ग्रामीण पलायन रोकने लिए गाँव में देने होंगे रोजगार

केंद्र सरकार तमाम दावों के बावजूद ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने में नाकाम है। वहीं गाँवों में कृषि भूमि के लगातार कम होते जाने, आबादी बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों-कस्बों की ओर मुंह करना पड़ रहा है।

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   22 Oct 2018 9:18 AM GMT

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ग्रामीण पलायन रोकने लिए गाँव में देने होंगे रोजगार

लखनऊ। न तो खेती से मुनाफा और न ही रोजगार की व्यवस्था, घर-परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए देश में तेजी से युवाओं का गाँव से पलायन बढ़ रहा है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने में नाकाम है। गाँवों में कृषि भूमि के लगातार कम होते जाने, आबादी बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों-कस्बों की ओर मुंह करना पड़ रहा है।

हाल में आई सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) की रिपोर्ट यह बताती है कि देश में पिछले एक साल में बेरोजगारी दर 70 प्रतिशत बढ़ चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2018 में देश की बेरोजगारी दर 5.67 प्रतिशत हो चुकी है, जबकि पिछले साल जून में बेरोजगारी दर 3.39 प्रतिशत थी।

बेरोजगारी को लेकर मोदी सरकार जनता की नाराज़गी का सामना कर रही है। वहीं, हाल में आए आरबीआई के कंज्यूमर कांफिडेंस सर्वे के मुताबिक, 44.1 प्रतिशत लोगों का मानना है कि रोजगार के मौके खत्म हुए हैं, जबकि 31.5 प्रतिशत लोगों को लगता है कि रोजगार के मौके बेहतर हुए हैं, वहीं 24.4 प्रतिशत को लगता है कि इस मोर्चे पर कोई सुधार नहीं हुआ है।

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देश में पलायन की स्थिति पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और बिहार में सबसे ज्यादा है। यहां के युवा रोजगार के लिए ज्यादातर गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और कर्नाटक के जिलों में जाते हैं। बहराइच के विकास खंड चित्तौरा के गाँव मसीहाबाद निवासी शाह मोहम्मद (36 वर्ष) गाँव में रहकर खेती करते थे। लेकिन खेती से साल भर रोजगार नहीं मिलता था।

ऐसे में उनके सामने परिवार के भरण पोषण की दिक्कत आने लगी। गाँव और जिले में कोई फैक्ट्री न होने के कारण दो साल से मुंबई में रहते हैं। दीवारों पर पेंट-पॉलिस का काम करते हैं। हर माह करीब 25 हजार कमा लेते हैं, लेकिन मकान का किराया, खाना-पीना और तमाम खर्चे के कारण बचत नहीं है।

शाह मोहम्मद बताते हैं, "अगर गाँव या आस-पास कोई रोजगार मिल जाता तो मुझे अपने परिवार और गाँव को छोड़कर इतनी दूर मुंबई नहीं आना पड़ता।"

वहीं, गोरखपुर रेलवे स्टेशन से गोरखधाम एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहे गोरखपुर के पवन मिश्रा (32 वर्ष) बताते हैं, " गाँव में काम ही नहीं है। रोजी-रोटी के लिए कुछ तो करना ही है। गाँव में बेकार बैठने से अच्छा है कि दिल्ली जाकर वहां कम से कम कुछ तो काम मिल जाएगा। जो पैसा बचेगा उससे परिवार की मदद हो जाएगी।"

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पवन आगे बताते हैं, "सरकार की कमी के कारण हमें अपना गाँव और शहर छोड़ना पड़ता है। गोरखपुर के गीडा (गोरखपुर इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट अथॉरिटी) में इतनी जगह है कि वहां दर्जनों बड़ी फैक्ट्रियां लगाई जा सकती हैं, जिससे पूर्वांचल के हजारों बेरोजगारों को उनके शहर के आस-पास ही रोजगार मिल सकता है।"

पवन बताते हैं, "नोएडा में अभी कुछ दिन पहले विश्व की सबसे बड़ी मोबाइल फैक्ट्री की स्थापना की गई है। अगर इस फैक्ट्री को नोएडा की जगह गीडा में लगा देते तो कई हजार युवाओं को रोजगार मिल सकता था, जबकि नोएडा में रोजगार के कई अवसर पहले से ही मौजूद हैं। मैं तो दिल्ली में रहकर काम करता हूं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरा बेटा भी अपना घर गाँव और शहर छोड़ने का मजबूर हो।"

ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन रोकने और उन्हें गाँव में ही रोजगार मुहैया कराने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार की ओर से विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भारत में ग्रामीण विकास मंत्रालय की प्रथम प्राथमिकता ग्रामीण क्षेत्र का विकास और ग्रामीण भारत से गरीबी और भूखमरी हटाना है। मगर जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के चलते ग्रामीण युवाओं को गाँव छोड़ना बदस्तूर जारी है। ग्रामीण क्षेत्र के बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

