रिपोर्टर कोना

आख़िर क्यों जनता की नज़र में भ्रष्ट हो जाता है प्रधान

आप किसी गाँव में चले जाइए और वहां के लोगों से पूछिए कि आपके गाँव का प्रधान कैसा है? कैसा काम करता है ? ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि कुछ काम नहीं करता है हमारे यहां का प्रधान। सिर्फ अपना बनाने में लगा है। वह सिर्फ अपने परिवार वालों को और जो उसके आस-पास रहते हैं उसी को लाभ देता है और किसी को कोई लाभ नहीं मिलता है। हर कोई प्रधान को बातों-बातों में भ्रष्ट घोषित कर देता है। लेकिन क्या किसी ने ये जानने की कोशिश की कि आख़िर क्यों जनता की नज़र में भ्रष्ट हो जाता है अधिकतर प्रधान।

मैं खुद गाँव का रहने वाला हूं। मेरे परिवार से कभी कोई प्रधानी का चुनाव नहीं लड़ा है, लेकिन प्रधानी के चुनाव में किस तरह से उम्मीदवार पैसे खर्च करते है मैं अच्छे से जानता हूं। जब भी चुनाव आने वाले होते हैं एक दो वर्ष पहले से ही जो चुनाव लड़ना चाहते हैं लोगों से मिलना जुलना बढ़ा देते हैं। तब तक उन्हें ये तक पता नहीं होता है कि इस बार सीट सामान्य रहेगी या आरक्षित। चुनाव नज़दीक आते ही सब पूरी ताकत से जुट जाते हैं, कोई चौराहे पर लोगों को चाय, समोसे और मिठाइयां खिलाना शुरू कर देता है तो कोई घर-घर तक मिठाई के डिब्बे पहुंचाने में जुट जाता है।

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चुनाव को जब एक-दो दिन बचते हैं तो प्रत्याशी साड़ी, पैसे यहां तक कि कई प्रत्याशी तो पायल, बिछिया तक बांटते हैं। ऐसा नहीं है कि सभी लोग इन सब चीजों को लेकर वोट देते हैं, ऐसे लोग भी होते हैं जो इन चीजों को लेने से मना कर देते हैं लेकिन इनकी संख्या काफी कम होती है। पिछली बार हुए ग्राम सभा के चुनाव में मैंने खुद न सिर्फ अपनी बल्कि आस-पास की दूसरी ग्राम पंचायतों में भी ये सब होते देखा और सुना।

प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए लाखों रुपए खर्च कर देते हैं। इतना सबकुछ प्रत्याशी उस पद को पाने के लिए करते हैं जिस पद पर पहुंचने के बाद उसे महज 3500 रुपए प्रति महीने मानदेय मिलता है। ये सुन कर आपको थोड़ा अजीब लगा होगा कि प्रधान का मानदेय सिर्फ 3500 रुपए! लेकिन ये सच है। उसके बाद हम उससे उम्मीद करते हैं कि वह पूरे नियम के साथ काम करे। जबकि हम खुद उसको प्रधान बनाने के लिए घूस लिए बैठे होते हैं। और फिर आप ही सोचिए एक प्रधान जिसके जिम्मेदारी पर पूरी एक ग्राम सभा आती है वो अगर सिर्फ महीने भर ब्लॉक तक आने-जाने में होने वाला खर्च ही जोड़े तो 3500 से ज्यादा हो जाएगा। वर्ष 2016 के अक्टूबर महीने में उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रधानों का मानदेय 2500 से बढ़ा कर 3500 कर दिया था। उत्तर प्रदेश में 126803 ग्राम पंचायतें हैं।

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इसलिए मेरे हिसाब से अगर लोग चाहते हैं कि प्रधान पूरी तरह नियम से काम करे, तो इस बात को लेकर उस पर दबाव बनाने से पहले हमें उसकी समस्याएं भी समझनी होंगी। सबसे पहले तो जो लोग पैसे, ज़ेवर या दूसरी चीज़ें लेकर अपना वोट बेच देते हैं उन्हें ये सब बंद करना होगा तभी आप अगर प्रधान कुछ गलत करता है तो उसके विरोध में बोल पाएंगे।

लोगों के पास ये अधिकार होता है कि अगर उनका प्रधान ठीक से काम नहीं कर रहा है तो वो उसे हटा सकते हैं, लेकिन आज तक मैंने उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई ख़बर नहीं सुनी कि किसी गाँव के लोगों ने अपने प्रधान को हटा दिया। इसका कारण शायद यही होता है कि जिन ग्रामीणों के पास ये अधिकार होता है उन्होंने अपना वोट दिया नहीं बेचा हुआ होता है। तो किस अधिकार से वो प्रधान के गलत कार्यों का विरोध करें। इसके साथ ही प्रधान को दिया जाने वाला मानदेय उनकी जो ज़िम्मेदारियां होती हैं उसके हिसाब से दिया जाए।

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