परिवार नियोजन का 40 फीसदी बजट रखा है, गर्भनिरोधक के विज्ञापन पर बैन है

परिवार नियोजन का 40 फीसदी बजट रखा है, गर्भनिरोधक के विज्ञापन पर बैन हैकंडाेम के विज्ञापन पर  सरकार ने जहां बैन लगा दिया है वहीं भारत में कंडोम की हिस्सेदारी महज 5 फीसदी है।

नई दिल्ली/लखनऊ। कंडोम के विज्ञापन पर देश में चल रही चर्चा लोकसभा तक पहुंच गई। सरकार ने कहा कि कंडोम के विज्ञापन की शिकायत जनता ने की थी। इस मुद्दे ने चर्चा इसलिए पकड़ी थी क्योंकि भारत का जनसंख्या विस्फोट किसी से छिपा नहीं है जबकि गर्भ-निरोधक बाजार में कंडोम की हिस्सेदारी महज 5 फीसदी है, वहीं बिट्रेन में ये आंकड़ा 30 फीसदी का है।

एक प्रश्न के जवाब में सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी ने कहा, “मंत्रालय को कंडोम के विज्ञापनों के संदर्भ में जनता से शिकायतें आई थी कि वो बच्चों के लिए अभद्र और अनुचित थे।’ इसी आधार पर केंद्रीय मंत्री ने पिछले दिनों कहा था ये विज्ञापन अश्लील हैं और इन्हें दिन में न दिखाया जाए। जबकि अन्य ऐसे ही कार्मिशियल विज्ञापनों पर कोई रोक नहीं लगेगी। लोगों ने इससे पहले सरकार के इस कदम की जमकर आलोचना की थी। लोगों ने कहा करीब एक अरब 30 करोड़ वाले देश में जनसंख्या पर लगाम लगनी जरुरी है और सरकार ऐसे फैसले नुकसानदायक हो सकते हैं। सरकार के तर्क और लोगों की तर्क-विर्तक के बीच एक आंकड़े पर गौर करना जरुरी है।

2017 में परिवार नियोजन पर खर्च होने वाले बजट का 40 फीसदी का इस्तेमाल ही नहीं हो सका। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय पिछले वर्ष परिवार नियोजन पर खर्च होने वाले बजट को बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था, जबकि वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट 2016-17 के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के दौरान राज्यों में परिवार नियोजन कार्यक्रम के लिए कुल बजट का 60.7% ही इस्तेमाल हो पाया है। जहां पर ये पैसा कम खर्च हुआ है वहां पर सरकार ने प्रजनन दर ज्यादा दर्द की है, इऩ राज्यों में बिहार, छत्तीसगढ़ और यूपी शामिल हैं।

यहां गौर करने वाले एक बात ये है कि 2016 से 2017 के बीच भारत की जनसंख्या लगभग एक करोड़ 50 लाख बढ़ी है। और ये वही देश है जहां परिवार नियोजन के लिए लंबे-लंबे महाभियान चलाए गए हैं। ये वही देश है जहां जनसंख्या को काबू करने के लिए बड़े पैमाने पर जबरन नसबंदी कराई गईं, जिसमें खुद इंदिरागांधी की सरकार चली गई थी।

