यूपी में आलू खरीद को लेकर नया प्रस्ताव तैयार, जानिए क्यों चर्चा में आया आलू

यूपी में आलू खरीद को लेकर नया प्रस्ताव तैयार, जानिए क्यों चर्चा में आया आलूआलू का समर्थन मूल्य बढ़ा सकती है सरकार।

लखनऊ। आलू को वैसे तो सब्जियों का राजा कहा जाता है, लेकिन राजा आलू का भाव कौड़ियों में भी नहीं रहा। तंत्र नींद से तब जागा जब आलू लिए किसान सड़कों पर आ गये। किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू निकाल ही नहीं रहे। और कोल्ड स्टोरेज वाले आलू को बाहर फेंक दे रहे हैं। पिछलों दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कों पर आलू फेंका गया। इस पर अब योगी सरकार ने किसानों के पक्ष में कुछ करने का निर्णय लिया है।

लखनऊ की सड़कों पर आलू फेंके जाने की घटना के बाद अब सरकार ने इस पर फैसला ले लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को कहा था कि जरूरत पड़ी तो सरकार आलू का समर्थन मूल्य बढ़ा सकती है।

उत्तर प्रदेश के जिला कन्नौज में जिला मुख्यालय से करीब 75 किमी दूर सौरिख ब्लॉक इलाके के गांव नगला विशुना निवासी 40 वर्षीय किसान राजेश कुमार बताते हैं, "आलू का रेट एक हजार रुपए कुंतल होना चाहिए, तब ही हम लोग जिंदा रह पाएंगे। वैसे ही नुकसान हो रहा है। झुलसा लग गया तो कम पैदावार होगी। चेचक से भी रेट कम मिलता है।"

कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक आलू का समर्थन मूल्य 487 से बढ़ाकर 566 रुपए करने का प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। जल्द ही इसे मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। प्रस्ताव के मुताबिक आलू की खरीद इस बार एक मार्च से ही शुरू हो जाएगी। इसके अलावा स्टैंडर्ड आलू न होने की वजह से इस बार किसानों का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा। सरकार हर साइज का आलू खरीदेगी।

बीते शुक्रवार की रात से किसानों ने यूपी विधानसभा, राजभवन और सीएम आवास के बाहर से लेकर 1090 चौराहे तक किसानों ने रातभर आलू फेंककर सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी।

कानपुर नगर से 46 किमी दूर तहसील बिल्हौर से 14 किमी दूर ब्लॉक ककवन की ग्राम पंचायत चंद्रपुरा निवासी 56 वर्षीय किसान रामगोपाल द्विवेदी बताते है, "हम लोगों को अब भी फायदा नहीं है, क्योंकि वो लोग आलू छांट कर लेते हैं। जबकि आढ़त पर आलू की एक साथ बिक्री होती है। समर्थन मूल्य बढ़ने से हम लोगो को कोई फायदा नहीं है।"

इसी गांव के किसान शिवनंदन सिंह (29) का कहना है, "जब समर्थन मूल्य 487 रुपए था तब आलू छांट कर बड़ा गुल्ला लेते थे बाकी आलू किसान कहाँ ले जाएं, आलू में तीन साइज होते हैं, बम्फड़, बड़ा गुल्ला और छोटी गुल्ली। अभी तो हमने भी 250 बोरा आलू कोल्ड स्टोरेज में ही छोड़ दिया था। समर्थन मूल्य बढ़ने से हम लोगों को कोई फायदा नहीं।"

वहीं रामपाल दोहरे (42) बताते हैं, "बिगत तीन साल से आलू किसान तंगी से जूझ रहे हैं, आलू छोड़ने पर भी कोल्ड स्टोरेज मालिक को भाड़ा देना पड़ा। 250 रुपए पर कुंतल के हिसाब से भाड़ा चुकाना पड़ा। सरकार किसानों के लिए कुछ नया नही सोच रही जिससे हम लोगो की आर्थिक स्थिति अच्छी हो।"

