सुनिए शिवराज सिंह चौहान जी, मध्य प्रदेश के मजदूर कुछ कह रहे हैं...

अगर किसान ने एक लाख रूपए का खर्चा किया तो उसको 50 से 60 हजार रूपए मिलता है। ऐसे में किसान और मजदूर दोनों घाटे में जा रहे हैं।

सुनिए शिवराज सिंह चौहान जी, मध्य प्रदेश के मजदूर कुछ कह रहे हैं...

हरदा (मध्यप्रदेश)। मध्य प्रदेश जिसने खेती-किसानी को लेकर कई रिकॉर्ड बनाएं हैं। देश का सबसे बड़ा कृषि पुरस्कार कृषि कर्मण लगातार पांच बार मध्य प्रदेश को मिला है। पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश ने अपनी छवि को तेजी से बदला है। लेकिन पिछले दो वर्षों से यहां से लगातार किसान हुंकार भर रहे हैं। किसानों की नाराजगी सामने आ रही है। गांव कनेक्शन ने पिछले दिनों मध्य प्रदेश के कई जिलों की यात्रा कर यहां के किसानों और मजदूरों की मन की बात जानने की कोशिश की ।

मध्य प्रदेश आदिवासी बाहुल्य, छोटी जोत वाले किसानों का इलाका कहा जाता है। यहां की मिट्टी पथरीली है लेकिन उसमें उपज बढ़ाने की क्षमता है। हरदा मध्य प्रदेश में खेती-किसानी के मामलेे में नंबर एक पर है। देश में इसे मिनी पंजाब भी कहा जाता है। पंजाब और हरियाणा ये ज्यााद प्रति हेक्टेयर गेहूं उत्पादन का गौरव हरदा के नाम है। हदरा का कैनाल सिस्टम यानी नहर सिंचाई तंत्र काफी बेहतर है, लेकिन यहां के किसान भी परेशान हैं तो उनसे जुड़े मजदूर भी।

मध्य प्रदेेश पहुंची गांव कनेक्शन की टीम ने रिजगांव में किसानों से बात कर उनकी मन की बात जानी। गांव के बृजराम बताते हैं, "किसान से मजदूर जुड़ा हुआ है। किसान को अच्छा दाम मिलेगा तभी हमको पैसा मिलेगा। लेकिन नोटबंदी और समय से किसानों का भुगतान न होने से किसान और मजदूर समस्या है।"


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पिछले कई वर्षों से मजदूरी कर रहे राजाराम पहले और अब की खेती के बारे में बताते हैं, "पहले कुछ नहीं था अब नहर आने से फसल लगाने के लिए पर्याप्त पानी है। सब है लेकिन किसान को सही समय पर पैसा नहीं मिलता है और इस वजह से हमारी भी मजदूरी भी नहीं मिलती है।"

मध्यप्रदेश का हरदा जिला आदिवासी और छोटे किसानों वाला इलाका है। इसी गाँव के हेमराज कहते हैं, "खेती में खाद, बीज, सिंचाई, ट्रैक्टर, डीजल में किसान की जितनी लागत लगती है उतनी आमदनी नहीं होती है, किसान फायदे में नहीं है। अगर किसान ने एक लाख रूपए का खर्चा किया तो उसको 50 से 60 हजार रूपए मिलता है। ऐसे में किसान और मजदूर दोनों घाटे में जा रहे हैं।" मजदूरों के सामने आने वाली समस्याओं के बारे में हेमराज आगे बताते हैं, "आज कल सारा काम मशीन से हो रहा है मजदूरों से नहीं, जिससे और खर्चा बढ़ रहा है।"

उसी गाँव के मुकेश बताते हैं, "फसल का भाव मिल नहीं रहा है अगर फसल का भाव अच्छा मिलेगा तो मजूदरों को मिलेगा। अगर पांच या दस एकड़ का किसान है तो उसको कुछ नहीं मिल रहा है। उसकी लागत तक नहीं निकल पा रहा है।

उसी गाँव के मजदूर प्रभु ने बताया, "पांच साल से सोयाबीन यहां पर पैदा नहीं हो रही है और जो कुछ कर रहे है वो दो हजार में बेच रहे हैं और उसका भाव पांच हजार है। जब किसान को ही सही दाम नहीं मिल रहा है तो मजदूर को क्या दे किसान।"

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मध्यप्रदेश के किसान नेता राम ईनानिया बताते हैं, "जब तक किसान फायदे में नहीं होगा तो मजदूर फायदे में नहीं रह सकता है। सरकार मजदूर और किसान को लेकर कई सारी योजनाएं ला रही है लेकिन वो योजनाएं सिर्फ कागजों में है धरातल पर नहीं पहुंच रही है। यहीं वजह है किसान आर्थिक तंगी में चल रहा है। उसी में मजदूर भी तंगी का सामना कर रहे हैं।

वो आगे बताते हैं, "मजदूर पलायन कर रहे है। इसके साथ ही जो छोटे किसान है वो भी धीरे-धीरे पलायन करने लगे है क्योंकि वो भी रोजी रोटी नहीं चला पा रहे है।"

रिज गाँव के स्थानीय किसान अपने सामने आ रही समस्याओं के बारे में बताते हैं, "जो किसान मंडी में माल बेचने के लिए जाता है उसको नकद पैसा नहीं मिलता है। मजदूर को ये खुशी रहती है कि किसान की आज ट्रॅाली गई है तो हमको पैसा मिलेगा। शाम को जब मजूदर किसान के पास जाता है तो किसान को इतना पैसा नहीं मिलता है कि वो ट्रैक्टर में पैसा डाला लें। मजदूर भी दुखी होता है किसान भी दुखी होता है।"

"एक जमाने में हमारे यहां प्रथा हुआ करती है जब किसान मंडी जाता था तो अपने बच्चों के लिए प्रसाद लेकर आता था लेकिन अब किसान मंडी जाता है तो भूखा रहता है। तो जब किसान के घर में नहीं आएगा तो मजदूर के घर में कैसे आएगा।" किसान ने बताया। ये भी पढ़ें- घायल किसान की जुबानी मंदसौर कांड की कहानी


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