ये भी पढ़ें:परिवार नियोजन की जिम्मेदारी में पुरुषों की हिस्सेदारी भी जरूरी

गर्भनिरोधक बाजार में कंडोम की हिस्सेदारी महज 5 फीसदी है, जबकि जनसंख्या के मामले में भारत के सामने कहीं न टिकने वाले देश ब्रिटेन मे ये आंकड़ा 30 फीसदी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार महज 5.6 फीसदी लोग ही कंडोम का इस्तेमाल करते हैं। कंडोम को लेकर लोगों में हिककिहाचट गांव और शहर दोनों जगह ज्यादा है। सरकार हर साल करोड़ों रुपए के गर्भनिरोधक उत्पाद आशा बहु और एएनएम के माध्यम से लोगों तक मुफ्त पहुंचाती है। लेकिन परिवार को कम रखने की जिम्मेदारी भी सिर्फ महिलाओं को उठानी पड़ती है।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ का चिनहट ब्लॉक शहर और गांव का मिलाजुला रुप है। यहां तैनात आशा बहु सुमन यादव बताती हैं, “ कंडोम का इस्तेमाल लोग न के बराबर करते हैं, महिलाएं ही गर्भनिरोधक गोलियां ले जाती हैं। पुरुष कभी मांगने नहीं आते, अगर दिया भी जाता है तो वो शर्माते हैं।” सुमन का इशारा पुरुषों की उस हिचकिचाहट की तरफ है जहां वो भी शर्म और झिझक से बाहर नहीं निकल पाएं हैं। ग्रामीण और कुछ शहरों इलाकों में आज भी महिलाओं के सैनेटरी पैड की तरह कंडोम लिफाफे में घर ले जाते हैं। हालांकि 1980 के दशक के बाद से टीवी और रेडियो पर आने वाले विज्ञापनों का असर था कि लोग दवा की दुकानों तक पहुंचने लगे थे। स्मृति ईरानी के ट्वीट का विरोध करते हुए लोगों ने यही तर्क दिया कि समस्या कंडोम में नहीं, विज्ञापन दिखाने के तरीके में है। इसलिए कार्रवाई उत्पाद नहीं ऐसे दृश्यों पर होनी चाहिए।

लोकसभा में कंडोम के विज्ञापन पर राेक काे लेकर स्मृति ईरानी ने जवाब दिया।

दूरदर्शन के शुरुआती दिनों में राजकपूर की फिल्म के गाने पर बना कंडोम का एक शुरुआती विज्ञापन आप में कुछ लोगों को याद हो, जिसमें बिना किसी डायलॉग व एक्शन के बात को आसानी से समझाया गया था। विज्ञापन में न तो कोई बंद कमरा है, न सिर्फ़ लड़का और लड़की

ये भी पढ़ें: पुरुष नसबंदी कराना आशा बहुओं के लिए चुनौती

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विज्ञापन में ग्लैमर का तड़का लगाने के चक्कर जिस तरह का कंटेट परोसा गया उस पर लगातार सवाल उठे। सनी लियोनी से लेकर बिपासा बसु तक इन विज्ञापनों में नजर आने लगे,जिस पर लोगों को ऐतराज हुआ।

इस बारे में दिल्ली की लेखिका प्रियंका ओम बताती हैं, “ये बात सही है कि इस तरह के ऐड का बच्चों पर गलत असर पड़ता है लेकिन ऐसे तो डियो के सभी एेड में लड़कियों को कामुक दिखाया जाता है कि वो डियो की खुशबू से अपना नियंत्रण कैसे खो देती हैं, इस पर तो पहले राेक लगनी चाहिए। रही बात युवा पीढ़ी की तो आजकल इंटरनेट हर जगह है वो यूट्यूब पर जाकर भी देख सकते हैं। ”

लेकिन जिन दृश्यों को लेकर शिकायत हुई है ऐसे कामुक और उत्तेजक वीडियो तो कई परफ्यूम और डियो के विज्ञापनों में नजर आते हैं। इन पर कार्रवाई होनी चाहिए। कंडोम के विज्ञापन का मक़सद जनसंख्या नियंत्रण व एचआईवी जैसी गंभीर समस्या के बारे में लोगों को बचाव के तरीके बताना है। भारत में आज भी 1.5 करोड़ गर्भपात होते हैं, उनमें से ज्यादा संख्या उनकी होती है जो अनचाहे गर्भधारण की वजह से होते हैं लेकिन इनको जिस तरीके से पेश किया जा रहा है वो गलत है। यहां एक बात और गौर करने वाली है भारत में गर्भनिरोध का सबसे आसान तरीका महिला नसबंदी है। सुरक्षित, जल्द और आसान होने के बावजूद परिवार नियोजन के तरीकों में पुरुष नसबंदी की हिस्सेदारी 0.62 फीसदी है। ऐसे में परिवार नियोजन के लिए जारी बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च न हो पाना कई सवाल उठाता है।