सू़त्रों के मुताबिक पिछले साल सिर्फ स्टैंडर्ड साइज के आलू ही खरीदे गए थे। इधर आलू के मुद्दे को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी निशाना साधा है। अखिलेश ने कहा है कि सरकार किसानों की आत्महत्या के मामलों को छिपा रही है। आलू खरीदा नहीं गया इसीलिए यह राजधानी की सड़कों पर दिखाई दे रहा है। अब नया आलू आने वाला है लेकिन इसके लिए भी सरकार की पूरी तैयारी नहीं है।

मेघालय और झारखंड से मिला खरीद ऑर्डर

आलू किसानों को सही दाम दिलवाने के लिए प्रदेश सरकार ने इस साल कई प्रयास किए हैं। हाल ही में कई राज्यों में बायर-सेलर मीट करवाई थी। उसका नतीजा यह हुआ है कि दूसरे राज्यों से आलू खरीद के ऑर्डर भी मिलने लगे हैं। झारखंड से 65 हजार और शिलांग से 10 हजार टन आलू खरीद का ऑर्डर मिल चुका है।

पिछले साल का हाल

  • 155 लाख टन आलू की पैदावार
  • 1708 कोल्ड स्टोर थे
  • 130 लाख टन भंडारण क्षमता थी
  • 120 लाख टन भंडारण हुआ था
  • 1 लाख टन आलू खरीद का था लक्ष्य
  • 12,937 टन आलू ही खरीदा जा सका

इस साल की तैयारी

  • 160 लाख टन पैदावार का अनुमान
  • 1825 कोल्ड स्टोर हैं
  • 142 लाख टन हुई भंडारण क्षमता

ऐसे बढ़ी किसानों की समस्या

आलू का उत्पादन लगातार बढ़ता गया, लेकिन उसके मुकाबले भंडारण क्षमता और बाजार उपलब्ध नहीं हुआ। पिछले साल आलू खरीद की शुरुआत हुई, लेकिन मामूली लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका। क्वॉलिटी के ऐसे मानक तय किए गए कि सामान्य आलू खरीदा ही नहीं गया। खरीद भी काफी देर से शुरू हुई।

ऐसे बढ़ा आलू उत्पादन

साल उत्पादन (लाख टन में)

  • 2011-12 123.16
  • 2012-13 133.36
  • 2013-14 120.60
  • 2014-15 129.86
  • 2015-16 141.13
  • 2016-17 155.63
  • 2017-18 160 (अनुमानित) (विभागीय आंकड़ों के अनुसार)

क्यों हो रही परेशानी

ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि जब आलू की पैदावार होती है तो इसको लेकर इतना हायतौबा क्यों होता है। पैदावार होने के बावजूद किसानों को इसका उचित दाम नहीं मिल पाता। इस बारे में उत्तर प्रदेश की कृषि निर्यात और कृषि विपणन मंत्री स्वाति सिंह बताती हैं, ''उत्तर प्रदेश समेत देश के अधिकतर हिस्सों में उगाए जा रहे आलू में पानी की मात्रा अधिक होने के कारण यह आलू खाद्य प्रसंस्करण के उपयोग लायक नहीं हैं, ऐसे खाद्य प्रसंस्करण में लगी कंपनियां इन आलू को खरीदने से बच रही हैं।'' आगे बताती हैं, “इसलिए सरकार का प्रयास है कि किसान ऐसे आलू को पैदा करें जो खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में काम आ सके, इससे किसानों को फायदा मिलेगा।“

कौड़ियों के दाम आलू

पूरी दुनिया में आलू उत्पादन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर आने वाले भारत में आलू के विपणन और भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण हर साल हजारों टन आलू सड़ जाता और उसको फेंकना पड़ता है। यह हाल तब है जब देश में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बढ़ रहा है। देश में भले ही आलू के चिप्स का 10 ग्राम का पैकेट 10 रुपए यानि एक हजार रुपए किलो बिकता है, लेकिन आलू किसान इसको कौड़ियों के दाम बेचने पर मजबूर हैं।

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