर भेजा। जब जांच आई तो पता चला मरना पड़ेगा।"

यह भी पढ़ें- फसल में बकरी बीट खाद के प्रयोग से बढ़ जाता है बीस प्रतिशत तक अधिक उत्पादन

अश्व प्रजाति में होने वाली ग्लैंडर्स बीमारी ने देशभर के सैंकड़ों अश्वों को संक्रमित कर दिया है। इस बीमारी की वजह से पूरे शरीर में गांठें होने लगती हैं। नाक और मुंह से लगातार पानी बहता रहता है और धीरे-धीरे ये गांठें जानलेवा बन जाती हैं। इस बीमारी की सबसे खतरनाक बात ये है कि इस रोगी के सम्पर्क में आने वाला हर जानवर और यहा तक कि इंसान भी इसका शिकार बन जाता है।

"इस बीमारी फैलाव सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से हुआ है। पशु मेलों में खरीद और बेचे जाने के बाद वह देश के विभिन्न हिस्सों में जाते है। अभी यूपी के अलावा गुजरात, उत्तराखंड़, जम्मू कश्मीर, राजस्थान समेत कई राज्यों से सैंपल आ रहे है। वर्ष 2006 में देश में एक बार ग्लैंडर्स घोड़े में दिखाई दिया था लेकिन उसे तुरंत काबू कर लिया गया था। अब फिर इस रोग के मामले लगातार बड़े स्तर पर सामने आ रहे है।" ऐसा बताते हैं, हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान(एनआरसीई) केंद्र के निदेशक डॅा भूपेंद्र नाथ त्रिपाठी।

यह भी पढ़ें- चीन खरीदेगा पाकिस्तान से गधे

19 वीं पशुगणना के अनुसार देशभर में करीब 11.8 लाख अश्व प्रजाति (घोड़ा, गधा, खच्चर) हैं, इससे लाखों परिवारों की अजीविका जुड़ी हुई है।

उत्तर प्रदेश में ग्लैंडर्स बीमारी से लड़ने के लिए सर्विलांस चलाया जा रहा है। "प्रदेश के 75 जिलों से हर महीने 20 सैंपल हिसार भिजवा रहे है। जहां के सैंपल पॅजिटिव आ रहे है। वहां के पशुओं को अलग करके उनको मारा जा रहा है। साथ ही और पशुओं को यह बीमारी न हो इसके लिए लोगों को जागरुक किया जा रहा है। वर्ष 2017 में 143 अश्व प्रजाति को मारा जा चुका है और 104 अश्व पालकों को सरकारी मदद भी मिल गई है। " ऐसा बताते हैं, लखनऊ स्थित पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॅा एस. के अग्रवाल।

यह भी पढ़ें- एक भैंस से शुरू किया था व्यवसाय, आज यूपी के दूध उत्पादकों में सबसे आगे ये महिला किसान

ग्लैंडर्स बीमारी की पुष्टि के बाद पशुओं को मार दिए जाने की सलाह दी जाती है। ताकि बाकी के जानवरों के साथ पशुपालक भी बीमारी से सुरक्षित रह सकता है। पशुओं को मारने के लिए यूथेनेशिया नामक दवा को बड़ी मात्रा में दिया जाता है। इसके बाद पशु गहरी नींद में चला जाता है और लगभग दस मिनट में नींद के दौरान ही उसकी दर्दरहित मौत हो जाती है। मरने के बाद रोग ग्रस्त पशु को छह फीट गहरे गड्ढ़े में डालकर उसके ऊपर चूना डाल दिया जाता है। मृतक शरीर को ऐसे दफनाया जाता है कि उसको कोई कुत्ता या अन्य जानवर न खा सके क्योंकि यह बीमारी तेजी से फैलती है।

यह भी पढ़ें- पोल्ट्री फार्मों में इस्तेमाल की जा रही एंटीबायोटिक दवाएं आपको बना रही हैं रोगी

इस बीमारी से मरने पर मिलने वाले मुआवज़ा के बारे में एनसीआई के डॅा त्रिपाठी बताते हैं, "ग्लैंडर्स और फार्सी अधिनियम, 1899 में मुआवज़ा की राशि की 50 रुपए थी। चूंकि एक बहुत गरीब तबका इससे जुड़ा हुआ है इसलिए बहुत मांगों के बाद ग्लैंडर्स और फार्सी अधिनियम 2009 में इस राशि को बढ़ाया गया है। अभी इस बीमारी से घोड़े के मरने पर 25,000 रुपए और गधों, खच्चर के मरने पर 16000 रुपए की धनराशि पशुपालकों को दी जाती है। यूपी में मुआवज़ा देने की स्थिति भी काफी खराब है, जिससे गरीब तबके को काफी दिक्क्त होती है क्योंकि उनका पूरा खर्चा उस एक पशु पर होता है।”

यह भी पढ़ें- गोबर से लाखों का कारोबार करना है तो लगाइए बॉयो सीएनजी बनाने का प्लांट, पूरी जानकारी

पूरे देश में हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में ग्लैंडर्स बीमारी के सैंपल की जाती है। इस केंद्र में सैंपल को 3 दिन में जांच कर रिपोर्ट भेज दी जाती है।"यूपी से हर महीनें दो हजार सैंपल जांच के लिए आ रहे है। अप्रैल 2017 से अब तक 143 सैंपल पॅजिटिव है और भी राज्यों से सैंपल आ रहे है। इस बीच अश्व पालकों में जागरुक भी बढ़ी है जो इस बीमारी को रोकने में सहायक होगी।" डॅा त्रिपाठी ने बताया, " अभी देश में मनुष्य में इस रोग का कोई केस सामने नहीं आए। इंसान में यह बिमारी वर्ष 2000 में अमेरिका में दिखी थी।

यह भी पढ़ें- बायोसिक्योरिटी करके बढ़ाएं पोल्ट्री व्यवसाय में मुनाफा

लक्षण

  • गले व पेट में गांठ पड़ जाना
  • जुकाम होना (लसलसा पदार्थ निकलना)।
  • श्वासनली में छाले
  • फेफड़े में इन्फेक्शन।

बचाव के लिए क्या करें

  • पशु को समय पर ताजा चारा-पानी देना।
  • बासी खाना न दें।
  • ज्यादा देर तक मिट्टी-कीचड़ में न रहने दें
  • साफ-सफाई का ध्यान रखना।
  • गर्मी में नहलाना।
  • दवाओं का छिडकाव जरुर करें।
  • बीमार पशुओं के नजदीक न जाने दें

इस बात का रखे ध्यान

इस बीमारी से प्रभावित पशु को मारने के बाद गड्ढे में दबा देना चाहिए या जला देना चाहिए। गड्डा 4 फीट का होना चाहिए।

यह भी पढ़ें- महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में अश्व प्रजाति मददगार

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top