तेजी से बढ़ रही जनसंख्या वाले राज्यों में बजट का इस्तेमाल न होने पाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं। इसके बारे में परिवार नियोजन पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था वात्सल्य के प्रोग्राम मैनेजर अंजनि सिंह बताते हैं, “योजनाएं बनती हैं, बजट आता है लेकिन जमीन पर ये कितना कारगर है। ये देखने की बात है, बजट जिले स्तर पर दिया जाता है। जिलों में गाइडलाइन दी गई या नहीं,समय पर पैसा पुहंचा या नहीं।”

ये भी पढ़ें: सरकार ने तोड़ी चुप्पी, कंडोम के विज्ञापन बंद करने का बताया कारण

वो आगे बताते हैं, “आशा बहू, आंगनबाड़ी व एएनएम को ये जिम्मेदारी दी जाती है लेकिन उनकी मानिटरिंग होती ही नहीं, क्योंकि इस मुद्दे पर कोई बात ही नहीं करता कि कितने कंडोम व गालियां बांटी गईं, कम हुए ज्यादा हुए। इनका कोई लक्ष्य ही नहीं निर्धारित है न कोई फालोअप होता है, जो कि जिले स्तर व राज्य स्तर पर होनी चाहिए। ”

नाम न बताने की शर्त पर एक एएनएम बताती हैं, “हर महीने तो नहीं आता दो या तीन महीने पर गर्भनिरोधक गोलियां आती हैं। ये कितनी बंटीं, कहां बंटी, कम तो नहीं पड़ी, समय से क्यों नहीं आई। ये पूछने वाला कोई नहीं होता। जब आता है तो बांट दिया जाता है।”

इस बारे में जब हमने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में बात करने की कोशिश की तो वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

कंडोम के विज्ञापनों पर आई शिकायतों के बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) ने सलाह दी है कि मंत्रालय सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक कंडोम के विज्ञापन न दिखाए जाने के लिए टीवी चैनल को निर्देश दे। जिसके बाद 11 दिसंबर 2017 को मंत्रालय ने सभी चैनलों को परामर्श दिया था कि बच्चों के लिहाज से अनुचिव विज्ञापनों को निर्धारित वक्त में न दिखाए।

ये भी पढ़ें: पुरुषों को नसबंदी के बारे में समझाना आशा बहुओं के लिए चुनौती, आंकड़ा अभी भी बहुत पीछे

आंकडें में देखिए...

2025 तक जीडीपी का 2.5 फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना चाहती है सरकार, फिलहाल 1.15 फीसदी है ये आंकडा।

2017-18 में केंद्रीय स्वास्थय मंत्रालय ने अपने बजट को 27.7 फीसदी बढ़ाया था

गर्भनिरोधक कारोबार में सिर्फ 5 फीसदी है कंडोम की हिस्सेदार

वर्ष 2016 के मुताबिक करीब 800 करोड़ के कंडोम बाजार में 32 फीसदी शेयर के साथ सबसे बड़ा खिलाड़ी मैनकांइड है, जिसकी ब्रांड अंबेसडर सनी लियोनी हैं।

ब्रिटेन के गर्भनिरोधक बाजार में 30 फीसदी है कंडोम की हिस्सेदारी

एड्स हेल्थकेयर फाउंडेशन और हिंदुस्तान लैटेक्स लिमिटेड ने ऑनलाइन सेवाओं के लिए लांच किया था लव कंडोम, जिसे जबर्दस्त सफलता मिली इस साल के लिए 50 लाख कंडोम का आर्डर दिया गया था।

11 दिसंबर को स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी की थी चैनलों के लिए एडवाजरी।

ये भी पढ़ें: गर्भपात के लिये महिला को पति की सहमति की जरूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

ये भी पढ़ें: सरकारी योजनाओं से वंचित हैं महिलाएं

ये भी पढ़ें: नसबन्दी कराने में महिलाएं ज़्यादा जागरूक

Share it
Top