यूपी के देवरिया जनपद के बैतालपुर निवासी रिंकू (25 वर्ष) का कहना है, "गाँव में ज्यादातर काम हो चुके हैं। गाँव की लगभग सभी सड़कें बन चुकी हैं, तालाब भी खुद चुके हैं, ऐसे में मनरेगा के तहत काम नहीं मिल रहा है। साल के 12 महीनों में ज्यादा से ज्यादा दो महीने काम मिल रहा है। खेती के काम भी दो सौ रुपए दिहाड़ी मिलती है। अब दो सौ की दिहाड़ी से घर का खर्च नहीं चलता है। प्रदेश में भाजपा सरकार के बने भी करीब दो साल हो चुके हैं, लेकिन एक भी भर्ती नहीं हुई है। सरकार की नीतियों के कारण आज युवाओं के सामने संकट खड़ा हो गया है। "

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आधारभूत ढांचे की कमी पलायन की मुख्य वजह

अर्थशास्त्री कुलदीप व्यास का कहना है, "गाँवों में आधारभूत ढांचे की कमी पलायन की सबसे मुख्य वजह है। पूर्वी यूपी, बुंदेलखंड और बिहार के गाँवों से युवाओं के पलायन की वजह रोजगार के अवसर न होना है। पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र के गाँवों से पलायन न के बराबर है, क्योंकि वहां सहकारी समितियां काफी सक्रिय हैं। अगर सरकार को ग्रामीण युवाओं के पलायन को रोकना है तो उन्हें कृषि से संबंधित रोजगार, व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देना होगा। जिससे उन्हें उन्हीं के गाँव में रोजगार मिल सकेगा।"


खेती से नहीं मिलता साल भर रोजगार

अभी भी ग्रामीण युवा के लिए रोजगार का प्रमुख क्षेत्र कृषि ही है, लेकिन सामान्य स्थिति में भी कृषि से वर्ष भर रोजगार नहीं मिलता है। इसलिए ग्रामीण युवाओं को बेरोजगारी की समस्या का सामना करना पड़ता है। आय का कोई जरिया नहीं होने के कारण ग्रामीण युवा शहर की ओर रोजगार की तलाश में जाता है।

आज कल खेती में लागत ज्यादा और मुनाफा कम होने से भी युवा खेती से दूरी बना रहे हैं। इसके साथ ही खेती का रकबा कम होता जा रहा है। परिवार की संख्या बढ़ने से हर व्यक्ति के हिस्से में कम खेती आ रही है, जो उसकी जरूरतें पूरी करने में सक्षम नहीं है।

बुंदेलखंड में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या

बुंदेलखंड में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या रही है। वर्ष 2009-10 में यूपी और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के 13 जिलों से करीब 62 लाख किसान-मजदूरों के पलायन करने का मामला डॉ. मनमोहन सिंह की अगुआई वाले के केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति के सामने आया था।

आंतरिक समिति की इस रिपोर्ट यूपी के हिस्से वाले बुंदेलखंड के झांसी से 5, 58, 377, बांदा से 7, 37,920, हमीरपुर से 4,17,489, चित्रकूट से 3,44,000, जालौन से 5,38, 147,ललितपुर से 3, 81,316 और महोबा से 2,97,547 से किसान-मजदूरों के पलायन का जिक्र है।

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युवाओं का दूर भागना लाजमी

बुंदेलखंड में पलायन पर काम कर रही गैर सरकारी संस्था साई ज्योति के जिला कोआर्डिनेटर महेश कुमार का कहना है, "आजकल गाँव में बड़ी संख्या में युवा वर्ग खेती से दूर भाग रहा। उसका दूर भागना भी लाजमी है, क्योंकि आज खेती में लागत ज्यादा और मुनाफा कम है। बुंदलखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां पर कोई कल कारखाना लगाना नहीं चाहता है, ऐसे में युवा दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए जाने के लिए मजबूर हैं।"


उत्तराखंड में स्थिति और भी भयावह

ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात सालों में उत्तराखंड में 700 गाँव वीरान हो गए। इससे पहले वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में भुतहा गाँवों (घोस्ट विलेज) यानी वीरान हो चुके गाँवों की संख्या 968 थी, जो अब बढ़कर 1668 हो गई है। यह खुलासा खुद राज्य सरकार की रिपोर्ट में हुआ है। सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इसे जारी किया।

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रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 3,946 गाँव से लगभग 1,18,981 लोगों ने स्थाई रूप से पलायन कर लिया है। पिछले दस साल से हर दिन औसतन 33 लोग गाँवों से जा रहे हैं। यहां लगभग आधे घर खंडहर हैं। वहीं 6338 गाँव के तकरीबन 383726 लोग अस्थाई रूप से काम-धंधे और पढ़ाई-लिखाई के फेर में राज्य छोड़ने को मजबूर हुए। सबसे ज्यादा पलायन पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी जिलों में हुआ है।

राज्य सरकार ने पिछले दिनों पलायन आयोग गठित किया था। इस आयोग ने 13 जिलों की 7950 ग्राम पंचायतों में सर्वे कराया था। इसके बाद पलायन पर रिपोर्ट तैयार हुई। रिपोर्ट के अनुसार 50 प्रतिशत लोगों ने रोजगार, 15% ने शिक्षा के लिए और 8% ने चिकित्सा के लिए पलायन किया है। राज्य के 734 गाँव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। पलायन करने वालों में 70% लोग गाँवों से गए तो वहीं 29% ने शहरों से पलायन किया है।

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