सैनिकों की सेहत को लेकर 128 वर्ष पुरानी परंपरा हो रही खत्म, अब पैकेट बंद दूध पिएंगे जवान

सैनिकों की सेहत को लेकर 128 वर्ष पुरानी परंपरा हो रही खत्म, अब पैकेट बंद दूध पिएंगे जवानकानपुर छावनी में बनी है फ्रीजवाल गायों की गोशाला

लखनऊ/कानपुर। सैनिकों को स्वस्थ रखने की एक 128 वर्ष पुरानी परंपरा ख़त्म होने जा रही है। रक्षा मंत्रालय ने आदेश दिया है कि गायों की सर्वोच्च नस्लों को पालने वाले 39 डेरी फार्म, जहाँ फ्रीजवाल जैसी बेहतरीन गाय हैं, अब बंद हो जायेंगे।

इस आदेश के बाद सैनिक अब सिर्फ पैकेट वाला दूध पियेंगे। सरकार के इस आदेश से इन डेरियों में काम करने वाले हजारों लोग बेरोजगार भी होने वाले हैं। फार्म कर्मचारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन्हें बचाने का आग्रह किया है।

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"सुबह चार बजे से नौ बजे तक गोशाला में काम करते हैं, अचानक बता दिया कि गोशाला को बंद कर दिया जाएगा। अब हम लोग क्या करेंगे‌? हमारे बच्चे की तो पढ़ाई भी रुक जाएगी।" कानपुर के सैन्य में फार्म में काम करने वाले राम स्वरूप वर्मा बताते हैं। पिछले 30 वर्षों से फार्म में काम कर रहे रामस्वरूप अब बेरोजगार हो गए हैं। कानपुर छावनी में स्थित सैन्य फार्म में करीब डेढ़ सौ सरकारी व गैर सरकारी लोग काम करते हैं।

"जो घर दिया गया था वो भी खाली करने को बोल दिया है, घर में बड़ी-बड़ी लड़कियां है उनको लेकर कहां जाएंगे।" रामस्वरूप कहते हैं. “कुछ महीने पहले बताया गया हम लोगों को स्थायी कर देंगे। स्थायी करना तो दूर, नौकरी से ही निकाल दिया गया है।"

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कानपुर छावनी में अंग्रेजों ने 1929 में मरे कंपनी पुल बाज़ार के पास सैन्य फार्म की स्थापना की थी। इस समय यहां लगभग 320 गायें हैं, जो रोजाना 1600 लीटर दूध देती हैं। यह दूध सप्लाई डिपो को भेजा जाता है।

इन फार्मों में देश की सबसे अच्छी नस्लों की गायें मौजूद हैं। मेरठ स्थित केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान ने वर्ष 1989 में सैन्य फार्म के लिए फ्रीजवाल नस्ल को विकसित किया था। भारत की सबसे ज्यादा दूध देने वाली गाय की साहीवाल नस्ल और हालैंड की सबसे ज्यादा दूध देने वाली हॉलस्टीन फ्रिजियन की क्रास ब्रीड से फ्रीजवाल नस्ल तैयार हुई। फ्रीजवाल नस्ल एक ब्यात में आमतौर पर चार हजार लीटर दूध देती है। यह सात से आठ हजार लीटर तक भी दूध दे सकती है।

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नाम न बताने की शर्त पर फार्म के एक सरकारी कर्मचारी ने बताया, "सरकार ऐसे फैसला नहीं लेती, लेकिन कई फार्मों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले सामने आए हैं। जितना उत्पादन होना चाहिए उतना हो नहीं पा रहा है। कभी-कभी आपूर्ति को पूरा करने के लिए पराग से भी दूध खरीदा जाता है। इन फार्मों पर लागत ज्यादा आ रही थी पर उतना उत्पादन नहीं था। कानपुर गोशाला से अभी 40 गायों को हटाया गया है। धीरे-धीरे इन सभी गायों को हटा दिया जाएगा।"

कैबिनेट कमेटी ने 20 जुलाई को सेना को इन गोशालाओं को तीन महीने के भीतर बन करने का आदेश दिया. सरकार ने इन सैन्य फार्म को बंद करने के पीछे देशभर में बढ़ते दूध के कारोबार को बताया है। दूध का कारोबार इतना बड़ा हो गया है कि सेना को खुद की फार्म की आवश्यकता नहीं है। सेना को अब उन प्राइवेट डेयरी के जरिए दूध मुहैया कराया जा सकता है, यानि भारतीय सेना के जवान अब पैकेट वाला दूध पीएंगे।

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सेना के जवानों को पौष्टिक दूध मिले, इसके लिए अंग्रेजों ने ऐसा पहला प्रयोग गोपालन फार्म के नाम से वर्ष 1889 में इलाहाबाद में शुरु किया था इसे सैन्य फार्म का नाम दिया गया। शुरुआत में इन फार्मों की संख्या सौ के करीब थी। अब 39 फार्म ही बचे हैं। इन में अंबाला (हरियाणा), बैंगडुबी (नार्थ बंगाल), झांसी, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, पिमप्री (महाराष्ट्र), पानागढ़ (बंगाल) और रांची शामिल हैं.।

उत्तर प्रदेश के चल रहे सैन्य फार्मों के डायरेक्टर कर्नल एससी. पाटिल ने कहा, "यह फैसला सरकार का है, इसमें हम लोग कुछ नहीं कर सकते, लेकिन इस फैसले पर सरकार ने दोबारा विचार करने को बोला है, क्योंकि अभी ये नहीं पता था कि इतने इन गोशालाओं से इतने लोगों को रोजगार मिला हुआ है। किसी एक फार्म को प्रधानमंत्री जी से मिलने का मौका मिला था उन्होंने इस पर विचार करने को बोला है।"

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मेरठ स्थित केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ ब्रह्म प्रकाश ने बताया, "सरकार को इस फैसले को लेने से पहले फार्मों की स्थिति को देखना चाहिए था उसके बाद आदेश देने चाहिए था। हमारे संस्थान से पूरे देशभर में 70 से 80 हजार टीके जाते थे। देशभर के 20 हजार गोवंश से पूरी सेना के लिए साढ़े तीन करोड़ लीटर दूध उत्पादन किया जा रहा है।"

40 लाख फ्रीजवाल नस्ल के टीके तैयार

केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान अब तक गायों के लिए 40 लाख फ्रीजवाल नस्ल के टीके तैयार कर चुका है।14 लाख टीके मिलिट्री फार्म और छह लाख टीके किसानों को दिए गए हैं। चार सेंटर लुधियाना, उत्तराखंड, पूना और केरल में क्रास ब्रीडिंग के चल रहे हैं। संस्थान फ्रीजवाल के अलावा 53 नस्ल की गाय के टीके किसानों को उपलब्ध कराता है। फार्म नहीं रहेंगे तो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के इस संस्थान पर भी संकट होगा।

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